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इतिहास के पन्नों से

नेहरू की इतिहास दृष्टि, भाग – 1

 

लेखक:- डॉ. शंकर शरण

बहुतेरे विदेशी लोग, और बड़ी संख्या में भारतीय उच्च-शिक्षित लोग भी भारत में ब्रिटिश राज से पहले के शासन को सामान्यतः ‘मुगल शासन’ के रूप में ही जानते हैं। वे समझते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य वस्तुत: मुगल साम्राज्य का उत्तराधिकारी था। उन्हें यह मोटा सा तथ्य ध्यान नहीं रहता कि ब्रिटिश विजय के आरंभिक काल में अंग्रेजों का संघर्ष किसी मुगल के साथ नहीं, बल्कि मराठी के साथ होता रहा था। इतिहास के सम्बन्ध में दूसरी भ्रांत धारणा यह है कि भारत के बड़े हिस्से में प्रायः पाँच सौ वर्ष तक राज्य करने वाले विविध मुस्लिम शासक कोई ‘विदेशी’ नहीं, बल्कि ‘भारतीय’ थे, जिनके विरुद्ध लड़ने वाले मराठे, जाट, राजपूत और सिख आदि स्थानीय ‘विद्रोही’ मात्र थे।

आधुनिक भारत में इन दोनों भ्रातियों का प्रचार करने वालों में जवाहरलाल नेहरू का नाम सर्वप्रथम है। यह अनायास नहीं कि भारत के अधिकांश मार्क्सवादी इतिहासकार अपनी विभिन्न ऐतिहासिक-राजनीतिक प्रस्थापनाओं को चलाने के लिए निरंतर नेहरू की आड़ लेते हैं, क्योंकि प्रथम प्रधानमंत्री और लंबे समय तक देश के सत्ता-तंत्र पर उनका तथा उनके वंशजों का अधिकार होने के कारण नेहरू नाम का एक वजन बना रहा है। इसी बहाने नेहरू को इतिहास के तथ्यों के लिए भी मानो किसी ‘आधिकारिक स्त्रोत’ के रूप में लिया जाता रहा है।

भारतीय शिक्षित वर्ग में इतिहास के प्रति जितनी भी भ्रातियाँ पाई जाती है, वह वस्तुत: सबसे पहले नेहरू जी की पुस्तक ‘ग्लिप्सेस ऑफ वड हिस्टरी’ से ही प्रचारित हुई हैं। भारत में बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी से लेकर सत्रहवी-अठारहवीं शताब्दी तक सत्तासीन रहे विविध मुस्लिम शासक ‘स्वदेशी’, ‘भारतीय’ शासक थे, यह प्रस्थापना पहले-पहल नेहरू से ही शुरू हुई। बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने उस में उसी तरह के और भी तक-कुतर्क जोड़े।

विचित्र बात यह है कि उस प्रस्थापना क लिए नेहरू का मुख्य, और लगभग एक मात्र तर्क यह था कि कई बाहरी मुसलमान शासकों, बादशाहों ने हिन्दू स्त्रियों से विवाह किया था। उदाहरण के लिए, अफगान शासकों का स्वदेशीकरण करते नेहरू ने लिखा, “हम देखते हैं कि भारत ने धीरे-धीरे इन नृशंस योद्धाओं को नम्र बना दिया है और सुसंस्कृत कर लिया है। वे लोग यह अनुभव करने लगे हैं कि वे भारतीय ही हैं, विदेशी आक्रमणकारी नहीं। वे लोग इस देश की स्त्रियों से विवाह करते हैं, और धीरे-धीरे विजित और विजेता के बीच का विभेद लुप्त होने लगता है।”

तुर्क-अफगान आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी के बारे में भी नेहरू वही कहते है, “अलाउद्दीन अन्य (मुसलमानों) के समान असहिष्णु था, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि मध्य एशिया के इन शासकों की दृष्टि में परिवर्तन होने लगा था। वे लोग भारत को अपना स्वदेश मानने लगे थे। वे अब इस देश में विदेशी नहीं रह गए थे। अलाउद्दीन ने एक हिन्दू स्त्री से विवाह किया था, और उसके पुत्र ने भी।” यह सब कहते हुए नेहरू कोई तत्कालीन प्रमाण या संकेत तक ढूँढने की चिंता नहीं करते जिस से उनकी परिकल्पना की पुष्टि होती हो। जिस से दिखता हो कि वे आक्रांता, या उनके सहयोगी, दरबारी, तारीखनवीस, आदि में से कोई भी वह भावना रखते थे जो नेहरू उनमें अपनी ओर से डाल रहे हैं।

