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इतिहास के पन्नों से

आजादी के अमृत की कुछ अनसुनी कहानी

 

अभिनय आकश

ये तो हम सभी जानते हैं कि हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ। लेकिन क्या आपको पता है कि आजादी के पहले भी कई जिलें ऐसे भी थे जो कभी 73 दिनों के लिए तो कोई 3 दिनों के लिए 1947 से वर्षों पहले ब्रिटिश हुकूमत से आजाद करा लिए गए थे।

यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा, सब मिट गए जहाँ से। अब तक मगर है बाक़ी, नाम-ओ-निशां हमारा।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा।
हवाओं में आजादी का जश्न है। ये दिन हमारे लिए किसी पर्व से कम नहीं है। 14-15 अगस्त 1947 की दरमियानी रात को जब आधी दुनिया सो रही थी तो हिन्दुस्तान अपनी नियती से मिलन कर रहा था। हमने सैकड़ों सालों की अंग्रेजी हुकूमत की नींव उखाड़ कर आजादी हासिल की। हालांकि आजादी के साथ ही बंटवाड़े का दर्द भी हमें झेलने पड़ा। देश की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर 75 सप्ताह पूर्व आजादी का अमृत महोत्सव की शुरुआत हो चुकी है। वहीं भारत के राष्ट्रगान को इस इस बार इतने लोग गाएंगे कि नया रिकॉर्ड बन सकता है। सरकार ने एक मंच दिया है, जहां आप राष्ट्रगान रिकॉर्ड करके भेज सकते हैं। ये मंच है, rashtragaan.in वेबसाइट जहां आपको राष्ट्रगान रिकॉर्ड करना है। वेबसाइट लॉन्च होने के बाद, लोगों ने इस पर अपने वीडियो रिकॉर्ड करने शुरू कर दिए हैं। आज जब पूरा देश आजादी के अमृत महोत्सव मनाने में लगा है। लेकिन आज हम आपको कुछ ऐसी कहानियां सुनाएंगे जिसके बाद आपको पता चलेगा कि आजादी का जो अमृत हमें और आपको चखने को मिला है उसके पीछे कई संघर्ष और कई शहीदों का हाथ है। ये तो हम सभी जानते हैं कि हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ। लेकिन क्या आपको पता है कि आजादी के पहले भी कई जिलें ऐसे भी थे जो कभी 73 दिनों के लिए तो कोई 3 दिनों के लिए 1947 से वर्षों पहले ब्रिटिश हुकूमत से आजाद करा लिए गए थे।

