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भारतीय स्वाधीनता का अमर नायक राजा दाहिर सेन , अध्याय -1, भाग – 2

भारतीय स्वाधीनता का अमर नायक राजा दाहिर सेन अध्याय – 1 (भाग – 2)

इतिहास के काल निर्धारण में दोष

वास्तव में इन नगर सभ्यताओं के बारे में उनकी प्राचीनता की ऐसी कल्पना करना केवल माथापच्ची करना है या कहिए कि अंधेरे में तीर मारने के समान है। जो लोग इन नगर घाटी सभ्यताओं के आधार पर भारत की संस्कृति की प्राचीनता का अनुमान लगाते हैं या आंकलन कर विद्वता की डींगें मारते हैं वह देश के इतिहास और जनमानस की और भी अधिक हानि कर जाते हैं ऐसी माथापच्ची करने वाले लोग वही हैं जो वैदिक संस्कृति, आर्य ,आर्य भाषा और आर्यावर्त की मान्यताओं और सिद्धांतों में विश्वास नहीं करते हैं या उन मान्यताओं और सिद्धांतों का उपहास उड़ाने के लिए जाने जाते हैं। अतः जो लोग भारत का उपहास उड़ाने के लिए जाने जाते हैं उनसे यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे भारत के संदर्भ में कोई सही निष्कर्ष हमें लाकर दे देंगे ?
क्योंकि जिस देश के पास महाभारत काल में मय नाम का ऐसा कुशल शिल्पकार रहा हो जिसने पांडवों के इंद्रप्रस्थ में ऐसा राजभवन बना दिया था जिसमें सूखे में गीला और गीले में सूखा होने की अनुभूति होती थी और जिसमें एक साथ हजारों लोग बैठकर देश और विश्व की समस्याओं पर विचार कर सकते थे, उस देश में नगरों की सभ्यता का विकास हड़प्पा मोहनजोदड़ो के काल से मानना मूर्खता होगी। इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि महाभारत से लाखों वर्ष पूर्व रामायण काल में भी हमें भारत की वास्तुकला और स्थापत्य कला के ऐसे प्रमाण मिलते हैं जो आज के वैज्ञानिक युग की स्थापत्य कला को भी पीछे छोड़ने की खुली चुनौती देते हैं।

हड़प्पा मोहनजोदड़ो सभ्यता की प्राचीनता

इतना ही नहीं, हमें महर्षि मनु के उस शासन काल को भी याद रखना चाहिए जब इस संसार में पहली बार राज्य व्यवस्था विकसित हो रही थी और हमारे पूर्वज उस समय भी स्थापत्य कला और वास्तुकला के महान विशेषज्ञ थे। चाणक्य ने भी राजा के भवन किले आदि कैसे होनी चाहिएं – इस पर हमें विस्तार से जानकारी दी है । अतः हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की सभ्यता को भारत की ‘पिता सभ्यता’ स्वीकार करना भारत के पुरुषार्थ और पूर्वजों के ज्ञान विज्ञान की उपेक्षा कर अपने पैरों पर अपने आप कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। हमारा मानना है कि अपने बारे में जानने के लिए हड़प्पा व मोहनजोदड़ो को कल परसों के इतिहास के खण्डहर या शहर मानकर इसके बहुत पीछे हमें जाना चाहिए।

