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आज का चिंतन

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने आखिर किस मनु का विरोध किया है ?

✍🏻 लेखक – डॉ० सुरेन्द्रकुमार ( मनुस्मृति भाष्यकार एवं समीक्षक )

📚 आर्य मिलन

🌹 ( अ ) डॉ० अम्बेडकर का मनु प्राचीन मनुओं से भिन्न है : डॉ० भीमराव अम्बेडकर ने अपने साहित्य में अनेक स्थलों पर ‘ मनु ‘ का नाम लेकर कटु आलोचना की है । ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि वे किस मनु का समर्थन कर रहे हैं और किसकी आलोचना कर रहे हैं ?

इसका उत्तर उन्होंने स्वयं दे दिया है । डॉ० अम्बेडकर के अनुयायी और मनु – विरोधियों को उस पर गम्भीरता से ध्यान देना चाहिए । उन्होंने मनुस्मृति विषयक एक नयी मान्यता स्वीकृत की है । उस मान्यता को लेकर मतभेद हो सकता है , किन्तु उन्होंने इस स्वीकृति में यह स्पष्ट कर दिया की में किस ‘मनु’ नामक व्यक्ति का विरोध कर रहा हूँ । डॉ० अम्बेडकर की मान्यता है कि वर्तमान में उपलब्ध मनुस्मृति आदिकालीन मनु द्वारा रचित नहीं है , अपितु पुष्यमित्र शुङ्ग ( ई . पूर्व 185 ) के काल में ‘मनु सुमति भार्गव’ नाम के व्यक्ति ने इसको रचा है और उस पर अपना छद्म नाम ‘मनु’ लिख दिया है । वही सुमति भार्गव उनकी निन्दा और आलोचना का केन्द्र है । इस बात को उन्होंने दो स्थलों पर स्वयं स्पष्ट किया है । वे लिखते हैं —

🌻 ( क ) “ प्राचीन भारतीय इतिहास में ‘मनु’ आदरसूचक संज्ञा थी । इस संहिता ( मनुस्मृति ) को गौरव प्रदान करने के उद्देश्य से मनु को इसका रचयिता कह दिया गया । इसमें कोई शक नहीं है कि यह लोगों को धोखे में रखने के लिए किया गया । जैसी कि प्राचीन प्रथा थी , इस संहिता को भृगु के वंश से जोड़ दिया गया ।…. इसमें हमें इस संहिता के लेखक के परिवार के नाम की जानकारी मिलती है । लेखक का व्यक्तिगत नाम इस पुस्तक में नहीं बताया गया है , जबकि कई लोगों को इसका ज्ञान था । लगभग चौथी शताब्दी में नारद स्मृति के लेखक को मनुस्मृति के लेखक का नाम ज्ञात था । नारद के अनुसार ‘ सुमति भार्गव ‘ नाम के एक व्यक्ति थे जिन्होंने मनुसंहिता की रचना की ।….. इस प्रकार मनु नाम ‘सुमति भार्गव’ का छद्म नाम था और वह ही इसके वास्तविक रचयिता थे” ( अम्बेडकर वाड्मय , भाग 7 , पृ० 151 ) ।

एक अन्य पुस्तक में वे लिखते हैं — “मनु के काल – निर्धारण के प्रसंग में मैंने सन्दर्भ देते हुए बताया था कि मनुस्मृति का लेखन ईसवी पूर्व 185 , अर्थात पुष्यमित्र की क्रान्ति के बाद सुमति भार्गव के हाथों हुआ था ।” ( वही , भाग 7 , पृ० 116 )

🌻 ( ग ) “पाणिनि ईसा से 300 वर्ष पहले हुआ । मनु ईसा के 200 वर्ष पूर्व हुआ ।” ( वही , खण्ड 6 , पृ०59 )

🌻 ( घ ) “मनु एक कर्मचारी था जिसे ऐसे दर्शन की स्थापना के लिए रखा गया था जो ऐसे वर्ग के हितों का पोषण करे जिस समूह में वह पैदा हुआ था और जिसका महामानव ( ब्राह्मण ) होने का हक उसके गुणहीन होने के बावजूद भी न छीना जाये ।” ( वही , खण्ड 6 , पृ० 155 )

