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भारतीय इतिहास का एक विस्मृत पृष्ठ : महाराजा विक्रमादित्य

भारतीय इतिहास का विस्मृत पृष्ठ : महाराजा विक्रमादित्य


आज से 2075 वर्ष पहले भारतीय इतिहास में एक नूतन युग का शुभारम्भ कर संवत् प्रारम्भ करनेवाले महाराज विक्रमादित्य कौन हैं, यह प्रश्न भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। जिस विक्रम का न्याय लोकविश्रुत है, जिसके भूमि में दबे हुए सिंहासन पर अनजाने में बैठ जाने पर गड़रिये का लड़का भी सत्य न्याय कर सकता है, जिसके राज्य में प्रजा सर्वविध सुखी एवं संपन्न थी, जिसकी वैतालपञ्चविंशति की कथाएँ आज तक घर-घर में कही-सुनी जाती हैं, जिसकी प्रशस्तियाँ आज तक मध्य भारत के लोकगीतों में गूँजती है, जो महाकवि कालिदास-जैसे नवरत्नों का अपूर्व आश्रयदाता था, उस महान् विक्रमादित्य को इतिहास ने जैसे भुला दिया है। यद्यपि भारत के जन-जन के हृदय के प्रत्येक स्पन्दन में विक्रमादित्य आज भी जीवित हैं।

जिस संवत् में हमारी संस्कृति की विगत दो सहस्र वर्षों की कहानी अंकित है, जिस संवत् के अनुसार आज तक हमारे धार्मिक कृत्य होते हैं, जो केवल पत्थर के शिलालेखों पर ही नहीं हमारे हृदय-पटलों पर भी अमिट रूप से अंकित हो चुका है, उस महान् विक्रम संवत् के प्रणेता कोई कल्पित विक्रमादित्य हो, यह कितना हास्यास्पद है। संवत् का प्रारम्भ किसी जाति की जीवन-गाथा में एक अविस्मरणीय घटना होती है। वह युगों तक अपनी छाप छोड़ जाती है, अत: विक्रम संवत् एवम् उसके प्रणेता सम्राट् विक्रमादित्य का भारतसुतों की संस्कृति में एक अमर स्थान प्राप्त कर लेना— संवत् तथा संवत्-प्रणेता— दोनों की ऐतिहासिकता के पक्ष में सबसे प्रबल प्रमाण है।

भविष्यमहापुराण सहित द्वितीय श्रेणी के सैकड़ों ग्रन्थों, यथा— कथासरित्सागर, बृहत्कथामञ्जरी, सिंहासनद्वात्रिंशक, वेतालपञ्चविंशति, प्रभावकचरित, गाथासप्तशती इत्यादि में प्रथम शताब्दी ई.पू. के उज्जयिनी-नरेश, महाराजा विक्रमादित्य का पर्याप्त वर्णन मिलता है, जिसका सारांश यह है कि उस काल में, जब आक्रामक शकों के प्रचण्ड आघात से सारा राष्ट्र तिलमिला उठा था, उज्जयिनी के मालव गणराज्याधिपति, परमारवंशीय गन्धर्वसेन के पुत्र और राजर्षि भर्तृहरि के अठारह वर्षीय अनुज विक्रमादित्य ने 3 लाख शकों को परास्त कर उन्हें भारतवर्ष से बाहर खदेड़ दिया था। ईसा से 57 वर्ष पूर्व, भर्तृहरि के विरक्त हो जाने के बाद उसी वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, तदनुसार 14 मार्च के दिन उज्जयिनी के सिंहासन पर विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था। इस प्रकार आजकल विक्रम संवत् (2018+57=)2075 चल रहा है। इसी दिन उन्होंने सारी प्रजा को ऋणमुक्त करके ‘विक्रम संवत्’ का प्रवर्तन किया था और ‘शकारि’ (शकों का शत्रु) की उपाधि धारण की थी। उज्जयिनी को राजधानी बनाकर उन्होंने पूरे 93 वर्ष (57 ई.पू-36 ई.) तक एकछत्र राज्य किया था।

