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इस्लामिक जन्नत की समीक्षा

इस्लामिक जन्नत (बहिश्त)-एक समीक्षा

समाचार पत्रों के माध्यम से रोजाना यह खबर मिलती है कि आज ISIS ने अनेक निर्दोष लोगों का क़त्ल कर दिया, आज तालिबान ने अफगानिस्तान या पाक में निर्दोष बच्चों पर गोलियाँ चला दी, आज पाकिस्तान में नमाज पढ़ते मुसलमानों को एक आत्मघाती ने बम से उड़ा दिया, आज मुंबई की सड़कों पर कसाब सरीखे कच्ची उम्र के लड़कों ने गोलियों से अनेक निर्दोषों के प्राण हर लिये।

क्या किसी ने सोचा की यह सब खून खराबा क्यों हो रहा है?
क्या किसी ने सोचा की सम्पूर्ण विश्व की शांति को ग्रहण लगाने वाले ऐसा क्यों कर रहे है?
क्या किसी ने सोचा की किसी भी निर्दोष की हत्या से हत्यारों को क्या मिलता हैं?

इस मनोवृति का मूल कारण इस्लामिक जन्नत (बहिश्त) को प्राप्त करने की आकांशा हैं। इस्लामिक मान्यता के अनुसार काफिर को मारने वाले को जन्नत नसीब होगी।

क़ुरान सूरा 2 आयत 25 में बहिश्त का वर्णन करते हुए लिखा है- जो लोग ईमान लाये और उन्होंने अच्छे काम किए उन्हें शुभ सुचना दे दो कि उनके लिए ऐसे बाग़ है जिनके नीचे नहरे बह रही होंगी, जब भी उनमें से कोई फल उन्हें रोजी के रूप में मिलेगा, तो कहेंगे ,’यह तो वही हैं जो पहले हमें मिला था” और उन्हें मिलना-जुलना ही (फल) मिलेगा; उनके लिए वहाँ पाक-साफ पत्नियाँ होंगी, और वे वहाँ सदैव रहेंगे।

कुरान में जन्नत का वर्णन ख़्वाजा हसन निज़ामी ने अपने कुरान के हिंदी अनुवाद के पृष्ठ 768 पर इस प्रकार से किया है-

‘जन्नत (स्वर्ग) में ये लोग जड़ाऊ सिंहासनों तथा कामदार बिछौनों पर तकिया लगाये हुए बड़े आनंद मंगल के साथ विराजमान होंगे। गिल्मान जो सदा बहार फूल की तरह सर्वदा लड़का ही बने रहेंगे उनके पास (उत्तम-उत्तम शरबतों के भरे हुए) गिलास और कूजे और ऐसी पवित्र तथा स्वच्छ मदिरा के प्याले ला रहे होंगे कि जिसके पीने से न कुछ उन्माद होगा और न उन्माद उतरते समय जो सिर पीड़ा होती है न वह शिर पीड़ा होगी और न बुद्धि ख़राब होगी। और पीने की वस्तुओं के प्रतिरिक्त जो मेवा वह खाना पसंद करेंगे (वह उनके लिए विद्यमान होगा) और मेवा के अतिरिक्त आत्मा को प्रसन्न तथा प्रफुल्लित करने के लिए उनके लिए खजानों में सेतें हुए (चमकदार) मोतियों की तरह गोरी-गोरी और मृगनयनों के सदृश बड़े-बड़े नेत्रों वाली (रूपवती) स्त्रियां भी होंगी। वास्तव में यह सब कुछ उस मन मारने और उन शुभ कर्मों का प्रतिफल है जो दुनियां में किया करते थे। इत्यादि’

क़ुरान में वर्णित जन्नत की स्वामी दयानंद ने अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के 14 वें सम्मुलास में बखूबी समीक्षा की हैं। स्वामी जी लिखते है –

भला यह कुरान का बहिश्त संसार से कौन सी उत्तम बात वाला है? क्यूंकि जो पदार्थ संसार में हैं वे ही मुसलमानों के स्वर्ग में है और इतना विशेष है कि यहां जैसे पुरुष जन्मते-मरते और आते-जाते हैं उसी प्रकार स्वर्ग में नहीं, किन्तु यहां की स्त्रियां सदा नहीं रहती और वहां बीबियां अर्थात उत्तम स्त्रियां सदा काल रहती हैं तो जब तक क़यामत की रात न आवेगी तब तक उन विचारियों के दिन कैसे कटते होंगे?
(सत्यार्थ प्रकाश 14 वां समुल्लास समीक्षा 9)

