ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह आज टि्वटर और व्हाट्सएप जैसी कम्पनियां भारत की अखंडता-संप्रभुता के लिये ‘खतरा’

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संजय सक्सेना

देश में आग लगाने वाली पोस्ट डालने वालों का नाम हमें-आपको तो क्या सरकार को भी नहीं बताएंगीं क्योंकि इनकी नजर में देश में आग लगाना अभिव्यक्ति की आजादी है। देशद्रोही ताकतों को पकड़वाने में मदद की बजाए यह उनके बारे में जानकारी छिपाने का काम करती हैं।

विदेशी सोशल मीडिया कंपनी टि्वटर और व्हाट्सएप का कुछ वर्ष पूर्व ठीक वैसे ही हिन्दुस्तान में पर्दापण हुआ था, जैसे कभी ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ के नाम पर अंग्रेज व्यापार करने के लिए भारत में पधारे थे। ईस्ट इंडिया कंपनी सन 1600 में बनाई गई थी। उस समय ब्रिटेन की महारानी थीं एलिजाबेथ प्रथम थीं, जिन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी को एशिया में कारोबार करने की खुली छूट दी थी, बात एशिया में कारोबार की होती जरूर थी, लेकिन कम्पनी की नजर सिर्फ और सिर्फ हिन्दुस्तान पर टिकी हुई थी। कम्पनी के पीछे के इरादों को कोई भांप नहीं पाया था। इसी के चलते यह कंपनी कारोबार करते-करते ही भारत में सरकार बनाने की साजिश तक में कामयाब हो गई। उसकी इस साजिश को अमलीजामा पहनाने वालों में कुछ हिन्दुस्तानियों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा था। देश की हालत यह थी कि भारतवासी चाय पीते थे तो ईस्ट इंडिया कंपनी की और कपड़े पहनते थे तो ईस्ट इंडिया कंपनी के। ईस्ट इंडिया कंपनी पर किताब लिखने वाले निक रॉबिंस ने अपनी पुस्तक में लिखा था कि इस कंपनी की आज की बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों से तुलना की जा सकती है। कम्पनी का भारत की इनसाइडर ट्रेडिंग, शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव जैसे आज की चीजों का असर और दखल रहता था। जैसे आज कंपनियां अपने फायदे के लिए हुक्मरानों-नेताओं ही नहीं अपने ही देश के खिलाफ षड्यंत्र रचने वालों के बीच भी कम्पनी लॉबिंग करती थी, ईस्ट इंडिया कंपनी भी उस दौर में ऐसी शख्सियतों से नजदीकी रखती थी। नेताओं-राजाओं को खुश करने की कोशिश में जुटी रहती थी। इसका भी मुख्यालय आज के गूगल, फेसबुक, टि्वटर और व्हाट्सएप जैसी कंपनियों के शानदार दफ्तरों जैसा होता था। जरूरत पड़ने पर यह कम्पनियां देश को दंगों की आग में झोंकने से भी नहीं चूकती हैं। चुनाव के समय ऐसे नेताओं और दलों को प्रचार-प्रसर में बढ़ावा देती हैं जिनके माध्यम से कम्पनी के हित सधते हैं। यह वह नेता होते हैं जो कभी अमेरिका से प्रकाशित ‘न्यूयार्क टाइम्स’ में छपी खबर के आधार पर देश को विदेश में बदनाम करते हैं तो कभी देश को नीचा दिखाने के लिए चीन-पाकिस्तान से गलबहिया कर लेते हैं।

ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरह की आज टि्वटर और व्हाट्सएप जैसी कम्पनियां भी भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए केन्द्र सरकार पर आंखें तरेर रही हैं। हालांकि अब समय बदल गया है, तब देश पर कब्जा करने के लिए ईस्ट इंडिया कम्पनी आई थी, आज की ‘ईस्ट इंडिया कम्पनियां’ देश के बाजार पर कब्जा करने की होड़ में लगी हैं, इसीलिए वह अपनी पसंद की सियासत चलाने में लगी हैं ताकि उनको फायदा पहुँचाने वाले नेता सत्ता के करीब पहुँच जाएं। इसके पीछे भी अपने देश की ही कुछ सियासी शक्तियां और लिबरल गैंग के लोग काम कर रहे हैं। अमेरिकी कम्पनियां भी व्यापार करते-करते हम भारतीयों को बताने लगी हैं कि अभिव्यक्ति की आजादी क्या होती है। देश का संविधान हम नहीं, यह कम्पनियां तय करेंगी। किसकी पोस्ट हटाना-लगाना या सोशल मीडिया के एकांउट को सीज करना है और किसको आगे बढ़ाना है यह तय करने का अधिकार भी यह कम्पनियां अपने पास रखती हैं। इनसे कोई सवाल नहीं पूछ सकता है। यह देश में आग लगाने वाली पोस्ट डालने वालों का नाम हमें-आपको तो क्या सरकार को भी नहीं बताएंगीं क्योंकि इनकी नजर में देश में आग लगाना भी अभिव्यक्ति की आजादी है। ऐसी देशद्रोही ताकतों को पकड़वाने में सरकार की मदद करने की बजाए यह उनके बारे में जानकारी छिपाने का भी काम करती हैं। जबकि देश तोड़ने की सोचने वालों के खिलाफ मुंह खोलने वालों को एकाउंट बंद कर देने की धमकी दी जाती है। सरकार पर दबाव बनाने के लिए देशद्रोही ताकतों से अपने पक्ष में बयान जारी कराए जाते हैं। टि्वटर और व्हाट्सएप अपनी मुहिम को ठीकठाक चलाते रहते यदि 2014 में मोदी की आंधी नहीं आई होती। मोदी के आने से इनकी उम्मीदों पर पानी फिरना शुरू हुआ तो इस सोशल मीडिया की कम्पनी ने साजिशें रचना शुरू कर दीं। ऐसे लोगों को बढ़ाया जाने लगा जो मोदी विरोधी बयान देते थे। मुसलमानों पर अत्याचार की फर्जी खबरें फैलाते हैं। कश्मीर से धारा 370 हटने का विरोध करते हैं। कोर्ट के आदेश की अवमानना करने वालों का साथ देते हैं।

याद कीजिए वह दौर जब सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत के रूख और चौतरफा कूटनीतिक दबाव के चलते पाकिस्तान ने अपने विंग कमांडर अभिनंदन को 56 घंटों में ही सही सलामत भारत को वापिस कर दिया था। लेकिन पाकिस्तान की प्रोपगैंडा मशीन ने इसे शांति के संदेश के तौर पर पेश करना शुरू किया। इसके बाद तो इंडिया में बैठे लिबरल ग्रुप ने तुरंत इसको इमरान खान का मास्टर-स्ट्रोक, इमरान खान द ग्रेट, इमरान फॉर पीस, गुडविल जेस्चर टाइप कैंपेन शुरू दिया। इमरान खान की शान में खूब कसीदे गढ़े गये। पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्री फवाद चौधरी ने नेशनल एसेंबली में एक प्रस्ताव पेश कर दिया जिसमें कहा गया था कि भारतीय नेताओं द्वारा शुरू किये गये युद्धोन्माद के बाद भारत-पाकिस्तान के युद्ध को टालने के लिए इमरान खान ने एक संत की तरह रोल अदा किया है, जिसकी भारत में भी सराहना हो रही है। अतः इमरान खान को इसके चलते नोबेल पीस प्राइज दिया जा सकता है। इस मुहिम को चलाने में सोशल मीडिया ने बढ़-चढ़कर प्रचार-प्रसार का काम किया था।

