तकनीक से परिवर्तन की कोशिश

प्रमोद भार्गव

इसमें कोई दो राय नही कि दुनिया के साथ कदमताल मिलाने की हमारी कोशिशों में गति आई है। किंतु व्यवस्था की भ्रष्ट सोच, उद्यमियों को हतोत्साहित करने की मानसिकता और संसाधनों के अन्यायपूर्ण बंटवारे के चलते हम पिछड़ रहे हैं। इसे सुधारने के लिए व्यवस्था बनाम लालफीताशाही पर लगाम लगाने की कोशिश अब डिजीटल इंडिया,मसलन मु_ी में बंद मोबाइल प्रशासन से होंगी। क्योंकि एक अरब सेलफोन वाले देश में मोबाइल गवर्नेंस को हकीकत में बदलने की क्षमता है। यह दावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रौद्योगिकी से जुड़े दिग्गज कारोबारियों से अमेरिका यात्रा के दौरान कैलिफोर्निया की सिलिकॉन वैली में कही हैं। हालांकि यह समझ से परे है कि अरबों रूपए खर्चने के बावजूद जब ई-प्रशासन भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शो शासन नहीं दे पाया तो मोबाइल प्रशासन कैसे दे पाएगा ? क्योंकि अतत:मोबाइल गवर्नेंस ई-गवर्नेंस का ही नया संस्करण है। महज प्रक्रिया को संचालित करने वाले उपकरण का फर्क है। ई-प्रशासन कंप्युटर से संचालित होता है,जबकि मोबाइल-गवर्नेंस में उसी प्रक्रिया को मोबाइल से आगे बढ़ाया जाएगा। तब इस पहल से प्रशासनिक सुधार में बुनियादी बदलाव कैसे संभव है ? डिजीटल इंडिया का दूसरा विरोधाभासी पहलू यह है कि इसी समय संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने मानवीयता से जुड़े स्थायी विकास के जो 17 लक्ष्य निर्धारित किए हैं,उनमें से ज्यादातर में हम पिछड़ रहे हैं। असमानता से जुड़े इन लक्ष्यों को महज मोबाइल-प्रशासन के टोटके से साधना नामुमकिन है।

मोदी के मेक इन इंडिया,स्किल इंडिया,स्मार्ट सिटी,स्मार्ट विलेज और बुलैट ट्रेन के स्पप्नों के क्रम में ही डिजीटल इंडिया का महत्वाकांक्षी स्पप्न शामिल है। वे डिजीटल इंडिया के विस्तार से सुदूर हिस्सों में बसे लोगों की जिंदगी में खुशहली और बदलाव देख रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि तकनीक का अंतर्जाल फैला देने से प्रशासन की कार्यशैली में व्यापक बदलाव आएगा तथा जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होंगे। साथ ही कागज की बजाय ई-तरंगो पर जो लिखा-पढ़ी होगी,वह कहीं ज्यादा गोपनीय रहेगी। इस गैर-कागजी लेन-देन के लिए हरेक नागरिक का डिजीटल लॉकर स्थापित होगा। यदि ऐसा तकनीक से संभव हो जाता है तो 24 घंटे का काम 24 मिनट में पूरा हो जाएगा,यह दावा मोदी ने किया है।  इस हेतु ग्रामीण जनता को भी डिजीटल तकनीक के प्रयोग के लिए दक्ष बनाया जाएगा,जिससे गांव स्मार्ट इकोनॉमिक हब बन जाएं और किसान को सीधे बाजार से कृषि उत्पादों के भावों की जानकारी भी मिलती रहे।

मोदी प्रबल आत्मविश्वासी होने के साथ प्रखर वाक्पटु भी हैं। गोया वे सूचना तकनीक कंपनियों के अधिकारियों को तत्काल तो लुभाने में सफल हो गए हैं। यही वजह रही कि गूगल के सुदंर पिचई ने भारत के 500 रेलवे स्टेशनों पर मुफ्त में वाई-फाई सेवा देने की घोषणा कर दी। माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला ने देश के पांच लाख गांवों में ब्रॉडबैंड प्रौद्योगिकी पहुंचाने का दम भर दिया। जल्दी ही माइक्रोसाफ्ट डेटा सेंटर्स से क्लाउड कंप्युटिंग सेवा भी हासिल कराएगी। क्वालकॉम के अध्यक्ष पॉल जेकब्स ने भारत में मोबाइल इंटरनेट और देश के सभी क्षेत्रों में स्टार्टअप के लिए 15 करोड़ डॉलर के निवेश का भरोसा दिया है। इसी साल अक्टूबर के अंत तक गुजराती समेत 10 भारतीय भाषाओं को गूगल पर टाइप करने की सुविधा मिल जाएगी।

