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स्वर्णिम इतिहास

प्राचीन भारत में श्री यंत्र का रहस्य

 

लेखक:- प्रशांत पोळ

इस घटना को अब लगभग २९ वर्ष हो चुके हैं. इन वर्षों के दौरान यह घटना दोबारा घटित हुई हो, ऐसा कहीं सुना नहीं गया. परन्तु १९९० के अगस्त माह में, जब गर्मी अपना रौद्र रूप दिखा रही थी, तब यह घटना अमेरिका के ओरेगॉन प्रांत में घटित हुई थी. एक एकदम सूखे हुए तालाब के तल की मिट्टी पर भारतीय ‘श्रीयंत्र’ की प्रतिकृति उभरी हुई दिखाई दी थी… और इसके बाद तो मानो भिन्न-भिन्न दंतकथाओं एवं कल्पनाओं की बाढ़ सी आ गई.

विशेष बात यह कि यह घटना किसी शरारती व्यक्ति ने मजाक के तौर पर नहीं बताई थी, वरन अमेरिकन एयरफोर्स के ‘एयर नेशनल गार्ड’ के पायलट ने यह घटना स्वयं अपनी आँखों से देखी थी. उसने इस रहस्यमयी श्रीयंत्र को देखकर केवल उसकी रिपोर्ट ही नहीं की, बल्कि उस आकृति की तस्वीरें भी उतारी थीं.

ओरेगॉन के पास ही स्थित इडाहो राज्य के ‘बौईस एयरबेस’ पर बिल मिलर नामक पायलट अपनी ड्यूटी पर तैनात था. १० अगस्त १९९० को वह अपनी नियमित निगरानी उड़ान भर रहा था. उड़ान में, नीचे देखते समय, अचानक उसे ओरेगॉन की एक सूखी हुई झील में एक आकृति दिखाई दी. ज़ाहिर है कि इतनी ऊँचाई पर हवाई जहाज से दिखाई देने वाली आकृति निश्चित ही विशाल होगी. बिल मिलर के अनुसार वह आकृति लगभग चौथाई मील लंबी तो थी ही… अर्थात लगभग आधा किमी लंबी.

स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी आकृति वहाँ पहले से मौजूद हो, यह संभव नहीं था. क्योंकि इतनी बड़ी आकृति एयर नेशनल गार्ड के पायलटों की निगरानी से बच जाए, यह असंभव ही था. अर्थात यह निश्चित था कि किसी ने वह आकृति नई-नई ही बनाई होगी.

अपना विमान एयरबेस पर वापस लाते ही उसने यह आश्चर्यजनक सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताई. उसने बताया कि ओरेगॉन प्रांत के ‘सिटी ऑफ बर्न्स’ से लगभग सत्तर मील दूर यह रहस्यमय आकृति स्थित है.

ओरेगॉन, इडाहो, नेवादा… यह अमेरिका के पर्वतीय, सूखे और रेगिस्तानी प्रांत हैं. परन्तु इन राज्यों का आकार बहुत ही विशाल है. १९८१ से १९८५ के बीच ओशो रजनीश ओरेगॉन प्रांत में रहते थे, इसलिए अनेक भारतीयों के लिए ओरेगॉन नाम परिचित है.

उस पायलट बिल मिलर को हिन्दू धर्म, श्रीयंत्र जैसी बातों की जानकारी होने का कोई कारण ही नहीं था. इसलिए उसने उस आकृति को कोई ‘मशीनी’ आकृति बताया. उसके वरिष्ठ अधिकारियों ने उस स्थान पर जाकर इस आकृति के होने की पुष्टि की. उस आकृति का प्रत्यक्ष सबूत मिलने पर उस स्थान को सील कर दिया गया. यह आकृति जमीन में तीन से दस इंच नीचे खुदाई करके बनाई गई थी. उन सभी रेखाओं की लम्बाई लगभग साढ़े सत्रह मील की थी, परन्तु फिर भी उस आकृति के आसपास जूतों अथवा टायर के कोई भी निशान नहीं थे. ऐसे में उन अधिकारियों की कुछ समझ में नहीं आया कि इतनी विशाल आकृति का निर्माण आखिर कैसे किया गया होगा. इसलिए उन्होंने इस रहस्यमयी खबर को दबाकर रखा.