उक्त उद्धरणों की समीक्षा से ये निष्कर्ष सामने आता है कि सृष्टि का आदिकालीन मनु स्वायम्भुव या मनु वैवस्वत किसी के कर्मचारी नहीं थे , वे स्वयं चक्रवर्ती राजा ( राजर्षि ) थे । डॉ० अम्बेडकर का यह कथन उन पर लागू नहीं होता । अत: स्पष्ट है कि यह कथन मनु नामधारी सुमति भार्गव के लिए है जो ई . पूर्व 185 में राजा पुष्यमित्र शुङ्ग का कर्मचारी था । इस प्रकार डॉ० अम्बेडकर प्राचीन मनुओं का विरोध नहीं करते अपितु वे वस्तुत : पुष्यमित्र – कालीन मनु छद्म नामधारी सुमति भार्गव का विरोध करते

🌻 ( ड ) “बौद्ध धर्म के पतन के कारणों से सम्बन्धित तथ्यों को उस ब्राह्मण साहित्य से छान – बीन कर एकत्र किया जाना चाहिए , जो पुष्यमित्र की राजनीतिक विजय के बाद लिखा गया था । इस साहित्य को छह भागों में बाँटा जा सकता है — ( 1 ) मनुस्मृति , ( 2 ) गीता , ( 3 ) शंकराचार्य का वेदान्त , ( 4 ) महाभारत , ( 5 ) रामायण और ( 6 ) पुराण ।” ( वही , खण्ड 7 , ब्राह्मण साहित्य , पृ० 115 )

डॉ० अम्बेडकर यदि उपलब्ध मनुस्मृति को ईसा पूर्व 185 की रचना मानते हैं और उसे ‘मनु’ छद्म नामधारी सुमति भार्गव रचित मानते हैं तो प्राचीन मनुओं ने कौन – सा धर्मशास्त्र रचा ? यह प्रश्न शेष रहता है । उसका उत्तर भी उन्होंने स्वयं दिया है । उनका कहना है

🌻 ( च ) “वर्तमान मनुस्मृति से पूर्व दो अन्य ग्रन्थ विद्यमान थे । इनमें से एक ‘मानव अर्थशास्त्र’ अथवा ‘मानवराजशास्त्र’ अथवा ‘मानव राजधर्मशास्त्र’ के नाम से एक पुस्तक बतायी जाती थी । एक अन्य पुस्तक ‘मानव गृहयसूत्र’ के नाम से जानी जाती थी । “ ( वही , भाग 7 , पृ० 152 )

इस प्रकार स्पष्ट हुआ कि डॉ० अम्बेडकर ने अपने आदिपुरुषों और आदि विधिप्रणेताओं प्राचीन – मनुओं और उन द्वारा रचित साहित्य की आलोचना नहीं की है उन्होंने तो 185 ईस्वी पूर्व पुष्यमित्र शुङ्ग के काल में ‘मनु’ छद्म नामधारी सुमति भार्गव और उनके द्वारा रचित जाति – पाँति विधायक विधानों की आलोचना की है ।

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🌹 ( आ ) वह मनु मौर्यकालीन सुमति भार्गव है : पाश्चात्य लेखकों की समीक्षा से प्रभावित होकर डॉ० अम्बेडकर ने मनुस्मृति का काल 185 ई . पू . माना और इसका आद्य रचयिता ‘सुमति भार्गव मनु’ को माना । प्राचीन वैदिक ग्रन्थों की परम्परा का ज्ञान तथा उनका गम्भीर अध्ययन न होने के कारण डॉ० अम्बेडकर इस विषयक तथ्यात्मक चिन्तन नहीं कर सके । उनसे यह भूल हुई है । गत पुष्ट प्रमाणों के आधार पर वास्तविकता यह है कि मनुस्मृति मूलत: स्वायम्भुव मनु की रचना है । यह आदिकालीन है । जैसा कि एक स्थान पर डॉ० अम्बेडकर ने स्वयं लिखा है

“ इससे प्रकट होता है केवल मनु ने विधान बनाया । जो स्वायम्भुव मनु था ।” ( अम्बेडकर वाड्मय , खण्ड 8 , पृ० 283 )

इस मनु तथा इसके धर्मशास्त्र का उल्लेख प्राचीनतम संहिताग्रन्थों , ब्राह्मणग्रन्थों , आरण्यकों , उपनिषदों , रामायण , महाभारत , गीता , बौद्धसाहित्य , जैनसाहित्य , पुराणों और प्राचीन शिलालेखों में आता है जो ईसा से बहुत पहले की कृतियाँ हैं । अत: मनुस्मृति को मूलत: और पूर्णत: सुमति भार्गव की आद्य रचना मानना एक ऐतिहासिक भूल है तथा साहित्यिक परम्परा के विपरीत है । वंश – परम्परा और काल – परम्परा की कसौटी पर भी यह स्थापना गलत सिद्ध होती है ।

