शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता

images (48)

उगता भारत ब्यूरो

निजी और सरकारी स्कूलों के बीच की खाई इस महामारी के दौर में और गहराई से महसूस की गई। जहां निजी स्कूलों के पास बेहतर सुविधाएं, उपकरण और संसाधनों के अलावा अनुभवी और प्रशिक्षित टीचर हैं वहीं सरकारी स्कूलों में हालात 21वीं सदी के दो दशक बाद भी नहीं सुधर पाए हैं। 2016 में तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के बारे में संसद में रिपोर्ट पेश की थी जिसके अनुसार देश में एक लाख स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक तैनात हैं, इसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के हाल सबसे बुरे बताए गए थे।

जनसंख्या नियंत्रण का मुद्दा इस वक्त देश में सबसे बड़ा बना हुआ है। पिछले कुछ दिनों से मीडिया में इसी बात की चर्चा है कि कैसे बढ़ती आबादी भारत के लिए अभिशाप बनी है। भाजपा के प्रचार तंत्र का कमाल है कि वह जब चाहे, किसी भी मुद्दे को उछाल सकता है और जब तक चाहे उसे चर्चा में बनाए रख सकता है।

भाजपा को इस बात पर भी महारत हासिल है कि कैसे किसी मुद्दे को दरकिनार किया जाए यानी जनता के लिए वो जरूरी हो, तब भी उस पर कोई विमर्श, कोई चर्चा नहीं हो। लोगों को रोजगार उपलब्ध न कराने में भाजपा की नाकामी जनता के सामने आ चुकी है, लेकिन उस पर जनता और गहराई से सोचने लगे, इससे पहले ही जनसंख्या नियंत्रण का शिगूफा छोड़ दिया गया है। भाजपा यही साबित करने में लगी हुई है कि एक बार आबादी पर अंकुश लग जाए तो देश में सारी समस्याओं का हल हो जाएगा। मानो भारत की आबादी बढ़ना रुक जाए, तो इस वक्त देश में जो बेरोजगार युवा नौकरियों के लिए चप्पलें घिस रहे हैं, उन्हें घर बैठे नियुक्ति पत्र मिलने लगेंगे या जो बच्चे साधनों के अभाव में स्कूल की शिक्षा से भी वंचित हो रहे हैं, उन्हें पढ़ने की सारी सुविधाएं मिलने लग जाएंगी।

आबादी का विस्फोट देश के लिए चिंता का विषय है। लेकिन अब इस मसले पर जनता भी जागरुक हो रही है, इसलिए फर्टिलिटी दर कम हो रही है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) 2015-16 के आंकड़े बताते हैं कि देश की मौजूदा फर्टिलिटी दर 2.3 से नीचे है। जनसंख्या को स्थिर करने के लिए यह दर 2.1 होनी चाहिए और आंकड़े बताते हैं कि यह स्थिति कुछ ही वर्षों में खुद ब खुद आने वाली है। यानी समस्या का समाधान जनता खुद ही कर रही है, लेकिन सरकार ने इस पर कानून बनाने की बात छेड़कर नयी बहस छेड़ दी है, जिसमें कई जरूरी मुद्दे फिर दरकिनार हो रहे हैं।

भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। भारत में 18 से 44 साल की उम्र के लोगों की संख्या 60 करोड़ है। इस कामकाजी आबादी की ऊर्जा का अगर सही इस्तेमाल हो तो यह देश के लिए वरदान साबित हो सकती है। फिलहाल इसे देश में अभिशाप की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। देश में 18 साल से कम उम्र की आबादी भी 25 प्रतिशत से ज्यादा है। यानी अगले कुछ सालों तक भारत में कामकाजी आबादी की कमी नहीं होगी। दुनिया के कई देश इस वक्त जनसंख्या में बूढ़ों की बढ़ती तादाद और नयी पीढ़ी में आ रही कमी से चिंतित हैं। भारत में युवा पीढ़ी में कमी की समस्या नहीं है, लेकिन इस पीढ़ी को अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और रोजगार उपलब्ध कराने में मोदी सरकार विफल साबित हो चुकी है।

