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राष्ट्र के ‘कल्याण’ के लिए समर्पित व्यक्तित्व कल्याण सिंह का महाप्रयाण

 


भारतीय धर्म संस्कृति और इतिहास के प्रति समर्पित एक महान व्यक्तित्व का नाम था – कल्याण सिंह। जनहित को सदा सामने रखकर चलने वाले और भारतीय लोक परंपरा के अनुसार अनुरूप राज धर्म का निर्वाह करने वाले व्यक्ति का नाम था – कल्याण सिंह ।सहज ,सरल, ईमानदार और राजनीतिक जीवन में शुचिता के समर्थक व्यक्ति का नाम था – कल्याण सिंह….।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह जिन्हें लोग सामान्यतः प्यार और सम्मान के साथ ‘बाबूजी’ कहकर पुकारते थे, आज हमारे बीच नहीं रहे। उनके साथ जुड़े अनेकों संस्मरणों की कथाएं और उनके द्वारा किए गए महान कार्यों की एक लंबी श्रृंखला अवश्य आज हमारे साथ है। जिन पर लोग अलग-अलग ढंग से अपने भावपूर्ण लेख लिखकर आज उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं।
बात  जुलाई 2015 की है । जब उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए कहा था कि भारत के इतिहास में अकबर के स्थान पर महाराणा प्रताप को महान दिखाया जाना आवश्यक है। इसी दीक्षांत समारोह में उन्होंने यह भी कहा था कि हमारे राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन अधिनायक ….”  में आने वाला शब्द ‘अधिनायक’ विदेशी शासन का प्रतीक है, इसे हटाया जाना चाहिए।
तब तब माननीय कल्याण सिंह जी के इस भाषण को आधार बनाकर ‘दैनिक जागरण’ में एक लेख ‘राज्यपाल, राष्ट्रगान और कॉमन सेन्स’ के शीर्षक से प्रकाशित हुआ। विगत 13 जुलाई 2015 को प्रकाशित हुए इस लेख के लेखक पंकज श्रीवास्तव हैं। उस आलेख में लेखक ने  राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह द्वारा राष्ट्रगान से ‘अधिनायक’ शब्द को हटाने संबंधी टिप्पणी की यह कहकर आलोचना की थी कि देश में एक तबका साफ तौर पर यह मानता है कि इस ‘अधिनायक’ शब्द का अभिप्राय जॉर्ज पंचम से है जो 1911 ई. में भारत आये थे। लेखक का मानना है कि ‘अधिनायक’ का अभिप्राय राष्ट्र की जनता से है, उसके सामूहिक विवेक से है या उस सर्वशक्तिमान (ईश्वर) से है जो भारत के रथचक्र को सदियों से आगे बढ़ा रहा है। इसलिए लेखक ने एक प्रकार से कांग्रेस की ‘ब्रिटिश चाटुकारिता’ की उस समय की नीति का बचाव किया है कि इस गीत के गाने का अभिप्राय तत्कालीन कांग्रेसियों की ब्रिटिश राजा की ‘चरणवंदना’ करना नही था, और ना ही गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर का उद्देश्य ब्रिटिश राजा की ‘चरणवंदना’ करना था।

लेखक का विचार है कि ऐसे बयान आर.एस.एस. जैसे संगठनों की पृष्ठभूमि में रहने वाले कल्याणसिंह जैसे लोगों की सोच का परिणाम होते हैं। क्योंकि गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर जैसे कवि से यह अपेक्षा नही की जा सकती कि वे ब्रिटिश राजा की स्तुति में ऐसी कविता लिख दें, विशेषत: तब जबकि जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के पश्चात ‘नाइटहुड’ की मिली उपाधि को उन्होंने सविनय लौटा दिया था। लेखक का मानना है कि 27 जुलाई 1911 को ‘बादशाह हमारा’ नामक गीत सम्राट के लिए गाया गया था, जो कि राजभुजा दत्त चौधरी ने लिखा था। पर लेखक का यह भी कहना है कि इस गीत से पूर्व कांग्रेसियों ने ‘जन-गण-मन’ गीत भी गाया था।
तब हमने इस लेखक के द्वारा लिखे गए इस लेख का विस्तृत जवाब कई लेखों की श्रंखला में दिया था और माननीय कल्याण सिंह जी के उक्त भाषण का स्वागत करते हुए एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक शीर्षक था -“कल्याण सिंह के कल्याणकारी बोल” – आज हम उस लेख को आपके समक्ष यथावत प्रस्तुत कर रहे हैं : –

“राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह एक मंजे हुए राजनीतिज्ञ हैं, उन्होंने जीवन के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। यह भी सत्य है कि उन्हें ये उतार चढ़ाव उनके अपने स्वाभिमानी स्वभाव के कारण भी देखने को मिले हैं। 1992 ई. में बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय सभी भाजपाइयों से अधिक स्पष्टता और जिम्मेदारी का भाव उन्हीं के शब्दों में था।
मेरी उनसे पहली भेंट उनके दिल्ली स्थित आवास पर हुई थी। मैं यह देखकर दंग था कि वह प्रदेश के छोटे-छोटे कस्बों के अपने कार्यकर्ताओं के नामों से परिचित थे और उनके विषय में बहुत कुछ जानते भी थे।
अब माननीय राज्यपाल महोदय ने फिर कुछ ऐसा कहा है जो उनके गंभीर व्यक्तित्व और भारतीय इतिहास के प्रति गंभीर चिंतन शैली को प्रकट करता है। उन्होंने कहा है कि राष्ट्रगान से ‘अधिनायक’ शब्द हटना चाहिए। राजस्थान विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए उन्होंने यह भी कहा कि महाराणा प्रताप को महान माना जाना चाहिए न कि अकबर को।
कल्याण सिंह ने दोनों बातें ही इतिहास की तर्क तराजू पर तोलकर कहीं हैं। जब 1912 ई. में अंग्रेजों ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से नई दिल्ली के लिए स्थानांतरित किया था तो राजधानी का भव्य उद्घाटन करने के लिए ब्रिटेन का तत्कालीन राजा जॉर्ज पंचम यहां आया था। उस समय उसकी भव्य सवारी दिल्ली में निकाली गयी थी, उस कार्यक्रम में भारत के सभी रजवाड़े उपस्थित रहे थे, परंतु महाराणा प्रताप का वंशज तत्कालीन मेवाड़ नरेश उस समय भी ‘अकबर’ के दिल्ली दरबार में उपस्थित नही हुआ। उसने इसे अपने स्वाभिमान के विरूद्घ समझा था और ब्रिटिश राजा के सामने सिर झुकाने से मना कर दिया था। सारे समारोह में मेवाड़ नरेश की कुर्सी खाली पड़ी रही थी। कार्यक्रम में ब्रिटिश राजा के हृदय में महाराणा के वंशज का यह कृत्य बार-बार शूल बनकर चुभता रहा था। इसी को महानता कहते हैं कि जब शत्रु को हर समय अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान का भान कराना शासक अपना दायित्व समझता है। महाराणा इसीलिए महान थे कि वह राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए लड़ते रहे और अकबर को उन्होंने अपने जीते जी शांति से शासन नही करने दिया।
जॉर्ज पंचम के उक्त कार्यक्रम में कांग्रेसियों ने ‘महाराणा’ का अनुकरण न करते हुए उसके लिए एक ‘चारणगीत’ राष्ट्रकवि रविन्द्रनाथ टैगौर से लिखवाया। उन सबने उस ‘चारणगीत’ को विदेशी ‘अधिनायक’ की सेवा में स्वयं को उसका गुलाम मानते हुए गाया था। वह गीत ही ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे’ था। बाद में कांग्रेसियों ने इसे जब अपने हर कार्यक्रम में गाना आरंभ किया और इसे ‘अपने सम्राट’ की चाटुकारिता के लिए स्थायी रूप से मान लिया तो गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगौर की स्वतंत्रता प्रेमी आत्मा भी कांग्रेसियों से विद्रोह कर उठी थी। वह स्वयं पश्चात्ताप करते थे कि मुझसे यह क्या अनर्थ हो गया? मुझे यह गीत बनाकर इन कांग्रेसियों को नही देना चाहिए था।
जब देश स्वतंत्र हुआ तो राष्ट्रगान कौन सा गीत बने इस पर चर्चा आरंभ हुई। कांग्रेसियों में भी 80 प्रतिशत लोग ऐसे थे जो ‘वंदेमातरम्’ को उस समय राष्ट्रगान बनाना चाहते थे, परंतु एक नेहरू की हठधर्मिता के कारण कांग्रेस अपनी गुलामी की मानसिकता से उबर नही पायी और हमें अपने ‘अधिनायक’ की जय जयकार करने के लिए ही अभिशप्त होना पड़ गया। इस गीत में कोई प्रार्थना नही है, अपितु किसी व्यक्ति की अभिवंदना ही है। जबकि राष्ट्रगान वह होता है जिसमें संपूर्ण राष्ट्र समूह गान के माध्यम से सामूहिक प्रार्थना करता है। यजुर्वेद (22/22) में हमें वेद के राष्ट्रगान का पता चलता है। जिसमें ओ३म् आ ब्रह्मन ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी…..के माध्यम से संपूर्ण राष्ट्र सामूहिक प्रार्थना करते हुए ईश्वर से कहता है :-
ब्रह्मन! स्वराष्ट्र में हों द्विज ब्रह्म तेजधारी।
क्षत्रिय महारथी हों, अरिदल विनाशकारी।।
होवें दुधारू गौवें, पशु अश्व आशुवाही।
आधार राष्ट्र की हों नारी सुभग सदा ही।
बलवान सभ्य योद्घा यजमान पुत्र होवें,
इच्छानुसार बरसें पर्जन्य ताप धोवें।
फ लफूल से लदी हों औषध अमोघ सारी।
हो योगक्षेमकारी स्वाधीनता हमारी।।
अपने लिए प्रार्थना तो सभी करते हैं पर सबके लिए प्रार्थना के क्षण बड़े सौभाग्य से आते हैं। यह कितना सुखद होता है कि प्रत्येक घर से प्रात:काल यज्ञ हवन की सुगंधि निकले और यह वैदिक राष्ट्रीय प्रार्थना हर घर का हर व्यक्ति प्रात:काल करे।
कल्याण सिंह जो कुछ कह रहे हैं वह उचित है उनके शब्द राष्ट्र के लिए कल्याणकारी हैं। राष्ट्रबोध हमें तभी हो सकता है जब इतिहासबोध हो और इतिहास बोध तभी हो सकता है जब शब्दबोध हो। शब्दों की अपनी गरिमा होती है। मानव की अधिनायकवादी प्रवृत्ति ने विश्व में मानवता को दास बनाने के लिए करोड़ों लोगों का रक्त बहाया है बड़ी कठिनता से लोगों ने ‘अधिनायकवाद’ को विदा किया है, और हम हैं कि आज तक ‘अधिनायक जय हे’ बोलते आ रहे हैं। हमें शब्दबोध होना चाहिए। अतीत की कुपरंपराएं व्यक्ति के उत्सव का नही रूदन का कारण बनती हैं। भारत उत्सवों का देश है-इसलिए उत्सवों के रंग में अधिनायकों की भांग नही पडऩी चाहिए। आवश्यक है कि भारत के इतिहास का पुनर्लेखन हो।”

