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आज का चिंतन

हमारे लिए वायु का क्या महत्व है ?

श्वास हमें किस प्रकार पवित्र करते हैं?

मरुतः पिबत ऋतुना पोत्राद् यज्ञं पुनीतन।
यूयं हि ष्ठा सुदानवः ।
ऋग्वेद मन्त्र 1-15-2

(मरुतः) वायु, श्वास (पिबत) पीना (ऋतुना) उचित प्रकार से, ऋतुओं के अनुसार (पोत्रात्) पवित्र करने वाले (यज्ञम्) त्याग (पुनीतन) पवित्र कर दो (यूयम्) आप (हि) निश्चय से (स्था) हो (सुदानवः) बुराईयों के नाशक, प्रत्येक वस्तु सुन्दरता से उपलब्ध करवाने वाले ।

व्याख्या:-
हमारे लिए वायु का क्या महत्व है?
श्वास हमें किस प्रकार पवित्र करते हैं?
वैज्ञानिक रूप से – जिस प्रकार सूर्य समस्त वनस्पतियों के रस को पीता है, वायु भी उन्हीं रसों को पीती है। इस मन्त्र में सोम अव्यक्त है। वायु शुद्धि करने वाली है, अतः यह शुद्ध करती है और हमारे त्याग का विस्तार करती है। वायु निश्चित रूप से सभी बुराईयों की नाशक है जैसे दुर्गन्ध इत्यादि की। इस प्रकार वायु हमें सब कुछ सुन्दर तरीके से उपलब्ध कराती है।
आध्यात्मिक रूप से – हमारे श्वास अर्थात् प्राण तथा अपान, जिस वायु को हम शरीर के अन्दर ले जाते हैं और बाहर छोड़ते हैं, हमारे शरीर को पूरी तरह से शुद्ध करती है। वायु में शुद्ध करने वाले गुण होते हैं। हमारे प्राण हमें शुद्ध करने के साथ-साथ हमारा संरक्षण भी करते हैं और हमारे त्याग को विस्तृत करते हैं। इस प्रकार हमारे प्राण अर्थात् वायु हमारे मस्तिष्क में से निश्चित रूप से सभी बुरे विचारों का नाश कर देती है।

जीवन में सार्थकता
दिव्य शक्तियों का विकास कैसे करें?
बृहद स्तर पर परमात्मा वायुमंडलीय हवा के माध्यम से ही हमें संरक्षित तथा शुद्ध करते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर हमारे द्वारा लिये गये श्वास-प्रश्वास हमें संरक्षित करते हैं , शुद्ध करते हैं और हमारे त्याग का विस्तार करते हैं, शुभ लक्षणों की वृद्धि करते हैं और बुरे विचारों का नाश करते हैं। हमें सदैव इन दिव्य शक्तियों पर ध्यान एकाग्र करना चाहिए, जो हम सबको सर्वोच्च दिव्य शक्ति परमात्मा की तरफ से प्रदान किये गये हैं। महान् दिव्य आत्मायें अपनी दिव्यताओं का विस्तार अपने श्वास से भी करते हैं। उनकी उपस्थिति और यहाँ तक कि उन दिव्य आत्माओं का ध्यान अवस्था में विचार करने से ही हमें उनके त्यागमय जीवन का परिणाम प्राप्त होता है।


अपने आध्यात्मिक दायित्व को समझें

आप वैदिक ज्ञान का नियमित स्वाध्याय कर रहे हैं, आपका यह आध्यात्मिक दायित्व बनता है कि इस ज्ञान को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचायें जिससे उन्हें भी नियमित रूप से वेद स्वाध्याय की प्रेरणा प्राप्त हो। वैदिक विवेक किसी एक विशेष मत, पंथ या समुदाय के लिए सीमित नहीं है। वेद में मानवता के उत्थान के लिए समस्त सत्य विज्ञान समाहित है।

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आईये! ब्रह्माण्ड की सर्वोच्च शक्ति परमात्मा के साथ दिव्य एकता की यात्रा पर आगे बढ़ें। हम समस्त पवित्र आत्माओं के लिए परमात्मा के इस सर्वोच्च ज्ञान की महान यात्रा के लिए शुभकामनाएँ देते हैं।

शुभकामनाओं सहित,

विमल वधावन योगाचार्य
एडवोकेट, सर्वोच्च न्यायालय
वाट्सएप नम्बर-0091 9968357171
गायत्री गुप्ता योगाचार्या
अशोक कुमार गुप्ता
एस.पी. कुमार

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