इस घटना के लगभग एक माह बाद, अर्थात १५ सितम्बर १९९० को डान न्यूमैन एवं एलेन डेकर नामक दो शोधार्थी उस स्थान पर पहुँचे. तब तक यह श्रीयंत्र की आकृति वहाँ वैसी ही मौजूद थी. शुरुआत में इन वैज्ञानिकों को यह लगा कि उत्तर एवं दक्षिण अमेरिका में जहाँ मीलों तक केवल खेत ही खेत दिखाई देते हैं, वहाँ पर किसान अपनी उपज बढ़ाने के लिए जमीन पर ‘क्रॉप-सर्कल’ जैसी परम्परागत आकृतियाँ बनाते हैं, यह वैसी ही कोई आकृति होगी. परन्तु सूक्ष्म निरीक्षण के बाद उनकी समझ में आया कि, यह आकृति हिन्दू धर्म से सम्बन्धित है. आगे चलकर उन्हें पता चला कि इसे ‘श्रीयंत्र’ कहते हैं. परन्तु इस प्रकार की अत्यंत सटीक एवं नापजोख वाली इतनी विशाल आकृति जब जमीन पर खुदाई करके तैयार की जा रही हो, तब उसके आसपास जूतों अथवा गाड़ियों के टायर के कोई निशान नहीं होना, यह बेहद रहस्यमय था. इसीलिए इस शोध के बाद उनके मित्र डॉक्टर जेम्स डियरफोर्ड ने ‘यू.एफ.ओ.’ (UnIdentified Objects) नामक पत्रिका में इस घटना के बारे में विस्तार से लिखा और यह आश्चर्यजनक घटना दुनिया के सामने आई.

ज़ाहिर है कि ‘अंतरिक्ष से आई हुई किन्हीं अदृश्य शक्तियों ने ही यह आकृति बनाई होगी’, इस प्रकार की अफवाहों और किस्सों की बाढ़ सी आ गई. इसी बीच ओरेगॉन के दो युवकों ने दावा किया कि यह आकृति हमने बनाई है. जब उनसे पूछताछ की गई कि, ‘इतनी सटीक और निश्चित नापजोख वाली ऐसी विशाल आकृति तुमने कैसे बनाई? जमीन की बात छोड़ दो, कागज़ पर ही यह आकृति दोबारा बनाकर दिखाओ…’ तब अपनी पोल खुलती देखकर वे भाग खड़े हुए. उस दिन से लेकर आज तक इस विशालतम और सटीक श्रीयंत्र की आकृति का रहस्य बना हुआ है. किसी को पता नहीं कि आखिर उस सूखी हुई झील में वह आकृति कैसी बनी?

गूगल पर ‘श्रीयंत्र’ शब्द सर्च करने पर हमें विभिन्न धार्मिक, तांत्रिक प्रकार के परिणाम मिलते हैं. इंटरनेट पर भी ‘श्रीयंत्र’ बिक्री के लिए उपलब्ध हैं. यहाँ तक कि बीस-पच्चीस हजार रूपए तक के श्रीयंत्र भी उपलब्ध हैं. ऐसे विज्ञापन भी देखने को मिलते हैं कि ‘श्रीयंत्र’ का उपयोग करने से मनुष्य के पास धन-संपत्ति एवं अपेक्षित सफलता प्राप्त होती है. कहने का अर्थ है कि ‘श्रीयंत्र’ भी श्रद्धा अथवा अंधश्रद्धा फैलाने का एक व्यवसाय ही बन गया है. दुर्भाग्य से ‘श्रीयंत्र’ के इस व्यवसाय एवं अंधश्रद्धा फैलाने के कारण इस यंत्र की सच्ची शक्ति, उसका सामर्थ्य एवं उसमें छिपा गूढ़ रहस्य वास्तव में लोगों तक पहुँचता ही नहीं.

पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों में भौतिकीशास्त्र में एक नया शब्द आया है, ‘सिमेटिक्स”. ग्रीक भाषा से उत्पन्न हुए इस शब्द का वैज्ञानिक सम्बन्ध ध्वनि तरंगों द्वारा निर्माण होने वाली आकृतियों संबंधी विज्ञान से है. सत्रहवीं शताब्दी में अर्नस्टक्लांग ने इस विज्ञान शाखा पर आरंभिक कार्य किया. परन्तु स्विस वैज्ञानिक ‘हान्स जेनी’ (१९०४-१९७२) ने इस विज्ञान को पूर्ण विस्तार दिया.

हान्स जेनी ने पानी, रेत और मिट्टी जैसे भिन्न-भिन्न माध्यमों पर अलग-अलग प्रकार की ध्वनि तरंगों से बहुत सारे प्रयोग किए. पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति से किए गए इन प्रयोगों को विश्व भर में मान्यता प्राप्त हुई. इस वैज्ञानिक ने भिन्न-भिन्न ध्वनि तरंगों के कारण उत्पन्न होने वाले पैटर्न्स का अध्ययन किया. इन्होंने विभिन्न पैटर्न्स का निर्माण करने के लिए क्रिस्टल ऑसिलेटर का उपयोग करके ‘टोनोस्कोप’ नामक मशीन भी तैयार की. अब आगे है मजेदार बात…

टोनोस्कोप नामक मशीन का उपयोग करने उन्होंने कुछ भारतीय साधुओं, स्वामियों से कुछ शब्दों का उच्चारण करने को कहा. मजेदार बात यह रही कि पानी में और रेती पर ‘ॐ’ का उच्चारण करने से इन पर जो तरंगें निर्मित हुईं, वह हू-ब-हू श्रीयंत्र जैसा फॉर्मेशन था. बिलकुल उसी सटीकता के साथ.

हान्स जेनी ने अनेक लोगों से ‘ॐ’ शब्द का उच्चारण करवाया. जिस व्यक्ति का ॐ उच्चारण जितना अधिक शुद्ध होता था, रेत पर श्रीयंत्र की आकृति उतनी ही स्पष्ट और सटीक नापजोख वाली बनती थी. अर्थात ‘श्रीयंत्र में जबरदस्त शक्ति छिपी हुई है, यह रहस्य हमारे पूर्वजों को कई हजार वर्षों पहले से पता थी.

‘श्रीयंत्र’ एक अत्यंत जटिल एवं मिश्रित रचना है. सामान्य मनुष्य एक बार में उसका रेखांकन सरलता से नहीं कर सकता. श्रीयंत्र के केन्द्र में एक बिंदु है, इस बिंदु के चारों तरफ एक में एक गुंथे हुए नौ त्रिकोण हैं. इन त्रिकोणों में से चार ऊपर की दिशा में, जबकि पाँच त्रिकोण नीचे की दिशा में हैं. इन नौ त्रिकोण के आपस में गुंथे होने के कारण इनके अंदर ही ४३ छोटे त्रिकोण भी तैयार होते हैं और ये सभी के सभी अत्यंत सटीक हैं.

अलबत्ता ‘श्रीयंत्र’ की विशेषता इतनी ही नहीं है. इसके अंदर जो त्रिकोण आकृतियाँ हैं, इनमें ‘फाईबोनेची संख्या के सूत्र’ और ‘गोल्डन रेश्यो’ मिलते हैं. यह फाईबोनेची संख्या क्या है? यह संख्या इटली में ‘पीसा’ शहर के फाईबोनेची नामक गणितज्ञ के नाम पर दुनिया भर में प्रसिद्ध है. सन १९०२ में फाईबोनेची ने इस संख्या पर एक पुस्तक लिखी है. हम भारतीयों का दुर्भाग्य है कि जो संख्या प्रणाली मूलतः भारत में खोजी गई, उसकी वैश्विक पहचान फाईबोनेची के नाम से की जाती है. भारतीय गणितशास्त्र की जो पुस्तकें अरबी में अनुवादित की गई थीं, इस फाईबोनेची ने उन्हीं पुस्तकों के आधार पर संख्या प्रणाली को लिया, ऐसा उसने स्वयं स्वीकार किया है.