इस लेख को बाबू कल्याण सिंह जी ने राजभवन राजस्थान में बैठे हुए अपने पूरे स्टाफ के बीच पढ़ा तो उन्होंने स्वयं ने ही मुझे फोन किया और वह पहले राष्ट्रीय राजनेता थे जिन्होंने उस समय मुझसे कहा था कि “राकेश जी ! जी चाहता है कि आपकी कलम चूम लूं, आपका माथा चूम लूं।”
तब उन्होंने बड़े आत्मीय भाव से मुझे राजभवन में राजकीय अतिथि के रूप में आमंत्रित किया। मैं समाचार पत्र के चेयरमैन ज्येष्ठ भ्राता श्री श्रद्धामेव देवेंद्र सिंह आर्य जी की अनुमति लेकर पत्र के सह संपादक श्रीनिवास आर्य और महाप्रबंधक लक्ष्मी शंकर तिवारी के साथ 22 जुलाई 2015 को राजभवन पहुंचा तो विनम्रता और सादगी की प्रतिमूर्ति कल्याण सिंह जी ने अपनी सीट से खड़े होकर हमारा उसी प्रकार स्वागत किया जिस प्रकार कोई अपने अतिथि का स्वागत किया करता है। बड़ी विनम्रता के साथ उन्होंने स्वर्ण जड़ित पैन और अन्य उपहार देकर मेरा भावपूर्ण स्वागत किया।
वार्ता के उत्तर में उन्होंने हमसे कई विषयों पर हमारे सुझाव मांगे। मैंने उनसे कहा कि पाठ्यक्रम में ‘हमारे पूर्वज’ और ‘नैतिक शिक्षा’ नाम की पुस्तकों को लगवाइये। महाराणा प्रताप को महान दिखाकर उनको ‘हिंदू गौरव’ के रूप में स्थापित करें तो अच्छा है।