भला यह स्वर्ग है कि वा वेश्यापन? इसको ईश्वर कहना वा स्त्रैण? कोई भी बुद्धिमान ऐसी बातें जिसमें हो उसको परमेश्वर का किया पुस्तक मान सकता है? यह पक्षपात क्यों करता हैं? जो बीवियां बहिश्त में सदा रहती हैं वे यहाँ जन्म पाके वहां गई हैं वा वहीँ उत्पन्न हुई हैं? यदि यहां जन्म पाकर वहां गई हैं और जो कयामत की रात से पहले ही वहां बीवियों को बुला लिया तो उनके खाबिन्दों को क्यों न बुला लिया? और क़यामत की रात में सबका न्याय होगा इस नियम को क्यों तोड़ा? यदि वहीं जन्मी हैं तो क़यामत तक वे क्यूँकर निर्वाह करती हैं? जो उनके लिए पुरुष भी हैं तो यहां से बहिश्त में जाने वाले मुसलमानों को खुदा बीवियां कहां से देगा? और जैसे बीवियां बहिश्त में सदा रहने वाली बनाई वैसे पुरुषों को सदा रहने वाले क्यों नहीं बनाया?
(सत्यार्थ प्रकाश 14 वां समुल्लास समीक्षा 46)

क्यों जो मोती के वर्ण से लड़के किस लिए वहां रखे जाते हैं? क्या जवान लोग सेवा या स्त्रीजन उनको तृप्त नहीं कर सकती? क्या आश्चर्य है कि जो यह महा बुरा कर्म लड़कों के साथ दुष्ट-जन करते हैं उनका मूल यही क़ुरान का वचन है। और बहिश्त में स्वामी सेवक भाव होने से स्वामी को आनंद और सेवक को परिश्रम होने से दुःख और पक्षपात क्यों हैं? और जब खुदा ही मद्य पिलावेगा तो वह भी उनका सेवकवत् ठहरेगा फिर खुदा की बड़ाई क्यूँकर रह सकेगी? और वहां बहिश्त में स्त्री-पुरुष समागम और गर्भस्थित और लड़के वाले हैं व नहीं? यदि नहीं होते तो उनका विषय सेवन करना व्यर्थ हुआ और जो होते हैं तो वे जीव कहां से आए? और बिना खुदा की सेवा के बहिश्त में क्यों जन्मे? यदि जन्मे तो उनको बिना ईमान लाने और खुदा को भक्ति करने से बहिश्त मुफ्त मिल गया। किन्हीं विचारों लाने और किन्हीं को बिना धर्म के सुख मिल जाय इससे दूसरा बड़ा अन्याय कौन-सदा होगा?
(सत्यार्थ प्रकाश 14 वां समुल्लास समीक्षा 150)

स्वामी दयानंद के समान अनेक विचारकों ने इस्लामिक बहिश्त की समीक्षा अपने अनुसार की हैं। अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान लिखते है-

यह समझना कि जन्नत (स्वर्ग) मिस्ल एक बाग़ में पैदा हुई है, उसमें संगमरमर के और मोती के जड़ाऊ महल हैं। बाग़ में शराब व सरसब्ज़ दरख़्त (वृक्ष) हैं, दूध व शराब व शहद की नदियां बह रही हैं, हर किस्म का मेवा खाने को मौजूद हैं। ग्राकी और साकिनें निहायत खूबसूरत चांदी के कंगन पहने हुए जो हमारे यहां की घोसिनें पहनती हैं शराब पिला रही हैं। एक जन्नती हूर के गले में हार डाले पड़ा है, एक ने रान पर सर धरा हैं, एक छाती से लिपटा रहा है, एक ने जानबख्श का बोस लिया है, कोई किसी कोने में कुछ कर रहा है, किसी कोने में कुछ ऐसा बेहूदापन है जिस पर ताज्जुब आश्चर्य होता हैं। अगर बहिश्त (स्वर्ग) यही है तो वे मुबालगा (बिना किसी अत्युक्ति के) हमारे ख़राबात (वेश्यालय) इससे हज़ार गुना बेहतर है। (सन्दर्भ- तफ़सीरुल क़ुरान भाग 1, पृष्ठ 44)
एक कूड़ा मग़ज मुल्ला या शहबत परस्त (विषय लम्पट) जाहिद यह समझता है कि दर हकीकत (वास्तव में) निहायत अनगिनत हूरें मिलेंगी, शराबें पियेंगे दूध व शहद की नदियों में नहायेंगे और जो चाहेंगे वो मजे उड़ाएंगे। इस लम्ब व बेहूदा ख्याल से दिन रात अवामीर के बजालाने की कोशिश करता है। (सन्दर्भ- तफ़सीरुल क़ुरान भाग 1, पृष्ठ 47)