19 अगस्त 1942 को आजाद हो गया था बलिया
उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोड़ पर बसा बलिया जिसके गर्म खून और जूनून ने उसे बागी बलिया का तमगा दिया। गंगा और घाघरा के दोआब में बसा बलिया अपने बगावती तेवरों के लिए जाना जाता है। ऋषि-मुनियों से लेकर क्रांतिकारियों तक ने बलिया में अपना नाम हमेशा आगे रखा। अपने विद्रोही तेवरों की वजह से ही बलिया बागी बलिया कहलाया। लोककथाएं बलिया को पौराणिक इतिहास से जोड़ती हैं। महान सांस्कृतिक विरासत को अपने में समेटे ये शहर तमसा के तीर पर बसा है। गंगा और सरयु के दोआब में होने से बलिया हजारों साल पुरानी सभ्यता का साक्षी रहा है। स्वतंत्रता की क्रांति ने पहली करवट बलिया में ही ली। स्वतंत्रता की सबसे पहली सुबह भी बलिया ने ही देखी। हिन्दुस्तान ब्रिटिश हुकूमत से 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ। लेकिन बलिया ने अपने बल पर 1942 में ही स्वतंत्रता की एक सुबह की झलक देखी और पूरे देश का पथ प्रशस्त किया। महात्मा गांधी ने करो या मरो और अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दिया और बलिया के लोगों ने इस प्रण को पूरा किया और दो हफ्तों के अंदर बलिया को अंग्रेजों से आजाद करा लिया। देश में सबसे पहले बलिया 19 अगस्त 1942 को आजाद हो गया। 9 अगस्त की सुबह ने बलिया वासियों की बेचैनी को आक्रोश में बदल दिया। अंग्रेजों ने गांधी-नेहरू कई क्रांतिकारी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसकी जैसी ही खबर बलिया वासियों को मिली। बलिया का बागी खून उबाल मारने लगा। 10 अगस्त को पूरे शहर में हड़ताल का ऐलान हो गया। छात्र स्कूल छोड़ आंदोलन में शामिल होने लगे। व्यापारियों ने भी दुकान बंद करके हड़ताल में हाथ बंटाया। 10 अगस्त के जुलूस ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी। कलेक्टर जगदेश्वर निगम ने अंग्रेजी हुकूमत को लिख दिया कि बलिया को आजाद करना ही पड़ेगा, नहीं तो अंजाम कुछ भी हो सकता है। ब्रिटिश हुकूमत को बाहर का रास्ता दिखाने की बलिया ने ठान ली थी। 19 अगस्त 1942 को 25 हजार बागी आजादी के परवाने बनकर मुख्यालय की ओर बढ़ने लगी। लोग जेल में बंद चित्तू पांडेय की रिहाई की मांग करने लगे। तत्कालीन कलेक्टर का नियंत्रण प्रशासन पर नहीं रह गया था और उसे हार मानकर जेल के दरवाजे खोलने पड़े और वह चित्तू पांडेय से यह कहने को मजबूर हुआ कि पंडित जी अब आप ही इस भीड़ को संभालें और शांति व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी लें। इस तरह चित्तू पांडेय ने स्वाधीन बलिया की बागडोर संभाली और तीन दिनों के लिए बलिया स्वतंत्र हो गया। हनुमान गंज इलाके में 24 घंटे के लिए ही सही, लेकिन भारतीय तिरंगा शान से लहराया गया।  लेकिन क्रांति को चाल चलकर प्रशासन ने चरम पर पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया और बाद में फिर बलिया पर अधिकार कर लिया।
1857 में सवा साल के लिए आजाद रहा सुल्तानपुर
सुल्तानपुर हमेशा से अवध प्रांत के मुख्य जिलों में शामिल रहा है। सन 1857 में जब मंगल पांडेय ने मेरठ में क्रांति का बिगुल फूंका तो सुल्तानपुर में भी इसकी चिंगारी भड़क उठी। आजादी के मतवालों ने जंग का बिगुल फूंक दिया और देखते ही देखते शहर से सटे अमहट स्थित पुलिस लाइन में भी हिन्दुस्तानी सिपाहियों का विद्रोह शुरू हो गया। मई जून के महीने में अपने जिले में फिरंगियों के खिलाफ आजादी का बिगुल ऐसा बजा जिसमें ब्रिटिश फौज का मुखिया कर्नल फिश, अफसर दोयम, कैप्टन गिविंग्स समेत कई अंग्रेजों को हमारे सिपाहियों ने मौत के घाट उतार दिया और जिले को आजाद करवा दिया। नौ जून 1857 को सुलतानपुर जिले पर जांबाजों ने तिरंगा फहरा दिया। इसका विस्तार से जिक्र गजेटियर आफ अवध प्रिविन्स, सुलतानपुर का इतिहास, स्वतंत्रता का पहला समर जैसी ऐतिहासिक पुस्तकों में मिलता है। लेकिन सवा साल बाद अक्तूबर 1858 आते-आते सुलतापुर पर ब्रिटिश हुकुमत फिर से हो गई।

1947 के पहले स्वतंत्र हो था नंदीग्राम
नंदीग्राम महज एक गांव नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में बदलाव का प्रतीक है। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान है। स्वतंत्रता के पहले भी नंदीग्राम ने अपने उग्र आंदोलन के कारण ब्रिटिश शासन को झुकाने में सफल रहा था। नंदीग्राम को अंग्रेजों से दो बार आजादी मिली। 1947 में देश की स्वतंत्रता से पहले तामलुक को अजय मुखर्जी, सुशील कुमार धारा, सतीश चंद्र सामंत और उनके मित्रों ने नंदीग्राम के निवासियों की सहायता से अंग्रेजों से कुछ दिनों के लिए मुक्त कराया था और ब्रिटिश शासन से इस क्षेत्र को मुक्त करा लिया था।
हिसार 73 दिनों तक रहा आजाद
वैसे तो भारत देश को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली लेकिन हरियाणा के हिसार ने महज 73 दिनों के लिए ही सही लेकिन आजाद फिजाओं में रहने का अवसर 1857 में ही नसीब हो गया था। 29 मई 1857 को क्रांतिकारियों ने डिप्टी कलेक्टर वेडरबर्न समेत कई अंग्रेजों की हत्या करने के बाद नागोरी गेट पर आजादी का झंडा लहराया। इस हार से बौखलाई गोरी हुकूमत ने बीकानेर से फौज बुलाकर फिर से शहर पर कब्जे के लिए एक बड़ा हमला किया। हिसार और आस पास के गांव के क्रांतिकारियों ने पूरी ताकत के साथ अंग्रेजी फौज से लोहा लिया। लेकिन 19 अगस्त 1857 को हिसार पर दोबारा से ब्रिटिश हुकूमत का कब्जा हो गया। बगावत की खासियत यह थी कि अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में सरकारी मुलाजिमों की सक्रिय भूमिका थी। यही वजह थी कि बगावत के आरोप में सात कर्मचारियों को फांसी पर लटकाया गया।

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