हड़प्पा मोहनजोदड़ो दोनों अर्वाचीन।
वैदिक सभ्यता विश्व में सबसे है प्राचीन।।

आई0आई0टी0 खड़गपुर और भारतीय पुरातत्व विभाग के वैज्ञानिकों ने सिन्धु घाटी सभ्यता की प्राचीनता को लेकर अपनी ओर से कुछ नई बातें जोड़ी हैं। इन वैज्ञानिकों की मान्यता है कि यह सभ्यता 5500 वर्ष नहीं अपितु 8000 वर्ष पुरानी थी। इस नए निष्कर्ष से विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि यह सभ्यता मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यता से भी पहले की है। इन तथाकथित विद्वानों की दृष्टि में मिस्र की सभ्यता 7,000 ईसा पूर्व से 3,000 ईसा पूर्व तक रहने के प्रमाण मिलते हैं, जबकि मोसोपोटामिया की सभ्यता 6500 ईसा पूर्व से 3100 ईसा पूर्व तक अस्तित्व में थी। शोधकर्ताओं ने इसके अतिरिक्त हड़प्पा सभ्यता से 1,0000 वर्ष पूर्व की सभ्यता के प्रमाण भी खोज निकाले हैं।
जब हमारे आज के तथाकथित विद्वान नगरीय सभ्यता की प्राचीनता पर चिंतन करते हैं या कोई निष्कर्ष निकालते हैं तो उनका निष्कर्ष कुछ ऐसा आभास देता है जैसे इस नगरीय सभ्यता से पूर्व उस देश या स्थान के लोग अंधकार युग में रहते थे और उनके पूर्वज कुछ नहीं जानते थे। जबकि हमें ऐसी नगरीय सभ्यताओं के विषय में अपना अंतिम निष्कर्ष स्थापित करने से पहले इस तथ्य को समझना चाहिए कि ऐसी नगरीय सभ्यता किसी ऐसी सभ्यता की अन्तिम कड़ी हो सकती है जो अपना अत्यंत प्राचीन इतिहास रखती हो। हड़प्पा मोहनजोदड़ो की सभ्यता वैदिक सभ्यता की लम्बी श्रंखला की एक कड़ी थी और वह कड़ी भी टूटी नहीं। उसके उपरान्त आज तक हम उसी वैदिक सभ्यता की आधुनिकतम कड़ियों में आ चुके हैं। मानव सभ्यता एक सतत प्रवाहमान सभ्यता है । इसमें पूर्णविराम सृष्टि के प्रलयकाल पर जाकर ही लगेगा, इस तथ्य को हमें भूलना नहीं चाहिए।

सिन्ध और रामायण काल में समानता

कुछ तथाकथित विद्वानों ने सिंधु सभ्यता और रामायण कालीन सभ्यता के बीच समन्वय स्थापित करने का अतार्किक और अवैज्ञानिक प्रयास किया है। उनके अनुसार हड़प्पा मोहनजोदड़ो की सभ्यता और सिंधु घाटी की सभ्यता लगभग 8000 वर्ष पुरानी है। जबकि रामायण काल केवल 5114 ईसा पूर्व का है। इन लोगों के अनुसार अब 2021 में रामायण काल को लगभग 7000 वर्ष हुए हैं। इसका अभिप्राय हुआ कि रामायण काल से भी 1000 वर्ष पहले सिंधु घाटी सभ्यता थी। इसके अलावा अन्य कई तरह की शोध से यह पता चला कि यह सभ्यता 8,000 वर्ष पुरानी है। इस प्रकार की निराधार बातों पर हमारा कोई विश्वास नहीं है।

राजा दाहिर सेन और ब्राह्मण वंश

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि रामचंद्र जी और उनका सूर्यवंश संसार का सबसे पहला राजवंश है। इसी सूर्यवंश से भारत वर्ष के लगभग सभी राजवंशों की शाखाएं परम्परा के रूप में विकसित हुई हैं। ऐसी परिस्थितियों में यह भी सर्वमान्य सत्य है कि सिंधु प्रदेश में जिस राजवंश की परम्परा कार्य करती रही वह भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत के इसी सूर्यवंशी राजवंश से ही जुड़ी हुई रही होंगी। यदि राजा दाहिर सेन को कुछ लोगों ने ब्राह्मण कहकर उनके वंश को अलग से स्थापित होना दिखाया है या माना है तो यह भी भारत के प्राचीन इतिहास के साथ की गई एक गम्भीर छेड़छाड़ है । जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। राजा दाहिर और उनके पूर्वजों की विद्वत्ता के कारण यदि उन्हें ब्राह्मण माना जाए तो इसका अभिप्राय यह नहीं हो जाता कि वह क्षत्रिय नहीं रहे। उनके पूर्व राजा जनक जैसे सम्राट भी इस संसार में हुए हैं, जो विदेह कहे जाते थे । राजा जनक को ‘विदेह’ इसलिए कहा जाता था कि वह राजकाज में रमकर भी उसके विचारों की छाया को अपनी आत्मा पर नहीं पड़ने देते थे।

हमें दिखता है शौर्य भारत के हर काल में।
सभ्यता और संस्कृति दमकती भारत भाल में।
प्रताप व प्रकाश का मनोहारी मिलन देखो यहाँ।
शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत चलन देखो यहाँ।।

