मां को जैसा स्थान भारत में दिया गया है वैसा किसी अन्य देश में नहीं

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डॉ. वंदना सेन

जिस प्रकार भगवान या दैवीय शक्ति के लिए सारी दुनिया एक है। उसी प्रकार भगवान द्वारा पैदा किए गए व्यक्ति भी एक ही परिवार के हिस्सा हैं। वह किसी भूमि या जाति की दीवारों में कैद नहीं होने चाहिए।

भारत में सदियों से प्रचलित पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नारी को महाशक्ति की संज्ञा दी गई है। जहां नारी का आदर और सम्मान होता है, वहां दैवीय वातावरण विद्यमान रहता है। दैवीय वातावरण के बारे में अध्ययन किया जाए तो यही परिलक्षित होता है कि वहां आसुरी प्रवृत्तियों का पूरी तरह से विलोपन हो जाता है और ऐसी सांस्कृतिक किरणों का प्रकाश प्रस्फुटित होता है, जिसका सानिध्य प्राप्त कर हर प्रकार के विकार दूर हो जाते हैं। कहा जाता है जहां नारी की पूजा की जाती है। वहां देवता स्वयं उपस्थित होते हैं। भारत में सनातन काल से नारी को जगत जननी के रूप में भी स्वीकार किया गया है। छोटी छोटी बालिकाएं साक्षात माता दुर्गा की रूप होती हैं। इस प्रकार यही कहा जा सकता है कि समाज के अंदर भक्ति का प्राकट्य तभी हो सकता है, जब नारी को मां दुर्गा के प्रतिरूप में देखा जाए। धर्म युक्त वातावरण निर्मित करने के लिए नारी तू नारायणी का भाव लेकर अपने मन में पूजा की थाली स्थापित कर हम सभी को साधक और आराधक की भूमिका के लिए अग्रसर होना होगा। तभी हम आसुरी प्रवृत्तियों को पराजित कर पाने में सक्षम होंगे।

भारत देश में शक्ति पर्व के रूप में मनाया जाने वाला नवदुर्गा महोत्सव आध्यात्मिक उत्थान का पर्व तो है ही, साथ ही इस पर्व में मां की महत्ता को भी अत्यधिक प्रधानता दी गई है। भारत में मां को जो स्थान प्राप्त है, वह शायद ही किसी दूसरे देश में हो। हमें इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम विश्व के ऐसे विलक्षण देश में निवास करते हैं, जिसके स्वर्णिम अतीत की गौरव गाथा से हम सभी अनुप्राणित हैं। इतना ही नहीं विश्व के अनेक देश भी भारत के इस सत्य को वर्तमान में सहज भाव से स्वीकार करने लगे हैं। ऐसे में हम सभी का यह स्वाभाविक कर्तव्य बनता है कि हम अपनी चेतन शक्ति का प्राकट्य कर अपने आराध्य केंद्रों का पूर्ण मनोयोग से अर्चन वंदन करें और देश की भलाई का मार्ग प्रशस्त करें। हम भारतवासियों ने अपने देश को भारत माता का दर्जा देकर उसकी पूजा की है। देश में कई स्थानों पर भारत माता के मंदिर भी हैं। भारत माता की आराधना का भावार्थ यही है कि देश के नागरिकों में समानता का भाव बना रहे, सब मिलजुल कर रहें। ऐसा करने से समाज में समता का भाव स्थापित होगा।

आराधना की दृष्टि से नवदुर्गा महोत्सव को तीन भागों में विभक्त किया गया है। जिसके अंतर्गत नौ दिनी महोत्सव के तीन-तीन दिनों में विशेष देवी के पूजा आराधना का विधान है। प्रथम तीन दिन मां काली की आराधना के लिए रखे गए हैं। जिसमें मूल बात यह है कि व्यक्ति सबसे पहले अपने मन के विकारों को पूरी तरह से दूर करे। पहले तीन दिनों में व्यक्ति का मन पूरी तरह विकार रहित हो जाना चाहिए तभी हमारी आगामी पूजा का सफल मार्ग तैयार हो सकता है। अगर मन में किसी प्रकार का विकार है या देवी स्वरूप नारी और मासूम बालिकाओं के प्रति पूजनीय भाव नहीं है तो व्यक्ति को देवी पूजा से अपने को पृथक कर लेना चाहिए। वैसे पूजा के बारे में पहले से ही अकाट्य धारणा है कि व्यक्ति पूरे मन से स्वार्थ रहित पूजा पूजा करें, तभी उसका अपेक्षित फल प्राप्त होता है। दूसरे तीन दिनों में मां लक्ष्मी की पूजा का विधान है। व्यक्ति विकारों से मुक्त होकर माता लक्ष्मी की पूजा करता है तो उसकी आराधना सफल होगी। यहां विशेष बात यह है कि व्यक्ति धर्म सम्मत धन का उपार्जन करने की ओर प्रवृत्त हो। इस आराधना में व्यक्ति अपने देश ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए धन संपदा की मांग करता है। देश की संपन्नता के साथ व्यक्ति का सीधा जुड़ाव होता है, इसलिए यह पूजा व्यक्ति की संपन्नता में भी सहायक होती है। इसी प्रकार अंतिम तीन दिन मां सरस्वती को समर्पित रहते हैं। जो व्यक्ति को ज्ञान और विवेक से परिपूरित करती है। इन नौ दिवसीय पूजा के बाद व्यक्ति के मन में किसी प्रकार का कलुषित विकार नहीं होना चाहिए। इस पूजा में तीन तीन दिन की इस संकल्पना में पूरी तरह से धर्म को आधार बनाया गया है।

जिस प्रकार भगवान या दैवीय शक्ति के लिए सारी दुनिया एक है। उसी प्रकार भगवान द्वारा पैदा किए गए व्यक्ति भी एक ही परिवार के हिस्सा हैं। वह किसी भूमि या जाति की दीवारों में कैद नहीं होने चाहिए। हमारे देश में बालिकाओं को देवी के रूप में पूजा जाता है। बालिका रूपी नन्ही दुर्गा जब मनुष्य को आशीर्वाद देती हैं, तब व्यक्ति की आध्यात्मिक प्रगति को कोई ताकत रोक नहीं सकती। इसलिए हमें अपने संस्कारों का पालन करते हुए पूर्ण मनोयोग से ध्यान लगाकर पूजा अर्चना करना चाहिए।

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