डॉ० अम्बेडकर ने जिस सुमति भार्गव का उल्लेख किया है , उन्होंने लिखा है कि उसकी चर्चा नारद – स्मृति में आती है । यह अनुमान विश्वास किये जाने योग्य है कि बौद्ध धर्म के ह्रास के बाद , ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुङ्ग ( 185 ई० ) के द्वारा अपने राजा की हत्या करके स्वयं को राजा घोषित करने के उपरान्त , उसके द्वारा जब ब्राह्मणवाद की पुन : स्थापना हुई , तब सुमति भार्गव ने मनुस्मृति में पर्याप्त परिवर्तन – परिवर्धन किये हों और उसका एक नया संस्करण तैयार किया हो जिसमें वर्णव्यवस्था पर जन्मना जातिवाद की स्थापना करने की कोशिश की गयी है । यही कारण है कि उपलब्ध मनुस्मृति में दोनों सिद्धान्तों का विधान करने वाले परस्पर विरोधी श्लोक साथ – साथ पाये जाते हैं ।

डॉ० अम्बेडकर यदि इस पक्ष पर विशेष विचार कर लेते कि मनुस्मृति में एक ओर गुण – कर्म – योग्यता पर आधारित व्यवस्था वाले , शूद्र और नारियों का सम्मान बढ़ाने , न्यायपूर्ण श्लोक हैं , जिनका कि प्रमाण देकर स्वयं उन्होंने भी एक तरह से समर्थन किया है तथा दूसरी ओर जाति – पाँति , ऊँच – नीच , छूत – अछूत वर्णक एवं पक्षपातपूर्ण श्लोक हैं । किसी विद्वान् की रचना में यह दोष सम्भव नहीं है , मनुस्मृति में क्यों है ? तब उन्हें स्वतः उत्तर मिल जाता कि इसमें बाद में लोगों ने प्रक्षेप किये हैं । डॉ० अम्बेडकर ने वेदों में पुरुष – सूक्त को प्रक्षिप्त माना , रामायण , महाभारत , गीता , पुराणों में प्रक्षेप होना स्वीकार किया , किन्तु मनुस्मृति में प्रक्षेपों का होना नहीं माना । यह न केवल आश्चर्यपूर्ण है , अपितु रहस्यमय भी है ! उन्होंने ऐसा क्यों नहीं स्वीकार किया , यह विचारणीय है ! उन्होंने इस विसंगति का उत्तर भी नहीं दिया कि मनुस्मृति में प्रकरणविरोधी परस्परविरोधी श्लोक क्यों हैं ? अभार यदि वे इस बात का उत्तर देने को उद्यत होते तो उन्हें प्रक्षेपों की सच्चाई को अवश्य स्वीकार करना ही पड़ता ।

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🌹( इ ) डॉ० अम्बेडकर के चिन्तन के निष्कर्ष : डॉ० अम्बेडकर की मान्यताओं से हमें ये निष्कर्ष मिलते हैं ।

🌻 1 . डॉ० अम्बेडकर का नाम लेकर बात – बात पर मनु एवं मनुस्मृति का विरोध करने और मनुवाद का नारा देनेवाले उनके अनुयायियों का कर्तव्य बनता है कि उनकी इस विषयक मान्यता स्पष्ट हो आने के बाद अब उसे ईमानदारी से स्वीकार करें और आचरण में लायें । उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि वे आदिपुरुष मनु का नहीं , अपितु छद्म नामधारी सुमति भार्गव का विरोध कर रहे हैं ।

अब उन्हें ‘ मनु ‘ और ‘ मनुवाद ‘ शब्दों का प्रयोग छोड़कर ‘ सुमति भार्गव ‘ और ‘ सुमति भार्गववाद ‘ शब्दों का प्रयोग करना चाहिए । क्योंकि ‘ मनु ‘ प्रयोग से भ्रान्ति फैलती है और निर्दोष आदि – पुरुषों का देश – विदेश में अपमान होता है । ऐसा करना अपने आदिपुरुषों के साथ अन्याय है । इस बात को यदि हम इस प्रकार समझे तो बात आसानी से समझ में आ जायेगी । जैसे , आज कोई व्यक्ति ‘ अम्बेडकर ‘ छद्म नाम रखकर जाति पाँति , ऊँच – नीच आदि कुप्रथाओं का समर्थक ग्रन्थ लिख दे , तो उसे संविधान प्रस्तोता अम्बेडकर का ग्रन्थ कहना और उस विचारधारा को ‘अम्बेडकरवाद’ कहना अनुचित होगा , उसी प्रकार जाति – पाँति विषयक श्लोकों को ‘ मनुरचित ‘ कहना या ‘ मनुवाद ‘ कहना अनुचित है । क्योंकि आदिकालीन मनुओं के समय जाति – पाँति नहीं थी , और जाति – पाँति जब चली तब उन मनुओं का अस्तित्व नहीं था ।