महाभारत काल और सिंधुदेश

महाभारत युद्ध के समय सिंध का शासक जयद्रथ था। जिसके बारे में हम सभी जानते हैं कि वह दुर्योधन की बहन दुशाला का पति था। महाभारत के युद्ध में जयद्रथ का दुर्योधन के पक्ष से लड़ना यह प्रमाणित नहीं करता कि उस समय सिंध देश भारत से अलग था । जयद्रथ दुर्योधन का बहनोई था और दूसरे उसका अपना गुण-कर्म-स्वभाव भी दुर्योधन के अनुकूल था, इस कारण से वह दुर्योधन के पक्ष से युद्ध में उतरा था, अन्यथा उस समय सिंध भारत का ही एक प्रदेश था। जिसका स्थानीय नरेश जयद्रथ या उसका पिता रहा था। महाभारत के युद्ध में जितने भर भी राजा किसी पक्ष से लड़े थे, उन सबके चरित्र की विशेषता यह थी कि वह व्यक्तिगत कारणों से ही किसी पक्ष विशेष से लड़ाई में उतरे थे ,अन्यथा भारत माता के प्रति उन सबके ह्रदय में समान आस्था व राष्ट्रभक्ति थी । कहने का अभिप्राय है कि उन्होंने व्यक्तिगत द्वेषभाव को राष्ट्र के आड़े नहीं आने दिया।
यही कारण है कि भयंकर युद्ध करने के उपरान्त भी उन्होंने कभी ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे – इंशा अल्लाह- इंशा अल्लाह’- का नारा नहीं लगाया।
राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को अक्षुण्ण बनाए रखने का उद्देश्य उस समय दोनों पक्षों का था। व्यक्तिगत ईर्ष्या, द्वेष और घृणा की पराकाष्ठा होते हुए भी राष्ट्र की एकता और अखण्डता के प्रति समर्पण दोनों पक्षों में था। यद्यपि अपने ही राज्य को पाण्डवों और कौरवों के बीच बाँटकर धृतराष्ट्र ने एक गलत परम्परा का आरम्भ किया । जो राजा दूर देशों से चलकर उस युद्ध में लड़ने के लिए आए थे, युद्ध के पश्चात उनकी निष्ठा भी पाण्डवों के प्रति यथावत बनी रही। सम्राट युधिष्ठिर ने भी अपनी ओर से हर उस राजा के प्रति शिष्टाचार और समादर का भाव प्रकट किया जो युद्ध में दुर्योधन की ओर से लड़ने के लिए आया था। युधिष्ठिर ने ऐसा राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को बनाए रखने के लिए ही किया ।

“जाकर धीर बंधाना बंधु!
बहन दुशाला प्यारी को,
नहीं कटे पर नमक डालना
सह लेना हर गारी को।
अपनापन दिखलाना अर्जुन !
है यही धर्म की मर्यादा,
छोटी बहन को गले लगाना
तुमसे और कहूं क्या ज्यादा ?”

अपनी इसी उत्कृष्ट सद्भावना का प्रदर्शन करते हुए उसने सिंधु नरेश जयद्रथ के पुत्र के साथ भी बहुत ही शिष्टाचार और विनम्रता का व्यवहार किया। सम्राट युधिष्ठिर ने अपनी किसी व्यक्तिगत ईर्ष्या भावना को राजनीतिक संबंधों के आड़े नहीं आने दिया । इस प्रकार उन्होंने सिन्धु नरेश और सिन्धु की पवित्र भूमि दोनों का ही सम्मान करना उचित समझा । राजनीति का यही तकाजा भी है कि व्यक्तिगत बातों को या स्वभाव को राजनीतिक वार्त्तालाप से दूर रखो। राजनीतिक वार्तालाप में शुद्ध पवित्रता होनी अपेक्षित है। क्योंकि राजनीतिक वार्तालाप आपका व्यक्तिगत वार्तालाप नहीं हो सकता। उससे संपूर्ण प्रजा प्रभावित होती है ।
अपने इस प्रकार के भाव को प्रकट करते हुए युधिष्ठिर ने अर्जुन को विशेष रूप से सिंधु देश भेजा था। युद्धिष्ठिर ने अर्जुन को यह स्पष्ट कर दिया था कि बहन दुशाला यदि अपने पति जयद्रथ के वियोग में कुछ भी तुमसे कोई अपशब्द कहे तो उसके अपशब्दों को विनम्रता से स्वीकार कर लेना और उससे मेरी ओर से क्षमा याचना भी करना। अश्वमेध के घोड़े के साथ जब अर्जुन सिंधु देश में पहुंचा तो बहन दुशाला ने अपना क्रोध और शोक व्यक्त करते हुए उससे बहुत कुछ कठोर अपशब्दों का प्रयोग किया । अर्जुन ने पति वियोग में जलती हुई बहन दुशाला के साथ वही व्यवहार किया जो उसे सम्राट युद्धिष्ठिर ने समझाकर भेजा था। इसके बदले में बहन दुशाला और उसके पुत्र ने भी सम्राट युधिष्ठिर के प्रति पूरी निष्ठा प्रकट की। फलस्वरूप सिंधु प्रांत भारत के साथ पहले जैसी अवस्था में ही बना रहा।
इस प्रान्त में जिस सभ्यता के अवशेष हमें प्राप्त होते हैं वह भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की प्रतीक सभ्यता है। इसमें भारतीयता और आर्यावर्त कालीन संस्कृति के दर्शन होते हैं । जिन तथाकथित विद्वानों ने इस सभ्यता को केवल किसी प्रांत विशेष से जोड़कर देखा है, उन्होंने भारतीयता को समझने में अपनी अज्ञानता का परिचय दिया है। प्राचीन काल से ही यह स्थान अपनी कला और साहित्य के लिए तो विख्यात रहा है। वाणिज्य और व्यापार के लिए भी इसने विश्व में अपना अग्रणी और महत्वपूर्ण स्थान बनाया ।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रामायण काल में रामचन्द्र जी ने वर्तमान सिन्ध प्रान्त से लेकर ताशकन्द को भरत को दिया था। तक्ष भरत के पुत्र का नाम था, उसी के नाम पर तक्षशिला और तक्षखण्ड अर्थात ताशकन्द का नामकरण हुआ। सिन्ध नामक देश रामचन्द्रजी द्वारा भरत को दिए जाने का उल्लेख ‘रघुवंश’ में है। यूनान के लेखकों ने सिकन्दर के भारत-आक्रमण के सम्बन्ध में सिंधु-देश के नगरों का उल्लेख किया है। यूनान के विषय में हमारा मानना है कि उस समय यूनान कोई स्वतंत्र देश नहीं था ,अपितु यह भारत का ही एक अंग था। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सिंधु देश के दो बड़े नगर थे।

