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भारत की पहली आजाद हिंद फौज के निर्माता थे धन सिंह कोतवाल और राव कदम सिंह गुर्जर

 

 

राव कदमसिंह गुर्जर भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारी आंदोलन के एक देदीप्यमान नक्षत्र हैं। जिन्होंने समय आने पर ‘राष्ट्र प्रथम’ के उद्घोष को स्वीकार करते हुए अपना सर्वस्व माँ भारती की गोद में समर्पित कर दिया था ।

राम कदम सिंह 18 57 की क्रांति से पूर्व इसके पूर्व के क्षेत्र के क्रांतिकारियों के सर्वमान्य नेता थे, जिनके पास उस समय 10000 क्रांतिकारियों की एक बड़ी सेना थी।
यह सारे के सारे क्रांतिकारी मां भारती के प्रति समर्पित होकर देश सेवा के लिए निकले थे। इन क्रांतिकारियों में प्रमुख रूप से मवाना, हस्तिनापुर और बहसूमा क्षेत्र के थे। इन सभी क्रांतिकारियों ने अपनी सफेद पगड़ी को अपनी क्रांति का प्रतीक बनाया था। जिसके पीछे उनकी मंशा थी कि हमने सर पर कफन बांध लिया है और अब मां भारती को स्वतंत्र करा करके ही दम लेंगे। जब 10 मई 1857 को धन सिंह कोतवाल जी के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत का बिगुल फूंक दिया तो उस समय राम कदम सिंह और उनकी सेना के 10000 सैनिक अपने आप पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार कोतवाल साहब के साथ आकर मिल गए। इस प्रकार कोतवाल साहब की ताकत और भी अधिक बढ़ गई ।
यदि हम यहां पर विचार करें तो पता चलता है कि कोतवाल साहब और उनके साथियों की यह सैनिकों की संख्या 30,000 से अधिक हो गई थी । इसे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारी आंदोलन की पहली आजाद हिंद फौज कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। कोतवाल साहब और उनके साथियों पर अनेकों शोध पत्र लिखे गए हैं लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि कोतवाल साहब और उनके साथियों के द्वारा जो उस समय फौज तैयार की गई थी वह भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज की तरह अवैतनिक फौज ही थी। जो देश सेवा का कोई प्रतिफल न लेकर अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए ही बनाई गई थी । इतिहास के शोधार्थियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए और इस सेना को आजाद हिंद फौज या उसी जैसा कोई सम्मानजनक प्रतीकात्मक नाम देना चाहिए।
राव कदम सिंह और धन सिंह कोतवाल जी दोनों के पास ही इतने बड़े आर्थिक संसाधन नहीं थे कि वे इतनी बड़ी फौज को वेतन देते । इस फौज के उत्सर्ग के बदले में उनके पास केवल देश को आजाद कराने का संकल्प ही था। इस प्रकार एक प्रकार से धनसिंह कोतवाल जी व राव कदम सिंह जी और उनके ऐसे सभी देशभक्त साथियों ने अपने सभी सैनिकों को केवल एक ही वचन दिया था कि यदि तुम हमें खून दोगे तो हम तुम्हें आजादी देंगे। वास्तव में उनका यह दिया हुआ वचन ही आगे चलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
आज जब महान क्रांतिकारियों के ऊपर शोध प्रबंध तैयार किए जा रहे हैं तब यह बहुत आवश्यक हो गया है कि इस अनाम सेना को सम्मान देते हुए उसे एक नाम दिया जाए और इस बात पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि उनकी यह सेना ही आगे चलकर आजाद हिंद फौज जैसे क्रांतिकारियों के सैन्य संगठन का प्रेरणा स्रोत बनी।
मेरठ के तत्कालीन कलक्टर आर0 एच0 डनलप द्वारा मेजर जनरल हैविट को 28 जून 1857 को लिखे पत्र से पता चलता है कि क्रान्तिकारियों ने पूरे जिले में खुलकर विद्रोह कर दिया और परीक्षतगढ़ के राव कदम सिंह को पूर्वी परगने का राजा घोषित कर दिया। राव कदम सिंह और दलेल सिंह के नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने परीक्षतगढ़ की पुलिस पर हमला बोल दिया और उसे मेरठ तक खदेड दिया। उसके बाद, अंग्रेजो से सम्भावित युद्व की तैयारी में परीक्षतगढ़ के किले पर तीन तोपे चढ़ा दी। ये तोपे तब से किले में ही दबी पडी थीं। जब सन् 1803 में अंग्रेजो ने दोआब में अपनी सत्ता जमाई थी। इसके बाद हिम्मतपुर ओर बुकलाना के क्रान्तिकारियों ने राव कदम सिंह के नेतृत्व में गठित क्रान्तिकारी सरकार की स्थापना के लिए अंग्रेज परस्त गाॅवों पर हमला बोल दिया और बहुत से गद्दारों को मौत के घाट उतार दिया। क्रान्तिकारियों ने इन गांव से जबरन लगान वसूला।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि उस समय जो लोग अंग्रेजों के भक्त हुआ करते थे उन्हें राजभक्त और जो देशभक्त हुए हुआ करते थे उन्हें राष्ट्रभक्त कहा जाता था । गांधी और उनकी कांग्रेस को सदा लोगों ने राज भक्त होने का ही प्रमाण पत्र दिया और इसी पर गांधी व कॉंग्रेस खुश भी होते रहे। इस शब्द से ही हमें यह समझ लेना चाहिए कि कांग्रेस और उसके नेताओं का लोगों में विशेष सम्मान नहीं था। कांग्रेस के जन्म से भी पहले से क्रांतिकारियों ने राज भक्तों को देश का गद्दार कहना आरंभ कर दिया था। यही कारण था कि जो लोग उस समय गद्दारी का प्रदर्शन करते हुए अंग्रेजों का समर्थन कर रहे थे, उनके गांवों पर हमारे क्रांतिकारियों ने हमला बोल दिया।
हमें यह भी जान लेना चाहिए कि राव कदम सिंह बहसूमा व परीक्षतगढ़ रियासत के अंतिम राजा नैनसिंह गुर्जर के भाई का पौत्र था। उनके भीतर क्षत्रियों का रक्त प्रवाहित हो रहा था। जब देश पर विदेशी आक्रमणकारी या सत्ताधारी कब्जा जमाकर बैठ गए तो उन जैसे देशभक्त के लिए यह संभव नहीं था कि वह घर में बैठकर तमाशा देखते रहते । उन्होंने क्रांति के लिए मोर्चा खोला और धन सिंह कोतवाल जैसे सूरमा के साथ मिलकर विदेशी सत्ताधीशों की जड़ें खोदने का काम करने लगे।
राजा नैनसिंह गुर्जर एक अच्छे योग्य और देशभक्त शासक हुए थे विदेशी सत्ताधारियों को वह भी भारत भूमि पर देखना नहीं चाहते थे । उनके शासनकाल में उनकी रियासत में 349 गांव थे और इसका क्षेत्रफल लगभग 800 वर्ग मील था। जब1818 ई0 में राजा नैनसिंह के मृत्यु हुई तो अंग्रेजों ने उनकी रियासत पर भी अन्य देशी रियासतधारी राजाओं की तरह कब्जा करने का प्रयास किया। जिसमें वह सफल भी हो गए । परंतु अंग्रेजों का यह काला कारनामा राजा और उनके परिवार के लोगों को व उनकी प्रजा को पसंद नहीं आया । जिससे अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का लावा निरंतर सुलगता रहा। अंग्रेजों को भारत से भगाने की तैयारी आरंभ हो गई । जब 1857 की क्रांति का समय आया तो उस समय यह तैयारी एक पूर्व निर्धारित योजना के अंतर्गत अपने चरम पर जाकर फूट पड़ी। क्रांति से पूर्व ही क्षेत्र के लोग राव कदम सिंह को अपना नायक चुन चुके थे अर्थात उन्हें अपना राजा स्वीकार कर लिया था।


