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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

संसद में सांसदों की संख्या बढ़ाना जरूरी है या फिर ……?

 

भारत के लोकसभा सांसदों की संख्या बढ़ाकर 1000 करने के लिए मोदी सरकार गंभीरता से विचार कर रही है । इस बाबत समाचार पत्रों में खबरें निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी संसद में अपने बहुमत के आधार पर कोई भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं। उनके विषय में यह भी कहा जा सकता है कि उनके अधिकांश निर्णय राष्ट्रहित में ही आते हैं इसलिए वह जो कुछ सोच रहे होंगे वह उनके दृष्टिकोण से ठीक भी हो सकता है। परंतु यहां पर कुछ दूसरे प्रश्न हैं। लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 से 1000 करने के संदर्भ में इन प्रश्नों पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए।


हमारे देश में है ग्राम प्रधान से लेकर संसद सदस्य के चुनाव तक किसी भी प्रत्याशी या जनप्रतिनिधि के लिए चुनाव में खड़ा होने के लिए संवैधानिक शर्त केवल यह है कि वह भारत का नागरिक हो, 25 वर्ष की अवस्था पूर्ण कर चुका हो, किसी भी न्यायालय से सजायाफ्ता मुजरिम ना हो और वह कोढ़ी दिवालिया या पागल ना हो। संसद सदस्यों की संख्या बढ़ाने से पहले क्या यह आवश्यक नहीं है कि भारत में किसी भी चुनाव को लड़ने वाला व्यक्ति पूर्णतया सुशिक्षित व सुसंस्कारित हो। वह भारत के प्रति निष्ठावान हो। वह भारत के समाज, धर्म और संस्कृति की पूर्ण जानकारी रखता हो। वह वेदों का ज्ञाता हो ।धर्म और नीति के अनुसार आचरण करने वाला हो। महामेधा संपन्न तेजस्वी और राष्ट्र के प्रति समर्पित हो। प्रजावत्सलता का भाव उसके भीतर कूट कूट कर भरा हो ?
क्या वर्तमान या अभी तक के सांसद कभी संसद में खुलकर अपने दिल की बात कहने में सफल हो पाए हैं ? विशेष रूप से तब जबकि किसी भी पार्टी के ‘व्हिप’ जारी होने के पश्चात सांसदों की जुबान पर ताले डाल दिए जाते हों , और तब भी जबकि किसी सांसद के मुखर होकर बोलने को प्रत्येक पार्टी अनुशासन भंग होने से जोड़कर देखती हो ? पार्टी व्हिप और अनुशासन के डर से जब सांसद अपने दिल की बात कह ही नहीं सकते और मुखर होकर अपने संसदीय क्षेत्र की समस्याओं को उठा ही नहीं सकते तो फिर सांसदों की संख्या बढ़ाने से क्या लाभ होगा ? संसद या विधानसभाओं में बैठकर ये ‘गूंगी गुड़िया’ ऐसी स्थिति में क्या कर सकती हैं ? सरकार को इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
वनवास से लौटकर जब रामचंद्र जी का राजतिलक हो रहा था तो उसके पश्चात उन्होंने उपस्थित जनगण और अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों व अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा था कि हमें ऐसे निर्भीक, निडर, जनप्रतिनिधि और मंत्री चाहिए जो जनता की आवाज को निसंकोच हमारे सामने कह सकें। क्या वर्तमान लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था कर पाया है कि जनप्रतिनिधि निर्भीक और निडर होकर संसद में अपनी बात को निसंकोच और निर्भीकता के साथ कह सकें? राजनीतिक पार्टियों की ‘राजनीतिक सांप्रदायिकता’ से पूर्वाग्रहग्रस्त होकर जब तक सांसद या जनप्रतिनिधि देश के विधान मंडलों में बोलते रहेंगे तब तक लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रह सकता। कोई भी जनप्रतिनिधि कभी भी देश के लिए बोलता हुआ नहीं सुना जाता। वह अपने तथाकथित मतदाताओं के लिए बोलता है । इस प्रकार ‘विखंडित मानसिकता’ के रक्तबीज से ग्रस्त होकर जनप्रतिनिधि विधान मंडलों में बैठते हैं। क्या लाभ है ऐसे जनप्रतिनिधियों को जो देश में विखंडनवाद को प्रोत्साहित करते हैं। हमारा मानना है कि पहले स्वस्थ सांसद बनाने की प्रक्रिया आरंभ की जानी चाहिए । अन्यथा सांसद बढ़ाने से देश को कोई लाभ नहीं होने वाला है। हमें तो नहीं लगता कि आने वाले बिल के आधार पर चुने जाने वाले जनप्रतिनिधि निर्भीक और निडर होकर संसद में अपनी बात को उठा पाएंगे।
यद्यपि हमारी संवैधानिक व्यवस्था है कि राजनीति जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर लोगों के बीच किसी प्रकार का भेद नहीं करेगी। परंतु यह व्यवस्था केवल संवैधानिक व्यवस्था का ‘शो-पीस’ ही है। व्यवहार में राजनीति जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर लोगों के बीच भेद करते हुए जनप्रतिनिधियों को टिकट देती है। राजनीतिक लोग व्यक्तिगत बातचीत में स्वीकार करते हैं कि जाति और संप्रदाय इस देश की एक बुनियादी सच्चाई है, जिसे नकारा नहीं जा सकता।
अरब जगत की जिस कबीलाई संस्कृति को हमारे इतिहासकार ,बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ आज तक कोसते हैं, उसी के अनुरूप हमारे देश के राजनीतिज्ञ देश में जाति और संप्रदाय की दीवारों को ऊंची और ऊंची करके लोगों को जाति और संप्रदाय के आधार पर लड़ाने का काम करते हैं। उनके भीतर जातीय और सांप्रदायिक वैमनस्य पैदा करने का हर संभव प्रयास करते हुए अपनी राजनीतिक गोटियां बैठाते हैं । क्या आने वाले बिल में ऐसी व्यवस्था कर दी जाएगी कि राजनीति को जाति और संप्रदाय की इस घृणास्पद सोच से बाहर निकाल लिया जाएगा और जो जनप्रतिनिधि लोकसभा में पहुंचेंगे वे जाति व संप्रदाय के आधार पर न पहुंचकर राष्ट्रीय सोच के आधार पर संसद में पहुंच पाएंगे ?
यह बात तब और भी अधिक विचारणीय हो जाती है जब देश में कई राजनीतिक पार्टियां जातीय और सांप्रदायिक आधार पर काम करती हुई देखी जा रही हैं । उत्तर प्रदेश में एक पार्टी एक जाति विशेष को सरकारी भूमि के पट्टे आवंटित कर देती है। केवल यह सोच कर कि ये पट्टे पाने वाले सारे लोग उसके मतदाता बन जाएंगे । क्या इसे मतदाताओं को दी जाने वाली घूस नहीं माना जाना चाहिए ? इसी प्रदेश में एक पार्टी जाति विशेष के लोगों को सरकारी नौकरियों में भर देती है और अब ‘मुस्लिम यादव’ और ‘जय भीम – जय मीम’ के नारे के आधार पर सत्ता पाने के लिए जुगत भिड़ा रही है। क्या इस सारी सोच को असंवैधानिक मानते हुए ‘राष्ट्रीय पाप’ नहीं माना जाना चाहिए और क्या इन लोगों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह किसी ‘विखंडित सोच’ को अपने जनप्रतिनिधियों के माध्यम से संसद में नहीं पहुंचा पहुंच पाएंगे? क्या बढ़े हुए जनप्रतिनिधि ऐसी सोच को दरकिनार कर काम करने के लिए प्रेरित होंगे ?
जब तक राजनीति में जाति और संप्रदाय को देखकर टिकट देने की राजनीतिक पार्टियों की कार्यशैली विद्यमान है तब तक देश में स्वस्थ लोकतंत्र विकसित नहीं हो सकता।