6 दिसंबर 2015 को जब हम शौर्य दिवस के अवसर पर  चेयरमैन साहब श्री आर्य के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल के रूप में पुनः मिले तो उन्होंने बैठते ही हमसे कहा था कि “राकेश जी ! हमने आपका काम कर दिया है।” तब उन्होंने अपना किया हुआ काम हमें दिखाया । स्पष्ट रूप से यह वही दस्तावेज थे जिनमें हमारे महान पूर्वजों को राजस्थान के विद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर दिया गया था। उसमें महाराणा प्रताप को एक महानायक और हिंदू राष्ट्र गौरव के रूप में स्थान दिया गया था। साथ ही महर्षि दयानंद को भी कई कक्षाओं के पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया। इस पाठ्यक्रम में प्राचीन ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा से लेकर महर्षि दयानंद तक के अनेकों महापुरुषों को ही स्थान नहीं दिया गया था बल्कि राजनीतिक पुरुषों को भी स्थान दिया गया था। जिसमें राजीव गांधी तक को भी बिना किसी पूर्वाग्रह के उन्होंने सम्मिलित कराया था।
इस प्रतिनिधिमंडल में उगता भारत प्रकाशन संस्थान के अध्यक्ष बाबा नंद किशोर मिश्र और पत्रपरिवार के संरक्षक श्री विजेंद्र सिंह आर्य और मेजर वीर सिंह आर्य जी सम्मिलित थे।
आज की कांग्रेसी सरकार ने माननीय कल्याण सिंह जी के द्वारा लिए गए उस निर्णय को मिट्टी में मिला दिया है । लेकिन हम इसे मिट्टी में मिला हुआ नहीं समझते। उनके द्वारा रोपा गया पौधा फिर हरा होगा । फिर उनका लिया गया निर्णय अपने सुफल देने में सफल होगा – ऐसी हम कामना करते हैं ।
माननीय कल्याण सिंह जी ने हमसे अपने वार्तालाप में कहा था कि भारत के इतिहास के कालखंड में जब हम तुर्क काल खंड ,मुगल काल खंड और ब्रिटिश काल खंड पढ़ते हैं तो बड़ा दुख होता है. संसार में केवल भारत का इतिहास ही ऐसा है जिसमें विदेशियों के शासन के नाम से काल खंडों का विभाजन किया गया है.। आप लोग जब इतिहास पर लिखें तो  इस प्रकार के कालखंड के विभाजन के अभिशाप से भारत के इतिहास को मुक्त करने का काम करें। उनकी सलाह पर हमने काम किया। उन्होंने मनु महाराज को लेकर की जा रही उस आलोचना पर भी हमें पुस्तक लिखने का निर्देश दिया जिसमें भारतीय जातिवादी व्यवस्था के लिए मनु को दोषी ठहराया जाता है। हमने उस पर भी प्रमाणिक आधार पर पुस्तक लिखकर उनकी मनोकामना पूर्ण की।
आज वे हमारे बीच नहीं हैं । वह स्वयं अपनी अनंत यात्रा पर चले गए हैं। परंतु उनके महान कार्यों की सुगंध हमारे साथ है ।जो न केवल हम को बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी सुगंध से सुगंधित करती रहेगी। जिस सुगंध का हमने साक्षात अनुभव किया उस सुगंध को हम अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं । संपूर्ण उगता भारत परिवार आज केवल यही कह सकता है :-

तुम दूर कहीं पर बैठे हो हम याद तुम्हारी करते हैं ।
तुम उतर हृदय में आते हो जब बात तुम्हारी करते हैं।।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक :  उगता भारत

 

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