दूसरे तुर्क शासक फिरोजशाह तुगलक के बारे में भी नेहरू फिर वही दुहराते हैं, “फिरोजशाह की माँ बीबी नैला नाम की एक राजपूत स्त्री थी… इस प्रकार फिरोजशाह की शिराओं में भी राजपूत रक्त था। मुसलमान शासकों तथा राजपूत स्त्रियों के बीच होने वाले इन विवाह-सम्बन्धों की संख्या बढ़ती गई। इस के फलस्वरूप (हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच) एक उभय-सम्मत राष्ट्रवाद की मनोभावना को सहायता मिली होगी।” इस प्रकार, एक ही बात अपनी ओर से दुहराते हुए, और बिना किसी प्रमाण की परवाह करते हुए, नेहरू स्वयं कल्पना करके निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि पंद्रहवीं सदी आते-आते मुसलमान शासक विदेशी नहीं रह गए थे। नेहरू के अनुसार, “इस्लाम भारत में अब एक विदेशी अथवा नवागत तत्व नहीं रह गया है। वह पूरी तरह पैर जमा चुका है… मुसलमान बादशाह अब वैसे ही हिन्दुस्तानी है जैसी कि उनकी हिन्दू प्रजा… मुसलमान बादशाह बहुधा हिन्दू स्त्रियों से विवाह करते हैं… उन दोनों के बीच विजेता और विजित की अथवा शासक और शासित की भावना का पूर्ण लोप हो चुका है।”

नेहरू यह मामूली सत्य भी देखने-परखने की चिन्ता नहीं करते कि क्या हिन्दू, राजपूत स्त्रियाँ स्वेच्छा से मुस्लिम शासकों की पत्नियाँ बनी थी? अथवा क्या उन्हें जबरन विवाह करना पड़ा था? दूसरे, विवाह के उपरांत क्या वे हिन्दू रह गई थीं या उन्हें विधिवत् मुसलमान बनाया जा चुका था? चूँकि पाँच-छ: सदियों के गजनी, घूरी, खिलजी, लोदी, तुगलक और मगुल शासकों में केवल बादशाह अकबर की बेगम जोधाबाई द्वारा अपने महल में मंदिर में पूजा करते रहने का उल्लेख मिलता है, इसलिए यह स्पष्ट झलकता है कि दूसरी राजपूत, हिन्दू स्त्रियों को किसी मुस्लिम शासक द्वारा ऐसी छूट नहीं रही थी। तब वह सब विवाह था या बलात्कार?

यह प्रश्न इसलिए भी उठता है कि कोई नहीं देखता कि उन्हीं सदियों में क्या किसी हिन्दू राजा ने भी किसी मुस्लिम शाहजादी से विवाह किया था? साथ ही, क्या कथित हिन्दू माताओं से पैदा होने वाली मुगल संतानों में कोई हिन्दू भाव या सहानुभूति भी पाई गई है? यदि इन सभी मोटे-मोटे प्रश्नों को भी नजरअंदाज किया गया तो इसका अर्थ है कि नेहरू इतिहास नहीं, अपना लज्जास्पद प्रमाद और राजनीतिक मतवाद फैलाने में मशगूल थे। उनमें इतिहास लिखने, समझने की कोई योग्यता नहीं थी।

यदि नेहरू का तर्क माना जाए तब तो कहना होगा कि अंग्रेजों का भी भारतीयकरण हो गया। जाने-माने ब्रिटिश इतिहासकार विलियम डालरिंपल ने मुगलकाल के अंतिम दौर में अनेकानेक अंग्रेज अधिकारियों को यहाँ भारतीय-मुस्लिम बीवियाँ, रखैलियाँ रखते हुए पाया ही है। आखिर भारत का ‘एंग्लो-इंडियन’ समुदाय क्या था, और कैसे बना था? जिस बड़ी संख्या में यहाँ एंग्लो-इंडियन समुदाय बना, उसी की जरूरत थी कि स्वतंत्र भारत में संसद में इस समुदाय के दो सदस्यों को नामित करने की व्यवस्था की गई। जब तक ब्रिटिश शासन रहा, तब तक यहाँ एंग्लो-इंडियन लोग प्राय: अपने आपको अन्य भारतीयों से कुछ ऊपर मानते थे।

अतः ब्रिटिश राज में अंग्रेजों और भारतीयों के भी विवाह होते रहने के तथ्य के मद्देनजर, नेहरू के तर्क से, अंग्रेजों को ही विदेशी क्यों माना जाए? नेहरू भारत में कई अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भारतीय स्त्रियों से विवाह या साथ रहने के तथ्य से परिचित थे। तब अंग्रेजी राज के संबंध में वही तर्क न लगाना यही संकेत करता है कि नेहरू ने अपना कथित इतिहास किसी सुसंगत तर्क से नहीं लिखा था, बल्कि विविध यूरोपीय इतिहासकारों ने जो सब लिख रखा था उन्हीं से मनमाना चुनाव कर, तथा उन बातों को अपना रंग देकर नेहरू ने मनमाना निष्कर्ष प्रचारित किया। चार-पाँच सौ सालों के सल्तनत-मुगल शासन में, गजनवी, तुगलक, खिलजी, आदि से लेकर औरंगजेब तक नेहरू किन तथ्यों को चुनते और छोड़ते है, इसे सरलता से परखा जा सकता है। उन तमाम मुस्लिम शासकों द्वारा किए गए हत्याकांडों, विध्वंस, जबरन धर्मातरण, बलात्कार, अत्याचार, आदि कुछ भी नेहरू के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। (क्रमशः…)
(स्रोत: ‘नेहरूवाद की विरासत’, पृ. 23-43)
✍🏻डॉ0 शंकर शरण

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