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बोलते समय सावधानी आवश्यक क्योंकि जिह्वा पर सरस्वती का वास होता है

नंदकिशोर श्रीमाली

हर बच्चे का अक्षर बोध यहीं से शुरू होता है। अक्षरों को रटकर हम शब्द रचना और फिर वाक्य निर्माण सीख कर ज्ञान की अगली सीढ़ियों पर पैर रखते हैं। विडंबना यह है कि हमने कभी अपने ज्ञान के बिल्डिंग ब्लॉक्स अक्षरों को बहुत नजदीक से जानने की कोशिश नहीं की है। इन्हें रटकर हमने अपना काम पूरा हुआ मान लिया।

शायद इसका कारण यह है कि इस विषय में हमारी जानकारी बहुत कम है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि अक्षर सूक्ष्म और स्थूल प्रकार के हैं। स्थूल अक्षर का उच्चारण वाणी से किया जाता है । उसे पंडितों ने वैखरी कहा है एवं सूक्ष्म अक्षर मन में उठ रहा भाव अथवा मातृका है।

प्रकट में शब्द मुंह से बोले जाते हैं परन्तु शब्द मन की शक्ति से उत्पन्न होते हैं। मन में उठ रहे तरह-तरह के भाव या विचार इन शब्दों की भाव भूमि है । इन विचारों से विकल्प निर्मित होता है। हमारे विकल्पों की संख्या जितनी अधिक होती है वह हमारे संकल्प की शक्ति को कमजोर बनाता है।

संस्कृत वर्णमाला में बावन अक्षर या मातृका प्रत्येक मनुष्य के मन में उठ रहे विचारों को निरूपित करता है। जानने योग्य तथ्य यह है कि ये विकल्प किसके हैं?

ये सारे विकल्प हर मनुष्य के अंदर जो शिव भाव स्थापित है उससे उत्पन्न होता है। मौलिक तौर पर विचार इच्छाशक्ति है जो हमें कार्य करने की प्रेरणा देता है। अपनी इच्छाओं को हम अक्षरों के माध्यम से शब्द और वाक्य में पिरो कर अभिव्यक्त करते हैं।

अर्थात मन में जितने प्रकार के खुराफात चल रहे होते हैं उतने ही तरह के विचार शब्दों के माध्यम से प्रकट होते हैं।

इसलिए अथर्ववेद में आए देवी स्तुति में मातृका को मंत्र की शक्ति बताया गया है। देवी अथर्वशीर्ष में मातृका के विषय में कहा गया है, “मंत्राणा मातृका शक्तिं शब्दानां ज्ञान स्वरूपिणि”

मगर सिर्फ इतना जान लेना कि मातृका मंत्र की शक्ति है आधा अधूरा ज्ञान है। अधिक उपर्युक्त तो यह जानना है कि इस शक्ति को मंत्र जाप में किस प्रकार मुक्त किया जाए?

यही जिज्ञासा एक बार नारद को भी हुई और वे अनेक विद्वान जनों से पूछते हैं,

मातृका को कौन विशेष रूप से जानता है।
वह मातृका कितने प्रकार की है और कैसे अक्षरों वाली है?
मातृका का उद्भव कहां से होता है?
यह शब्द जन्मते कहां से हैं?
स्कंद पुराण में नारद को उनके प्रश्न का उत्तर इस कथा के माध्यम से मिल गया है।

किसी समय कौथुम नाम से प्रसिद्ध एक ब्राह्मण रहते थे। उन्होंने इस पृथ्वी पर प्रचलित हुई सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़ लिया था। गंभीर तपस्या करने के बाद कौथुम जब ब्रह्मचर्य आश्रम का त्याग कर गृहस्थ आश्रम की ओर प्रवृत्त हुए तब कुछ काल के बाद उन्हें एक पुत्र हुआ। इस पुत्र का व्यवहार जड़ की तरह था।

अक्षर मात्राओं का ज्ञान अर्जित करने के बाद उसकी विद्या अध्ययन में रुचि समाप्त हो गई थी । पिता विद्वान थे और वे चाहते थे उनका पुत्र भी उन्हीं की तरह विद्वान हो। उन्होंने उसे तरह-तरह के प्रलोभन दिए कि पुत्र विद्या अध्ययन के प्रति समर्पित हो, परन्तु पुत्र की पढ़ाई में अभिरूचि नहीं थी।