मार्कस डोड्स (Marcus Dods M.A.D.D.) लिखते हैं ‘Such passages frequently occur in the early suras of Koran and I think a candid mind must own to being somewhat shocked and disappoint by the low ideally perfected human bliss set before the Mohomedans ’

अर्थात ऐसी पंक्तियाँ क़ुरान के पूर्व सुराओं में स्पष्ट रूप से प्रकट होती हैं और मैं समझता हूं कि मुसलमानों के सम्मुख पूर्ण मानव कल्याण के अधम आदर्शों के द्वारा निष्कपट व्यक्ति को आघात और निराशा की ही प्राप्ति होगी। (सन्दर्भ- Mohammed Buddha and Christ pp 49)

पादरी गैरिनडर नामक विद्वान इस्लामिक बहिश्त की समीक्षा में लिखते है

But the curse of the Koranic imagery is that it’s most direct and significant appeal is carnal, and that it stimulates that which in the Oriental stands in least need of being stimulated. A unique chance to uplift, to spiritualize was lost. On the contrary, it was turned into a unique means of standardizing the low level at which ordinary fallen human nature is all too content to live. The imagery of Hell, Jahannam, is similarly material, and its elaborate and terrible details are intended to be interpreted in a strictly material sense. All the descriptions of both Heaven and Hell, the Intermediate State, Resurrection, and Judgment are, then, thoroughly and frankly materialistic.

अर्थात क़ुरान की बुराई यह है कि इसकी सीधी और उद्बोधक प्रार्थना भोग-विलासी सम्बन्धी है। आत्मा को ऊँचा उठाने वा आध्यात्मिकता को बढ़ाने का अवसर इसने खो दिया। इसके विरुद्ध इसने ऐसे हीन परिणाम को सर्वथा अपना लिया जिस पर रहने में ही साधारण पतित मानवीय प्रकृति संतुष्ट रहती है। इसी प्रकार नरक की कल्पना भी सांसारिक है और इसके विस्तृत और भयंकर वर्णन बिलकुल शब्दश:लिए जाने के लिए हैं। स्वर्ग-नरक, माध्यमिक स्थिति, पुनरुत्थान और प्रलय के सब वर्णन स्पष्टरूप से भौतिक है।

सन्दर्भ Author Gairdner, W. H. T. (William Henry Temple) The reproach of Islam page 153.

उर्दू के प्रसिद्द ग़ालिब जन्नत के विषय में लिखते है-

‘हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,दिल के बहलाने को ग़ालिब यह खियाल अच्छा है’

शेख इब्राहिम का कथन है-

‘जिसमें लाखों बरस ही हूरें हो, ऐसी जन्नत को क्या करे कोई’
इस प्रकार से अनेक विचारकों ने इस्लामिक बहिश्त की समीक्षा की हैं।

इस्लामिक बहिश्त के आकर्षण में संसार की शांति भंग हो गई है। संसार के युद्धक्षेत्र बनने से यह साक्षात नरक बन गया हैं।

स्वामी दयानंद स्वर्ग-नरक को किसी स्थान विशेष पर नहीं मानते थे अपितु स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश में स्वामी जी स्वर्ग नाम सुख विशेष भोग और उसकी सामग्री प्राप्ति को मानते है और नरक जो दुःख विशेष भोग और उसकी सामग्री प्राप्ति को मानते है। अर्थात जो व्यक्ति संसार में अपने कर्मों द्वारा सुख की प्राप्ति कर रहा है वह स्वर्ग में है और जो दुःख की प्राप्ति कर रहा है वह नरक में है। इसलिए श्रेष्ठ कर्म करने का संकल्प लीजिये जिससे यह धरती ही स्वर्ग बन जाये। इस्लामिक बहिश्त के विचार के त्याग से ही आतंकवाद समाप्त हो सकता हैं जिसका परिणाम इस धरती को जन्नत बनने से कोई नहीं रोक सकता।

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