विक्रमादित्य ने साहित्य एवं कला को महान् प्रोत्साहन दिया और धर्म की रक्षा की। उनके काल में भारत का राजनीतिक साम्राज्य सुदूर अरब तक पहुँच चुका था। उन्हीं के राजदरबार में धन्वन्तरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटखर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि-जैसे विद्वान् ‘नवरत्न’ के रूप में शोभायमान थे। इस सन्दर्भ में कालिदास ने लिखा है—
धन्वन्तरिक्षपणकमरसिंहशंकुवेतालभट्टघटखर्परकालिदासा:।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते: सभायां रत्नानि वैवरूचिवविक्रमस्य॥
—ज्योतिर्विदाभरण, 12.10

भविष्यमहापुराण के अनुसार कलियुग के तीन हज़ार वर्ष बीतने पर विक्रमादित्य का आविर्भाव हुआ, जिन्होंने सौ वर्ष शासन किया। उनके बाद उनके पुत्र देवभक्त ने 10 वर्ष तथा देवभक्त के पुत्र शालिवाहन ने 60 वर्षों तक राज्य किया। पं. भगवद्दत्त (1893-1968) का मत है कि ईसा से 57 वर्ष पहले आंध्र देश के प्रतापी राजा शूद्रक ने विदेशी आक्रमणकारियों को भारत से बाहर निकालकर ‘विक्रमदित्य’ की उपाधि धारण की तथा ‘विक्रम संवत्’ चलाया। डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल (1881-1937) तथा जयचन्द्र विद्यालंकार के मतानुसार आंध्रवंश के महाराज गौतमीपुत्र सातकर्णि ने प्रथम शती ईसा पूर्व में उज्जैन गुजरात के शक महाक्षत्रप नहपान को परास्त करके ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धरण की तथा विक्रम संवत् आरम्भ किया। चूंकि उज्जैन के मालवगणों ने शकों ने परास्त करने में उसकी सहायता की थी, इसलिए इसी संवत् का दूसरा नाम ‘मालव संवत्’ प्रसिद्ध हुआ।

शकारि विक्रमादित्य ने अपने शासनकाल में अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि पर कसौटी पत्थर के 84 खम्भोंवाले एक भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया था। भारत से अनेक विद्वानों को अरब भेजकर वहाँ सभ्यता-संस्कृति का प्रचार-प्रसार भी विक्रमादित्य ने ही किया था। इसके अतिरिक्त देश में 12 ज्योतिर्लिंग और 51 शक्तिपीठों का भी उन्होंने व्यवस्थापन करवाया था। इस प्रकार भारतीय सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान के संरक्षण और प्रचार-प्रसार में विक्रमादित्य का अद्वितीय योगदान है। विक्रमादित्य की प्रचण्ड लोकप्रियता से प्रभावित होकर कालांतर में अनेक हिंदू-राजाओं ने अपने नाम के आगे ‘विक्रमादित्य’ लगाकर अपना गौरव बढ़ाया। विक्रमादित्य के नाम से ‘विक्रम संवत्’ अपने देश और नेपाल में प्रचलित है। यद्यपि शक संवत् भारत का राष्ट्रीय संवत् है, तथापि विक्रम संवत् आसेतुहिमाचल जन-जन का संवत् है।

इन सब तथ्यों के होते हुए भी इतिहासकारों के मध्य महाराज विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता को लेकर गम्भीर विवाद है और इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में उनको स्थान नहीं मिल पाया है। यह चिन्तनीय विषय है।

इसी परिप्रेक्ष्य में नव वर्ष चेतना समिति (भारत) और लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ के संयुक्त तत्त्वावधान में फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी, शनिवार, वि.सं. 2075, तदनुसार दिनांक 23 फरवरी, 2019 को ‘भारतीय इतिहास में विक्रमादित्य’ विषय पर एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इस आयोजन में महाराजा विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता, तिथि-निर्धारण, कालानुक्रम, विक्रमादित्य के कार्य, उनके नवरत्न, विक्रम संवत्, आदि विषयों पर मुख्य रूप से विचार-विमर्श किया जाना है। इन विषयों पर शोध-पत्र तैयार करते समय संकीर्णता से बचते हुए समानान्तर विचार रखना तथा पुरातात्त्विक स्रोत— चित्र, प्रतिमा, अभिलेख, मुद्रा; साहित्यिक स्रोत, विदेशी यात्रियों के विवरण आदि का भी सहारा लिया जाना अपेक्षित है।