फाईबोनेची से डेढ़ हजार वर्ष पूर्व, महर्षि पिंगल शास्त्री ने उनके ‘छंद शास्त्र’ नामक पुस्तक में इस प्रकार की गणितीय संख्याओं के बारे में विस्तार से लिखा हुआ है. इसके पश्चात छठवीं शताब्दी में विरहंका, सन ११३५ में गोपाळ एवं सन ११५० में हेमचन्द्र शास्त्री ने भी इन संख्याओं पर अनेक समीकरणों की रचना की है.

कहने का तात्पर्य यह है कि पिंगल शास्त्री ने जिस आधार पर गणितीय श्रेणी की रचना की है, उसके अनुसार ही श्रीयंत्र के त्रिकोणों का निर्माण होता है. ‘मेरु प्रस्तर’ (मेरु पर्वत चढ़ने वाली सीढियाँ) के अनुरूप ही यह त्रिकोण तैयार किए गए हैं, जिन्हें कई शताब्दियों के बाद ‘पास्कल त्रिकोण’ कहा गया. ‘श्रीयंत्र’ के मध्यभाग में (नीचे की दिशा में) एक त्रिकोण है. इस त्रिकोण की तीनों भुजाएँ कुल ५४ बिंदुओं को स्पर्श करती हैं. यह संयोग ही है कि संस्कृत में भी मूल अक्षर ५४ ही हैं.

‘गोल्डन रेश्यो’ संख्याओं का एक अनुपात है. इसका मान १.६१८०३ है. दो संख्याओं का अनुपात और इन दोनों संख्याओं का जोड़ तथा इनमें से जो बड़ी संख्या हो उसका अनुपात यदि समान हो तो उसे गोल्डन रेश्यो (स्वर्ण अनुपात) कहा जाता है. ‘पाई’ एवं ‘फाई’ का अनुपात गोल्डन रेश्यो कहा जाता है. इजिप्त के पिरामिडों की रचना में इस स्वर्ण अनुपात का उपयोग किया गया है. विशेष बात यह है कि ‘श्रीयंत्र’ में जो त्रिकोण निर्मित होते हैं, उन त्रिकोण की भुजाओं में भी यह स्वर्ण अनुपात अर्थात १.६१८०३ मिलता है.

कुल मिलाकर यह सब अदभुत और रहस्यमयी है. एक अत्यंत व्यामिश्र एवं गणितीय रचना से ‘श्रीयंत्र’ तैयार होता है. वही श्रीयंत्र ‘ॐ’ की ध्वनि तरंगों से रेत पर भी तैयार होता है तथा यही श्रीयंत्र पता नहीं कैसे और किसके द्वारा, अमेरिका के एक वीरान, रेगिस्तानी प्रदेश की सूखी झील पर भी अपने विराट स्वरूप में रचित पाया जाता है.

पौराणिक ग्रंथों में सामान्यतः ‘श्रीयंत्र’ की अधिष्ठात्री देवी त्रिपुर सुन्दरी को माना जाता है. शंकराचार्य से लेकर अनेक ऋषियों ने इसका उल्लेख भी किया है. ‘श्रीयंत्र’ को समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है.

यह ‘श्रीयंत्र’ अथवा ‘श्रीचक्र’ भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक मंदिरों में स्थापित है. चेन्नई का कामाक्षी मंदिर, कलिकम्बल मंदिर, श्रीरंगपट्टनम का निमिशाम्बा मंदिर, अमरकंटक का श्रीयंत्र मंदिर, जयपुर का काली मंदिर इत्यादि में यह देखा जा सकता है. इन सभी में अत्यंत शास्त्रीय पद्धति से ‘श्रीयंत्र पर स्थापित’ जो मंदिर है, वह है शंकराचार्य की आद्य पीठ अर्थात श्रृंगेरी मठ में…!

यह है ‘श्रीयंत्र’ का गूढ़ रहस्य. पूर्णतः गणितीय एवं वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर निर्मित श्रीयंत्र अत्यंत प्राचीन है. परन्तु दुर्भाग्य से अब यह नकली बाबाओं और व्यवसायियों के चंगुल में फँस गया है, इस कारण इसकी असली शक्ति दुनिया के सामने पहुंच नहीं रही है. श्रीयंत्र से यह भी सिद्ध होता है कि हमारा भारतीय प्राचीन ज्ञान अत्यंत समृद्ध था.
– ✍🏻प्रशांत पोळ

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