भारत की 25 प्रतिशत नयी आबादी को भारत का भविष्य कहा जाता है। मतलब 18 साल से कम आयु के ये बच्चे जब वयस्क होंगे, तो इनके हाथों में देश की बागडोर होगी। अगर वे स्वस्थ और शिक्षित होंगे तो देश का भविष्य उज्ज्वल होगा। इस आबादी के लिए ही मोदी सरकार ने नारा दिया था- पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया। लेकिन स्कूली शिक्षा का जो हाल देश में है, उससे यही सवाल उठता है कि इस इंडिया को पढ़ाएगा कौन, कौन इन बच्चों को बढ़ाने की जिम्मेदारी लेगा, ताकि देश आगे बढ़े। एक रिपोर्ट सामने आई है, जो बताती है कि निजी स्कूलों के मुकाबले देश में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है।

भारत में कुल 15,07,708 स्कूल हैं, जिनमें से 10,32,570 स्कूल केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा संचालित किये जा रहे हैं, 84,362 सरकारी सहायता प्राप्त हैं, 3,37,499 गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूल हैं, जबकि 53,277 स्कूलों का संचालन अन्य संगठनों एवं संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है। केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग द्वारा प्रकाशित यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (यूडीआईएसई+) की 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार देश भर के स्कूलों में कुल 96,02,625 शिक्षक कार्यरत हैं, जिनमें से 49,38,868 सरकारी स्कूलों में, 8,20,301 सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में , 36,02,625 निजी स्कूलों में और शेष अन्य स्कूलों में काम करते हैं। भारत में कुल स्कूलों में से निजी एवं गैर-सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या 22.38प्रतिशत है, जबकि शिक्षकों की कुल संख्या का 37.18 प्रतिशत हिस्सा निजी स्कूलों में कार्यरत है।

भारत में पाए जाने वाले कुल विद्यालयों में से 68.48 प्रतिशत हिस्सा सरकारी विद्यालयों का है। हालांकि इन स्कूलों में आवश्यक शिक्षकों का मात्र 50.1प्रतिशत हिस्सा ही कार्यरत है। यानी जितनी जरूरत है, उसके आधे शिक्षक ही नियुक्त हैं, शेष पद खाली ही हैं। सरकारी-सहायता प्राप्त स्कूल, जो स्कूलों की कुल संख्या का 5.6 प्रतिशत हैं, के पास शिक्षकों की कुल संख्या का 8.46 प्रतिशत हिस्सा कार्यरत है, जबकि अन्य स्कूलों में 3.36 प्रतिशत हिस्सा कार्यरत है।

गौरतलब है कि पिछले साल ही मोदी सरकार ने नयी शिक्षा नीति पेश की थी, जिसमें प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक क्रांतिकारी बदलाव के सपने दिखाए गए थे। नए शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने अभी पद भार संभालने के कुछ ही दिनों में नयी शिक्षा नीति के अनुरूप काम करने की प्रतिबद्धता भी जतलाई है। यूडीआईएसई+ के आंकड़े देश में शिक्षकों की नियुक्ति का हाल बयां कर रहे हैं। ऐसे में याद रखना उचित होगा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में छात्र-शिक्षक अनुपात (पीटीआर) 30.1 रखने का जिक्र किया गया है यानी हर तीस विद्यार्थियों के लिए एक शिक्षक होना चाहिए। प्राथमिक कक्षाओं में 30 से ऊपर की पीटीआर वाले राज्य दिल्ली और झारखंड हैं।

दिल्ली में यह अनुपात 32.7 है, तो झारखंड में 30.6 है। जबकि सभी राज्यों में उच्चतर-प्राथमिक स्तर के लिए पीटीआर 30 से कम है, हालांकि माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्तरों के मामले में स्थिति ऐसी नहीं है। माध्यमिक स्तर के लिए 30 से ऊपर के पीटीआर वाले राज्यों में बिहार (51.8), झारखण्ड (33.7), और गुजरात में (32.6) है। उच्चतर माध्यमिक स्तर के लिए 30 से ऊपर के पीटीआर वाले राज्यों में ओडिशा (66.1), झारखण्ड (54.5), उत्तर प्रदेश (40.5), और मध्य प्रदेश (34.6) है। हालांकि, रिपोर्ट सरकारी और निजी स्कूलों के लिए अलग से पीटीआर की स्थिति उपलब्ध नहीं कराती है।