इसके अतिरिक्त एक बात और भी अधिक विचारणीय है कि हमारे देश में गूंगे, बहरे व अंधे लोगों को जनप्रतिनिधि बनाने की परंपरा नेहरू काल से ही प्रारंभ हो गई थी। जिनके पास अपनी आंख ना हो, अपनी आवाज ना हो, अपने कान ना हों, जो पूर्णतया अपने नेता पर आश्रित हों। ऐसे गूंगे, बहरे व अंधे लोगों को एक आदमी भेड़ बकरी की तरह हांकने के लिए संसद में भर्ती करता है। फिर 272 के जादुई आंकड़े को पार कर देश पर शासन करता है। लोकसभा के सदस्यों को बढ़ा देने के बाद भी क्या राजनीतिज्ञों और राजनीतिक पार्टियों की ऐसी सोच समाप्त हो जाएगी ? यदि नहीं ,तो फिर क्या लाभ है जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाकर देश पर आर्थिक बोझ डालने का ? राजनीतिक पार्टियों के नेता संसद में या विधानमंडलों में अपनी बात की पुष्टि पीछे बैठे जनप्रतिनिधियों से उनके द्वारा मेजें थपकवाकर कराते हैं उन्हें केवल इतना ही काम करना होता है कि जब उनका नेता बोल रहा हो तो वह अपनी ओर से मेजें थपथपाकर उसका समर्थन करते हों।
देश पहले ही संसद को ठप्प होते हुए देखकर दंग है। जिसमें उसके जनप्रतिनिधि अपने ऊपर प्रतिदिन 15 करोड खर्च करवाकर देश को आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं। यदि इन सबके भत्ते व सरकारी सुविधा आदि पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि यह आजादी से पहले की 563 रियासतों के ‘नए नवाब और राजा’ हैं, जो देश के पैसे पर मौज कर रहे हैं। इनकी संख्या बढ़ाकर देश को और अधिक शर्मिंदा करने से कोई लाभ नहीं। देश में इस समय 543 लोकसभा सांसद ढाई सौ राज्यसभा सांसद और 4800 के लगभग विधायक ‘आधुनिक काल के राजाओं’ के रूप में काम कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक राजनीतिक पार्टी का जिलाध्यक्ष भी अपने आपको एक जिले का राजा मानता है, जबकि जिला परिषद का चेयरमैन तो अपने आपको ‘नियुक्त राजा’ के रूप में देखता है । इन सब की संख्या हजारों में जाती है । इसके उपरांत भी जन समस्याओं का ढेर लगा हुआ है और यह ढेर निरंतर दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है, क्योंकि ‘राजा’ बेफिक्री की नींद सो रहे हैं। हमारे देश में लोकतंत्र न होकर राजतंत्रात्मक लोकतंत्र है। क्या इन सबके द्वारा मचाई जा रही लूट से राजनीतिक पार्टियों का मन नहीं भरा है, जो और भी ‘लुटेरे’ देश की संसद में भेजने की व्यवस्था की जा रही है ?
हमारा मानना है कि पहले वर्तमान जनप्रतिनिधियों को सुधारा जाए और ऐसी आदर्श आचार संहिता लागू की जाए जिससे राजनीति और राजनीतिज्ञों का उच्छृंखल आचरण दुरुस्त हो सके। उसके बाद मोदी सरकार लोकसभा सांसदों की संख्या बढ़ाने संबंधी बिल लेकर आए तो जनता हृदय से स्वागत करेगी। अच्छा हो कि कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष राजनीति के इसी प्रकार के सुधारवादी दृष्टिकोण के लिए कोई बिल लेकर आए। वह भाजपा के संभावित बिल का शोर मचा कर विरोध करने की बजाए कोई रचनात्मक पहल करे तो जनता को अच्छा लगेगा । इसी प्रकार मोदी सरकार विपक्ष के शोर मचाने के नाटक से पहले अपनी ओर से कोई ठोस पहल करे और राजनीति के महासमुद्र का मंथन कर ‘अमृत’ निकाल कर जनता को दे तो जनता उसका भी हार्दिक अभिनंदन करेगी।

राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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