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विशेष संपादकीय

आजम खान और ‘सिविल वार’

अपने आलोचकों की दृष्टि में आजम खान इस समय देश में एक साम्प्रदायिक नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उनके आलोचकों के पास ऐसे बहुत से तर्क हैं जिनसे उन्हें एक साम्प्रदायिक नेता सिद्घ किया जा सकता है। जैसे मुजफ्फरनगर के दंगों के बारे में ऐसे लोगों का मानना है कि यदि पहली घटना के घटित होते ही इसमें दोषी व्यक्तियों के विरूद्घ प्राथमिकी दर्ज हो गयी होती और पुलिस की भूमिका ‘समाजवादी पुलिस’  से कुछ हटकर होती तो मुजफ्फरनगर दंगा भडक़ता ही नही। पहले पुलिस ने लापरवाही की और उसकी लापरवाही के बाद जब दंगा भडक़ उठा तो ऊपर से आजम भडक़ उठे। क्षति किसकी हुई? – मानवता की। परिणाम किसे भुगतना पड़ा?-देश को।

अब ताजा उदाहरण दादरी का लें, इस प्रकरण में आज तक भी प्रदेश सरकार ने घटना की सीबीआई जांच कराना हिंदू और मुसलमानों की संयुक्त मांग को स्वीकार नही किया है। इसका कारण है क्या हो सकता है? जब सारी घटना के लिए हिंदू ही दोषी है-तो सीबीआई जांच कराने से सरकार को पीछे नही हटना चाहिए। पर सरकार पीछे हट रही है-किसके इशारे पर?-आजम खान के इशारे पर।

अब इन्हीं आजम खान ने गोमांस के मुद्दे पर एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि देश में ‘सिविल वार’ बंद होना चाहिए। रामपुर स्थित पार्टी कार्यालय पर आयोजित संवाददाता सम्मेलन में नगर विकास मंत्री मोहम्मद आजम खां ने कहा कि देश में सिविल वार न हो। बीफ को लेकर हिंदू समाज में विरोधाभास शुरू हो गया है। अगर हिंदू मुसलमान से खौफ खाएगा और मुसलमान हिंदू से डरेगा तो देश कहां जाएगा। आजम खां के ये बोल तो अच्छे हैं, अगर ये दिल से निकले हैं तो इन्हीं के अनुसार आजम खान को अपना आचरण भी बनाना चाहिए। वह व्यवहार में जैसा बोल रहे हैं उससे दोनों समुदायों में एक दूसरे के प्रति अविश्वास का माहौल पैदा हो रहा है।

देवेन्द्रसिंह आर्य

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