छात्र- शिक्षक अनुपात की इस दयनीय हालत के अलावा रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि कुल स्कूलों में से 30 प्रतिशत स्कूलों में ही कम से कम एक शिक्षक को ही कम्प्यूटर चलाना और क्लास में उसका इस्तेमाल करना आता है। यहां ये ध्यान रखना जरूरी है कि कोविड-19 के कारण पिछले दो सालों से सारी पढ़ाई ऑनलाइन माध्यम से ही हो रही है। साधनसंपन्न बच्चों के लिए तो ऑनलाइन पढ़ाई कोई समस्या नहीं है, लेकिन कई घरों में कम्प्यूटर, लैपटॉप, इंटरनेट कनेक्शन, स्मार्टफोन आदि के लिए मां-बाप को जमीन और जेवर तक बेचने पड़े, तब जाकर शिक्षा का इंतजाम हो पाया।

निजी और सरकारी स्कूलों के बीच की खाई इस महामारी के दौर में और गहराई से महसूस की गई। जहां निजी स्कूलों के पास बेहतर सुविधाएं, उपकरण और संसाधनों के अलावा अनुभवी और प्रशिक्षित टीचर हैं वहीं सरकारी स्कूलों में हालात 21वीं सदी के दो दशक बाद भी नहीं सुधर पाए हैं। 2016 में तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के बारे में संसद में रिपोर्ट पेश की थी जिसके अनुसार देश में एक लाख स्कूल ऐसे हैं जहां सिर्फ एक शिक्षक तैनात हैं, इसमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तराखंड के हाल सबसे बुरे बताए गए थे।

नई रिपोर्ट यही बताती है कि पिछले पांच-सात सालों में देश विश्वगुरु बनने की राह में बढ़ता दिखाई नहीं दे रहा, क्योंकि गुरुओं की भारी कमी हमारे स्कूलों में हैं। वैसे यूडीआईएसई + की ताजा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2019-20 में प्राथमिक से लेकर उच्चतर माध्यमिक स्तर पर नामांकन कराने वाले बच्चों की संख्या में पिछले साल के मुकाबले 1.6 प्रतिशत (42.3 लाख) की बढ़ोतरी हुई है। खासकर लड़कियों का नामांकन भी काफी बढ़ा है. लेकिन नामांकन की यह सकारात्मक तस्वीर सुविधाओं के अभाव में अधूरी लगती है।

देश के करीब 17 प्रतिशत स्कूलों में बिजली तक नहीं है. 84.1 प्रतिशत स्कूलों में लाइब्रेरी या किताबें पढ़ने के लिए एक कमरा है, लेकिन किताबें सिर्फ 69.4 प्रतिशत स्कूलों में हैं। 61 प्रतिशत से ज्यादा स्कूलों में कंप्यूटर नहीं हैं और करीब 78 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट नहीं है। स्कूलों में विकलांग छात्रों के लिए भी सुविधाओं का अभाव है। करीब 30 प्रतिशत स्कूलों में व्हीलचेयर चढ़ाने के लिए रैंप नहीं है और लगभग 79 प्रतिशत स्कूलों में विकलांगों के लिए अलग से शौचालय तक नहीं है।
शिक्षकों की कमी से लेकर जरूरी संसाधनों और सुविधाओं का ये अभाव विश्वगुरु बनने का ख्वाब देखने वाले भारत का कड़वा सच है। इस सच का सामना पहले सरकार को करना चाहिए, आबादी पर नियंत्रण की बात उसके बाद हो तो बेहतर है।
(देशबन्धु से साभार)

Comment:

Latest Posts

kolaybet giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
jojobet güncel
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
jojobet
jojobet
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet giriş
favorisen
betpark giriş
hitbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpas giriş
bettilt giriş
hitbet giriş
hitbet
interbahis giriş
hitbet giriş
betgaranti giriş
grandpashabet
jojobet
betgaranti giriş
jojobet