🌻 2 . उन्हें यह स्पष्ट बताना चाहिए कि हम उस ‘ मनु ‘ छद्मनामधारी सुमति भार्गव – रचित स्मृति के उन अंशों का विरोध कर रहे हैं जिनमें जातिवाद का वर्णन है और जो 185 ईसवी पूर्व लिखे गये थे क्योंकि डॉ० अम्बेडकर ने इसी सुमति भार्गव का विरोध किया है । साथ ही यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिए कि उन द्वारा प्रयुक्त ‘ मनु ‘ नाम इसी व्यक्ति का छद्म नाम है ।

🌻 3 . डॉ० अम्बेडकर ने शूद्रों के भी ‘ आदरणीय ‘ ‘ आदिपुरुष ‘ मनु ‘ या मनुओं का कहीं भी विरोध कर उन्हें अपमानित नहीं किया , अपितु तत्कालीन व्यवस्था की प्रशंसा ही की है । डॉ० अम्बेडकर का लक्ष्य यह नहीं था । डॉ० अम्बेडकर के अनुयायियों को भी अपने ‘ आदिपुरुष ‘ मनुओं का विरोध त्याग देना चाहिए ।

🌻 4 . डॉ० अम्बेडकर ने जिस छद्म नामधारी ‘ मनु ‘ का विरोध किया है उस पर आरोप है कि उसने शूद्रों के लिए अत्याचार और अन्यायपूर्ण तथा अमानवीय व्यवस्थाएँ निर्मित कीं , जिनके कारण शूद्र पिछड़ते चले गये और दलित हो गये । कोई कितनी भी निन्दा करे किन्तु जब भी दो विचारधाराओं का टकराव होता है तब विजेता विजित पर बदले की भावना से या आक्रोश में अमानवीय व्यवहार करता है और विपक्षी का भरसक दमन करता है । गत कुछ सहस्राब्दियों में ऐसा यदि ब्राह्मणों ने शूद्रों के साथ किया तो शूद्रों ने ब्राह्मणों के भी साथ किया । डॉ० अम्बेडकर ने माना है कि *“इसके पश्चात् मौर्य हुए जिन्होंने ईसा पूर्व 322 से ईसा पूर्व 183 शताब्दी तक शासन किया , वे भी शूद्र थे । इस प्रकार लभग 140 वर्षों तक मौर्य साम्राज्य रहा , ब्राह्मण दलित और दलितवर्गों की तरह रहे । बेचारे ब्राह्मणों के पास बौद्ध साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था । यही विशेष कारण था , जिससे पुष्यमित्र ने मौर्यसाम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया ।” ( वही , भाग 7 , ‘ शूद्र और प्रतिक्रान्ति ‘ , पृ० 323 , ब्राह्मणवाद की विजय , पृ० 149 )

🌻 5 . जो कुछ हुआ , वह वैचारिक वर्गसंघर्ष का परिणाम था । अपने अपने समय में दोनों ने एक – दूसरे को ‘ दलित ‘ बनाने में कोई कसर नहीं रखी । लेकिन दोनों को आज उस अतीत को भुलाकर लोकतान्त्रिक ढंग से रहना होगा । आज भारत में लोकतन्त्र प्रणाली है और शासन – प्रशासन एक नये संविधान के अनुसार चलता है । इस प्रणाली में सभी समुदायों और महापुरुषों के लिए समान स्थान है । बात – बात पर किसी समुदाय और महापुरुष का विरोध करना और असहनशीलता का प्रदर्शन करना , कदापि उचित नहीं माना जा सकता । इससे एक नये वर्गसंघर्ष की आशंका बढ़ती जायेगी जो समरसता , सुधारीकरण की प्रक्रिया और लोकतन्त्र – प्रणाली के लिए अशुभ सिद्ध होगी ।