इस प्रकार की घटनाओं से हमें पता चलता है कि क्रांति कोई एकदम घटित हुई विद्रोह की चिंगारी नहीं थी, जैसा कि कम्युनिस्ट इतिहासकारों और अंग्रेजों ने स्थापित करने का प्रयास किया है। यदि परिस्थितियों पर विचार करें तो पता चलता है कि क्रांति के लिए बहुत पहले से तैयारी हो रही थी और उसके पीछे कारण केवल एक ही था कि विदेशी सत्ताधारियों को देश से भगाया जाए और देश को आजाद कराया जाए। यहां पर यह भी देखने की बात है कि देश का जनमानस और देश का शासक वर्ग दोनों मिलकर एक ही उद्देश्य से प्रेरित होकर कार्य कर रहे थे। जिससे पता चलता है कि भारत में राष्ट्रवाद राजवर्ग और जन सामान्य दोनों के मानस पर समान प्रभाव डाल रहा था। ऐसा नहीं था कि यह अंग्रेजों व मुगलों के आने के पश्चात भारत में विकसित हुआ था। इसकी जड़ें भारत में गहरी थीं। जिनके कारण राव कदम सिंह को लोग अपना राजा चुन रहे थे और उससे यह अपेक्षा कर रहे कि तुम्हें हमको आजाद कराने के लिए संघर्ष करना है। साथ ही साथ राव कदमसिंह अपनी ओर से अपने लोगों को यह विश्वास दिला रहे थे कि आप मेरा साथ दोगे तो निश्चित रूप से हम अपने मिशन में कामयाब होंगे। यही साझा उद्देश्य कदम सिंह,उनके सेना, धनसिंह कोतवाल व उनकी स्वनिर्मित सेना का बन गया था। इन सारी घटनाओं का आकलन करने से पता चलता है कि हमारे राष्ट्र नायक राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित होकर देश के लिए समर्पित होकर काम कर रहे थे।
10 मई 1857 को मेरठ में हुए सैनिक विद्रोह की खबर फैलते ही राम कदम सिंह और उनके रियासत के सारे क्षेत्र में क्रांति की धूम मच गयी थी। राव कदम सिंह स्वयं क्रांति नायक बनकर लोगों का नेतृत्व कर रहे थे। उनके दिशा निर्देशों का पालन करते हुए लोगों ने मेरठ के पूर्व की सभी सड़कें रोक दीं और अंग्रेजों के यातायात और संचार को ठप कर दिया। 10000 सैनिकों के साथ साथ अन्य साधारणजन भी क्रांतिकारियों का साथ दे रहे थे । उस दिन ऐसा नहीं लग रहा था कि कोई व्यक्ति इस समय अपने घर में बैठा होगा । पूरा क्षेत्र राव कदम सिंह के दिशा निर्देशों का पालन करते हुए अपने नायक धन सिंह कोतवाल जी के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यथाशीघ्र अंग्रेजों को देश से मार भगाने के लिए संकल्पित को उठा था।

क्रमशः

डॉ राकेश कुमार आर्य
सम्पादक : उगता भारत

 

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