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कोरोना महामारी हज़ारों टन संक्रामक कचरे की विकट समस्या भी साथ लाई

हर्षदेव

मरीजों के इलाज, दवा और अस्पतालों के प्रबंधन तथा संक्रमण की जांच के साथ ही हर दिन हज़ारों टन ज़हरीले मेडिकल कचरे के निपटारे की चुनौती से भी शासन-प्रशासन को जूझना पड़ रहा है। हमारी धरती तो पहले ही भयंकर प्रदूषण के बोझ से कराह रही थी कि कोरोना की बीमारी का उगला हुआ कचरा प्रशासनिक प्रबंधन का दम निकाले दे रहा है। राजधानी में गाजीपुर बॉर्डर पर कचरे का विशाल पहाड़ दो दशक से इस सच्चाई का गवाह है कि कचरा निपटाने की चुनौती कितनी विकट है। तमाम विशेषज्ञों की माथापच्ची के बावजूद कचरे का यह पर्वत वहीं खड़ा पूरे क्षेत्र को प्रदूषित कर रहा है।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के मुताबिक मेडिकल कचरा वह है जो मनुष्य या पशु के इलाज के दौरान अस्पतालों से निकलता है। इसका सही निपटारा संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए एक जरूरी शर्त है। कोरोना जैसी छूत की बीमारी के चलते तो यह और भी आवश्यक है। संक्रमण वाली बीमारियों का कचरा इसलिए गम्भीर चिंता का सबब होता है क्योंकि वह बीमारी की रोकथाम के तमाम उपायों को निरर्थक कर सकता है। उसके कारण रोग नए क्षेत्रों में आसानी से पहुंच बना सकता है।

गत दिसम्बर में विशेषज्ञों का अनुमान था कि कोरोना की वजह से 146 टन कचरे के निस्तारण का काम बढ़ गया है। उस समय दिल्ली का रोजाना का कचरा 321 टन बताया गया था। लेकिन दूसरी लहर के प्रकोप के बाद इसमें एक हजार गुना तक इजाफा हो जाने की आशंका जताई गई है। हालांकि, इस कचरे की तादाद का अभी तक कोई मोटा अनुमान भी नहीं किया गया है।

कोरोना से जुड़े मेडिकल कचरे में सिर के कैप, मास्क, जख्मों से हटाई गई पट्टियां, पैथोलॉजिकल कचरा, ऑक्सीजन में इस्तेमाल किट, प्लास्टर ऑफ पेरिस, ऑपरेट करके शरीर से निकाले गए अंग, एक्सपायर हो चुकी दवाएं और रेडियोएक्टिव वस्तुएं शामिल हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देशभर में कोविड कचरे के निपटारे के लिए निर्देश जारी किए हुए हैं। उन निर्देशों के आधार पर राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों ने भी नियम घोषित किए हुए हैं। कोरोना मरीजों के क्वारंटीन रहने के दौरान भी कचरा पैदा होता है। कोरोना की पहली लहर में जून से सितम्बर के बीच 18 हजार टन कचरा पैदा हुआ था। यह आकलन केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार है।

प्रदूषण समस्या पर नजर रखने वाले जानकारों के मुताबिक निगम कर्मचारी घरों से निकलने वाले कचरे के साथ ही मेडिकल कचरे को मिला देते हैं और उसको शहर से बाहर खुले में ही डाल देते हैं। यह माइक्रोप्लास्टिक्स मिला कचरा खेतों से लेकर नदियों तक पहुंचता है और इसके बाद हवा और खाने का हिस्सा बन जाता है। भारत में पिछले कुछ ही समय से अस्पतालों के इन्फ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण पर ध्यान देना शुरू हुआ है। इसीलिए अभी तक अस्पतालों में ऑक्सीजन के अपने संयंत्र भी नहीं हैं और उनको बाहर से आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ता है। यही स्थिति कचरे के निस्तारण के मामले में है। सभी अस्पतालों को कचरे के निस्तारण के लिए भी सरकारी धमन भट्टी पर निर्भर रहना होता है। उनको प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के निर्देशों पर भी चलना होता है। वे अपने कचरे को निगम एजेंसी के हवाले करके छुट्टी पा जाते हैं। समस्या उस कचरे के सही और सुरक्षित तरीके से निस्तारण की निगरानी की है। चूक इसी मामले में हो रही है। पर्यावरणविद जयधर गुप्ता जोर देकर कहते हैं कि कोरोना के कचरे के निपटान के बारे में जागरूकता की बहुत जरूरत है। इसके लिए सरकारों को अख़बारों में विज्ञापन छपवाने चाहिए। इस चेतना के अभाव में न केवल प्रदूषण से बड़ा खतरा संक्रमण का है, वरन‍् यह पूरे सफाई तंत्र की उपयोगिता को ही कटघरे में खड़ा कर देता है।

प्रदूषण विशेषज्ञों के अनुसार कचरे के निपटान का काम करने वाले सफाईकर्मियों को खास सावधानी की जरूरत है क्योंकि वह हाशिये पर रहने वाला समुदाय है और अक्सर बचाव से जुड़ी सुविधाओं के मामले में वह अनभिज्ञ रहता है। उसमें जागरूकता की कमी रहती है और किसी प्रकार के प्रशिक्षण का मौका भी उसको नहीं मिल पाता है। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 50 लाख सफाईकर्मी हैं। इनमें महिलाओं की संख्या आधी है।

कचरा निस्तारण का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि घनी आबादी वाले इलाकों में जरूरी नियमों और निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है क्योंकि निगरानी के नाम पर कर्मचारियों को चेतावनी देकर जिम्मेदारी पूरी कर ली जाती है। प्रदूषण विशेषज्ञों ने इस कचरे के निस्तारण के लिए चार सूत्री निर्देश तैयार किए हैं। ये हैं—कचरे की व्यवस्था पर सोचो, मेडिकल कचरे को अलग रखो, उसकी तादाद कम से कम रखो और उसके पुन: उपयोग की व्यवस्था करो।

इस समस्या का सबसे जरूरी पक्ष नागरिकों की जागरूकता से जुड़ा है। उनको संक्रमण से बचना और अपने परिवार को बचाना है तो इस उच्छिष्ट को घरेलू कचरे से अलग रखते हुए निर्धारित स्थान तक पहुंचाना होगा। हर नागरिक का सामाजिक कर्तव्य है कि वह स्वयं भी उसके निस्तारण की निगरानी का दायित्व निभाए। सबसे ज्यादा परेशान करने वाली परिस्थिति छोटे शहरों और कस्बों को लेकर है। वहां न निकाय इकाइयां और न नागरिक इस सम्बन्ध में जागरूक हैं। इन सभी स्थानों में एक खतरनाक लापरवाही और बेफिक्री का माहौल देखा जा सकता है। कोरोना की दूसरी लहर के प्रकोप में गांवों और कस्बों को लेकर चिंता सबसे अधिक है। ऐसे में स्थानीय नेताओं, प्रधानों और पंचों का दायित्व हो जाता है कि वे स्वयं को और समाज को सुरक्षित रखने का मानवीय कर्तव्य पूरा करें।

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