🌻 6 . जो लोग अपने को ‘ शूद्र ‘ समझते हैं और अभी तक किसी कारण से स्वयं को ‘ शूद्रकोटि ‘ में मानकर मानवीय स्वाभाविक अधिकारों से वञ्चित रखा हुआ है , मनु को धर्मगुरु मानने वाला और मनु के सिद्धान्तों तथा व्यवस्थाओं पर चलनेवाला महर्षि दयानन्द द्वारा प्रवर्तित ‘आर्यसमाज’ योग्यतानुसार किसी भी वर्ण में दीक्षित होने का उनका आह्वान करता है और उन्हें व्यावहारिक अवसर देता है । उनसे समानता , सहृदयता का व्यवहार करता है । उनके हितों का पक्षधर है । जब आज का संविधान नहीं बना था , उससे बहुत पहले महर्षि दयानन्द ने मनुस्मृति के आदेशों के परिप्रेक्ष्यों में छूत – अछूत , ऊँच – नीच , जाति – पाँति , नारी – शूद्रों को न पढ़ाना , बाल – विवाह , अनमेल – विवाह , बहु – विवाह , सतीप्रथा , शोषण आदि को सामाजिक बुराइयाँ घोषित करके उनके विरुद्ध संघर्ष का आह्वान किया था । नारियों के लिए गुरुकुल और विद्यालय खोले । अपनी शिक्षा संस्थाओं में कथित शूद्रों को प्रवेश दिया । परिणामस्वरूप वहाँ से शिक्षित सैकड़ों दलित युवक – युवतियाँ संस्कृत एवं वेद – शास्त्रों के विद्वान् स्नातक बन चुके हैं ।

दलित जाति के लोग क्यों भूलते हैं कि उनकी अस्पृश्यता को मिटाने के लिए मनु के अनुगामी ऋषि दयानन्द के शिष्य कितने ही आर्यसमाजी स्वयं ‘ अस्पृश्य ‘ बन गये थे , किन्तु उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष को नहीं छोड़ा । आज आर्यसमाज का वह संघर्ष स्वतन्त्र भारत का आन्दोलन बन चुका है । आज भी आर्यसमाज का प्रमुख लक्ष्य जातिभेद – उन्मूलन और सबको शिक्षा का समान अधिकार दिलाना है । दलित जन आर्यसमाज की शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश लेकर भेदभाव रहित परिवेश में वेदादिशास्त्रों का अध्ययन कर सकते हैं । आर्यसमाज सिद्धान्त और मानवीय , दोनों आधारों पर दलित एवं पिछड़े वर्गों का स्वाभाविक हितैषी है । जो दलित या अन्य लेखक दलितोत्थान में आर्यसमाज के योगदान से अनभिज्ञ रहकर आर्यसमाज पर भी सन्देहात्मक प्रतिक्रिया करते हैं , यह उनकी अकृतज्ञता ही कही जायेगी ।

बुद्धिमानी इसी में है कि दोनों को मिलकर अमानवीय व्यवस्थाओं , सामाजिक कुप्रथाओं , रूढ़ – परम्पराओं तथा कुरीतियों के विरुद्ध प्रयत्न जारी रखने चाहिए । बहुत – सी कुप्रथाएँ नष्ट – भ्रष्ट हो चुकी हैं , शेष भी हो जायेंगी । परस्पर आरोप – प्रत्यारोप में उलझने तथा प्रतिशोधात्मक मानसिकता अपनाने के बजाय , आइए , उस रूढ़ विचारधारा के विरुद्ध मिलकर संघर्ष करें । जिस विचारधारा ने संस्कृति और मानवता को कलंकित किया है , समाज को विघटित किया है , राष्ट्र को खण्डित किया है और जिसने असंख्य लोगों के जीवन को असमानता के नरक में धकेल कर नारकीय जीवन जीने को विवश किया है । आइए , उस नरक को स्वर्ग में बदलने का संकल्प लें ।

[ डॉ० सुरेन्द्रकुमार जी का ये लेख “राजर्षि मनु और उनकी मनुस्मृति “ पुस्तक से लिया गया है , इस कालजयी ग्रंथ के लेखक एवं संकलन-सम्पादक डॉ० सुरेन्द्रकुमार आचार्य जी ही है । इस ग्रंथ में मनुस्मृति – विषयक विभिन्न बिन्दुओं की विभिन्न विद्वानों द्वारा तर्क – प्रमाणयुक्त समीक्षा है । पाठक इसे पढ़ कर भगवान मनु के बारे में फैली शंकाओ का समाधान पाएँगे । ये पुस्तक पर उपलब्ध है । – 📚 आर्य मिलन ]

✍🏻 लेखक – डॉ० सुरेन्द्रकुमार ( मनुस्मृति भाष्यकार एवं समीक्षक )

📚 आर्य मिलन

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