यह सही है कि तकनीक से भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में बदलाव के बेहतर व व्यापक संकेत मिले हैं। रेलवे,बैंक और मीडिया में ये बदलाव अन्य क्षेत्रों से कहीं ज्यादा कारगर साबित हुए हैं। लेकिन भारत में प्रशासनिक सुधार और मौसम की भविष्यवाणी में सूचना तकनीक बेअसर रही है। बेरोजगारी भी इससे दूर नहीं हुई,किंतु कंपनियों के मुनाफे में जरूर इजाफा हुआ है। जबकि भारत में ई-तकनीक को प्रभावशील हुए दो दशक का समय बीत चुका है। इसलिए तकनीक का विस्तार हो भी जाए तो यह जरूरी नहीं कि जिन क्षेत्रों में मोबाइल तकनीक का हस्तक्षेप लागू होने जा रहा है,उनका कायाकल्प हो ही जाएगा ? गोया,यह तो भविष्य के गर्भ में है कि तकनीक को अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की मु_ी में पहुंचा देने के बावजूद आम आदमी को वास्तविक फायदा कितना होगा ? क्योंकि तमाम हेल्पलाइनों के जरिए ये कथित जन-सुविधाएं उपलब्ध तो आज भी हैं,लेकिन क्रियान्वयन की स्थिति में प्रशासन की देहरी पर पहुंचते ही ठिठक जाती हैं। कृषि और किसान भी इसी मार की चपेट में हैं। मौसम विभाग ने सामान्य वर्षा होने का दावा किया था,लेकिन कई क्षेत्रों में बारिश सामान्य से 80 प्रतिशत तक कम हुई।

दरअसल,कंपनियां और उनके कर्ताधर्ता राष्ट्राध्यक्षों की उपस्थिति में तो पूंजी निवेश की बड़ी इच्छाएं जता देती हैं,लेकिन जब कारोबार जमीन पर उतारने की बात आती है तो लाभ-हानि के गुणाभाग लगाने पर मुंह फेर लेती हैं। मोदी ने पिछले 16 महीने में करीब ढाई-दर्जन देशों की यात्राएं कीं,लेकिन अपेक्षित निवेश नहीं आया। शायद इसीलिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मोदी पर तंज कसा है कि निवेश के लिए विदेषियों के समक्ष चिरौरी से बेहतर है,सरकार ‘मेक इंडिया‘ के लक्ष्य पर ध्यान दे।

अमेरिकी यात्रा में मोदी द्वारा तकनीक के जरिए सुशासन की पहल एक अच्छी शुरूआत तो कही जा सकती है,लेकिन इसी दौरान संयुक्त राष्ट्र की महासभा में स्थायी विकास के जो 17 लक्ष्य तय किए गए हैं,उनमें से ज्यादातर में भारत की स्थिति दयनीय है। इनमें प्रमुख हैं,गरीबी और भूख सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा,साफ पानी,प्रदूषण मुक्त शहर,समानता का अधिकार और स्वच्छ पर्यावरण। संयुक्त राष्ट्र की महासचिव बान की मून ने विषमता के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उपाय भी सुझाए हैं। उनका दावा है कि आर्थिक संपन्नता को विकेंद्रित करके साझा नहीं किया गया तो न तो लोगों के जीवन-स्तर में सुधार आएगा,न वैश्विक शांति कायम होगी और न ही धरती कल की पीढिय़ों के लिए बेहतर बनी रहेगी। दरअसल यही वे उपाय हैं,जिन्हें पूरा करने से ही भारत समेत पूरी  दुनिया में असमानता दूर होने की उम्मीद की जा सकती है। तकनीक को जरूरत से ज्यादा बढ़ावा देने के उपायों से जहां बेरोजगारी में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है,वहीं औद्योगिक विकास, शहरीकरण, बड़े बांध, और चार व छह कतारों के राजमार्गों के निर्माण के लिए बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है। इनके अलावा प्रकृतिक संपदा के अन्यायपूर्ण बंटवारे ने गरीबी को बढ़ाया है। इसलिए भारत जैसे विकासशील देशों में करोड़ों लोग ऐसे हैं,जिन्हें पेट भर भोजन नहीं मिल पा रहा है। बुंदेलखंड में तो दयालु लोगों ने गरीबों के लिए रोटी बैंक तक खोला है। सूखे के चलते यहां हालात इतने बद्तर हो गए है कि लोग अपने बच्चों को गिरवी रखने को मजबूर हो रहे हैं।

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