इतिहास की पहेली यदि खोलनी हो चाहते,
तो भारत को भारत की नजरों से देख लेना।
भारत के गुरुपद का यदि अनुमान करना चाहते,
तो भारत को अतीत के कुछ पृष्ठों से देख लेना ।।

हमें अपने इतिहास के विषय में यह बात सदा ध्यान रखनी चाहिए कि इसे भारतवर्ष की वर्तमान भौगोलिक सीमाओं के साथ संलग्न कर कभी नहीं देखना चाहिए। क्योंकि भारत विभिन्न कालों में बंटता और कटता रहा है। जितना प्राचीन भारत हम पढ़ रहे हों उतना ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस समय का भारत कहाँ से कहाँ तक था ? उदाहरण के रूप में इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि यदि 13 अगस्त 1947 की बात की जा रही हो तो भारत की सीमाओं को अफगानिस्तान तक मिली हुई देखा जाना चाहिए, इसी प्रकार अन्य कालों के बारे में भी समझ लेना चाहिए।
सिन्धु के तट पर ही हमारे महान पूर्वजों ने भारत की प्राचीन विश्व संस्कृति अर्थात वैदिक संस्कृति के गीत गाए थे। सिंधु तट ने भारत के उस गौरवपूर्ण कालखंड को देखा है जब यहाँ के वैदिक गीतों की लय को सुनने के लिए विश्व के सभी अंचलों से लोग आया करते थे। उन लोगों के यहाँ आने का उद्देश्य अपने जीवन को कल्याण पथ का पथिक बनाना होता था । यहाँ के ज्ञान विज्ञान को सीखकर वे श्रेष्ठ मानव बनकर अपने-अपने देशों को लौटते थे।
इस प्रकार सारे विश्व को सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाने में सिन्धु देश ने प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लोगों ने सिन्धु से वैदिक दर्शन सीखकर अपने जीवन व्यवहार को उन्नत बनाकर अनेकों प्रकार के अनुसंधान किए थे। उन्होंने वैदिक संस्कृति के निमित्त अपने जीवन में अनेकों महान कार्य किए ।
यहाँ पर यह स्पष्ट करना भी उचित होगा कि सिन्धु घाटी सभ्यता के उन लोगों ने अपनी कोई अलग संस्कृति या धर्म स्थापित नहीं किया था। जैसा कि आजकल के कुछ विद्वानों ने एक भ्रांत धारणा उनके विषय में बना ली है।

(हमारी यह लेख माला मेरी पुस्तक “राष्ट्र नायक राजा दाहिर सेन” से ली गई है। जो कि डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा हाल ही में प्रकाशित की गई है। जिसका मूल्य ₹175 है । इसे आप सीधे हमसे या प्रकाशक महोदय से प्राप्त कर सकते हैं । प्रकाशक का नंबर 011 – 4071 2200 है ।इस पुस्तक के किसी भी अंश का उद्धरण बिना लेखक की अनुमति के लिया जाना दंडनीय अपराध है।)

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत एवं
राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

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