टि्वटर हो या फिर व्हाट्सएप या अन्य कोई सोशल साइट। इसको हम-आप भले ही मैसेज और एक-दूसरे से जुड़ रहने का ’हथियार’ मानते हों, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह साइट्स देश तोड़ने का साधन बन गया है। तमाम देश विरोधी प्रचार-प्रसार किया जाता है। सवाल बहुत साफ और महत्वपूर्ण है कि हमेशा देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के नीति-निर्धारक भारत विरोधी और विदेशी लॉबी के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। यह दृश्य हमने चीन के साथ टकराव में देखा, ये हमने पुलवामा में देखा, ये हमने सर्जिकल स्ट्राइक में देखा, ये राफेल की खरीद में देखा। अब तो देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस द्वारा देश को बदनाम करने के लिए टूलकिट का सहारा लिया जाने लगा है। इसी को लेकर जब मोदी सरकार ने टि्वटर और व्हाट्सएप जैसी सोशल साइटों पर शिकंजा कसा तो टूलकिट बनाने वाले का नाम बताने की बजाए यह कम्पनी सरकार को संविधान की याद दिलाने लगी। झूठा प्रोपोगंडा करने लगी कि उसे पुलिस से धमकाया जा रहा है, जिसको लेकर ताजा विवाद चल रहा है।

बहरहाल, मोदी सरकार ने साफ संकेत दे दिए हैं कि वह झुकने वाली नहीं है। लंबे अरसे से भारतीय कानूनों को नजरअंदाज कर रहे इंटरनेट मीडिया को अब रास्ते पर आना ही होगा। व्हाट्सएप के बाद सरकार ने ट्विटर को भी सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे पर लोगों को भटकाने की बजाय भारत के कानून का पालन करे। सरकार ने कहा कि ट्विटर अपनी नाकामी छिपाने के लिए भारत की छवि को धक्का पहुंचाना चाहती है। ट्विटर सिर्फ एक इंटरनेट मीडिया इंटरमीडिएरीज है और उसे भारत के वैधानिक फ्रेमवर्क में दखलअंदाजी का कोई हक नहीं है। ट्विटर ग्राहकों की आजादी पर भी मनमाना ब्रेक लगाती है और भारत के साथ पक्षपात भी करती है। अपने ग्राहकों का डाटा व्यापारिक हित साधने के लिए निजी कम्पनियों को दे देती है। सरकार के पास कई ऐसे सबूत हैं जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि टि्वटर और व्हाट्सएप आदि विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफार्मों से भारत के हितों और अखंडता को लगातार नुकसान पहुंचाने की साजिश रची जा रही है। जब इनके काले कारनामों का खुलासा होता है तो वह हो-हल्ला करने लगते हैं। इसीलिए तो भारत के आइटी नियमों को लेकर ट्विटर ने अपने बयान में कहा था कि वह उसमें बदलाव कराने की कोशिश करेगी, ताकि उसके प्लेटफार्म पर खुले और मुक्त रूप से वार्तालाप हो सके। ट्विटर ने भारत में अपने कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर करते हुए भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में बताया था। हाल ही में भाजपा प्रवक्ता के एक ट्वीट को मैनिपुलेटेड चिह्नित करने पर पुलिस पूछताछ के लिए ट्विटर के दफ्तर में गई थी। ट्विटर ने इसे पुलिसिया धमकी वाली कार्रवाई बताया। इस पर इलेक्ट्रानिक्स एवं आइटी मंत्रालय ने ट्विटर के बयानों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि देश से मुनाफे का कारोबार करने वाली ट्विटर दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था को अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ न समझाए। भारत में आजादी मूलभूत है लेकिन ट्विटर का रवैया दोहरा है। वह खुद को बचाने के लिए आजादी को ढाल बना रही है, जबकि भारत में उसने अपना कोई मैकेनिज्म तैयार नहीं किया है। उसका हर आदेश अमेरिका से आता है। भारत में शिकायत तक के लिए कोई मंच नहीं बनाया है। जब चाहे किसी को ब्लॉक करती है और उसे सुनवाई का अधिकार तक नहीं दिया जाता। भारत ऐसी मनमानी सहने को तैयार नहीं है।

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