एक दिन पिता अपने पुत्र को बहलाते हुए कहते हैं, ‘‘पुत्र! पढ़ाई करोगे तो मैं तुम्हें मिठाई दुंगा।’’

पिता की बात सुनकर पुत्र कहता है, ‘‘पिताजी! क्या मिठाई के लिए पढ़ा जाता है? नहीं। बल्कि अध्ययन तो उसका नाम है जो मनुष्य को परलोक में लाभ पहुचाता है।’’

पुत्र का यह उत्तर सुनकर पिता हतप्रभ हो जाते हैं और फिर उससे कहते हैं, ‘‘अरे बेटा! तेरी बुद्धि कितनी अच्छी हैं, फिर तुम पढ़ते क्यों नहीं हो? अपनी शुद्ध बुद्धि का उपयोग तुम पढ़ने के लिए क्यों नहीं करते हो।’’

पुत्र पिता से कहता है, ‘‘पिताजी जानने योग्य जितनी भी बाते हैं उन सब का ज्ञान मुझे अक्षर और मात्राओं के ज्ञान में मिल गया है। अब और किस ज्ञान को पाने के लिए मैं मेहनत करूं?’’

पिता पुत्र का उत्तर सुनकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं और कहते हैं, “आज तुमने बहुत विचित्र बात कही है। मुझे मातृका का अर्थ बताओ।’’

 

पुत्र कहता है, ‘‘संस्कृत वर्णमाला में मातृका में बावन अक्षर बताए गए हैं। उनमें सबसे प्रथम अक्षर ॐकार हैं।

उसके अलावा चौदह स्वर, तैंतीस व्यंजन, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय (व्याकरण में उच्चारण की दृष्टि से वर्ण जिसका उच्चारण जीभ के मूल या बिलकुल पिछले भाग से होता है) तथा उपध्मानीय (‘प’ वर्ग अर्थात् प्, फ्, ब्, भ्, म्, के पहले आनेवाला महाप्राण विसर्ग जिसका उच्चारण ओठ से होता है) है – ये सब मिलकर बावन मातृका है।’’

ॐकार में ‘अ’कार ब्रह्मा हैं, ‘उ’कार विष्णु एवं ‘म’कार रुद्र हैं। ॐकार के मस्तक पर जो चन्द्रमा है, वह भगवान सदाशिव का रूप है,
अ’कार से ‘औ’कार तक चौदह स्वर चौदह मनु हैं
‘क’ से लेकर ‘ह’ तक तैंतीस देवता हैं
आगे कौथुम कहते हैं अनुस्ंवार, विसर्गः, जिह्वामूलीय एवं उपध्मानीय ये चार अक्षर सृष्टि में व्याप्त चार प्रकार के जीव बताए गए हैं।

जब भी कोई जीव ऊपर लिखित तैंतीस देवताओं का आश्रय लेकर मन, वाणी और क्रिया द्वारा इन देवताओं का भजन करता है तभी उसे मुक्ति मिलती हैं।

शायद इसीलिए कबीरदास कहते हैं,

“बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि, हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।”

इस जगत में बोली ही एक अत्यंत अनमोल वस्तु है अगर कोई इसका सही उपयोग जानता है, इसीलिए इसे अपने मुख से बाहर निकालने से पहले ह्रदय के तराजू पर तौल लेना चाहिए ।

सीधी भाषा में कबीर कह रहे हैं कि अक्षर वाणी से उच्चारित किए जाते हैं लेकिन मन के अंदर जो सकारात्मक ऊर्जा है उसका रूप है।

सब जानते हैं कि मन की गति सबसे अधिक तीव्र है। वह एक क्षण में जहां चाहे वहां जा सकता है। परन्तु प्रकट में उन जगहों पर जाने में अनंत प्लानिंग लगती है। मातृका विचारों को शब्दों में बदल कर मन की इच्छा को पूरा करने वाली शक्ति है। ज्ञानी जनों ने इस शक्ति को दुर्गा कहा है। इसलिए बोलते समय सावधान रहें क्योंकि जिह्वा पर सरस्वती का वास होता है।

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