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य हमारे गौरवपूर्ण इतिहास को प्रकाशित करके जनमानस में राष्ट्रीय स्वाभिमान की भावना जाग्रत् करना एवम् भारतीय इतिहास में महाराजा विक्रमादित्य की पहचान सुनिश्चित करना है। आप सभी से अनुरोध है कि इस संगोष्ठी में अवश्य सम्मिलित हों। संगोष्ठी के उपविषय निम्नवत हैं :

• विक्रमादित्यकालीन मालव गणराज्य
• विक्रमादित्यकालीन भारत
• महाराजा विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य
• महाराजा विक्रमादित्य : अभिलेखीय साक्ष्य
• महाराजा विक्रमादित्य : मौद्रिक साक्ष्य
• कथासरित्सागर में विक्रमादित्य
• भविष्यपुराण में विक्रमादित्य
• वेतालपञ्चविंशति में विक्रमादित्य
• प्रभावकचरित्र में विक्रमादित्य
• जैन-साहित्य में महाराजा विक्रमादित्य
• अरबी-फ़ारसी स्रोतों में विक्रमादित्य
• महाराजा विक्रमादित्य और राजर्षि भर्तृहरि की समकालिकता
• महाराजा विक्रमादित्य और गुरु गोरखनाथ की समसामयिकता
• विक्रमादित्य की तिथि और ऐतिहासिकता
• विक्रमादित्य के कार्य : शक-विजय
• विक्रमादित्य के कार्य : संवत्-प्रवर्तन
• विक्रम संवत् की प्राचीनता और ऐतिहासिकता
• विक्रम संवत् बने भारत का राष्ट्रीय संवत्
• विक्रमादित्य के कार्य : श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर एवं काशी विश्वनाथ मन्दिर का निर्माण
• विक्रमादित्य के नवरत्न (कालिदास, वराहमिहिर, घटखर्पर, वेतालभट्ट, वररुचि, अमरसिंह, शंकु, क्षपणक और धन्वन्तरि)
• विक्रमादित्य के वंशज
• विक्रमादित्यकालीन कला
• लोकगाथाओं में विक्रमादित्य
• विक्रमादित्य-सम्बन्धी नवीन अनुसन्धान
✍🏻गुँजन अग्रवाल

भारतवर्ष के संदर्भ में केन्द्रीय सत्ता का उल्लेख वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, पुराणों आदि में मिलता है और यह स्वाभाविक बात है कि ग्रन्थों में उल्लेख उसीबात का होता है जिसका अस्तित्त्व या तो ग्रन्थों के लेखन के समय में हो या उससे पूर्व रहा हो। यद्यपि यह भी सही है कि आधुनिक मानदण्डों के अनुसार सत्ता का एक राजनीतिक केन्द्र समूचे देश में कदाचित नहीं रहा किन्तु अनेक ब्राह्मण ग्रन्थों और पुराणों में विभिन्न साम्राज्यों के लिए सार्वभौम या समुद्रपर्यन्त जैसे शब्दों का प्रयोग मिलता है। इस बात के उल्लेख भी प्राचीन ग्रन्थों में मिलते हैं कि अनेक चक्रवर्ती सम्राटों ने अश्वमेध, राजसूय या वाजपेय आदि यज्ञ करके देश में अपनी प्रभुसत्ताएँ स्थापित की थीं। इसीप्रकार से कितने ही सम्राटों ने दिग्विजय करके सार्वभौम सत्ताओं का निर्माण भी किया था। ऐसे सम्राटों में प्राचीन काल के यौवनाश्व अश्वपति, हरिश्चन्द्र, अम्बरीश, ययाति, भरत, मान्धाता, सगर, रघु, युधिष्ठिर आदि और अर्वाचीन काल के महापद्मनन्द, चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं।

यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक मानदण्डों के अनुसार केवल वे ही शासक चक्रवर्ती सम्राट की पदवी पाते थे और वे ही अश्वमेध आदि यज्ञ करने के अधिकारी होते थे, जिनका प्रभुत्व उस समय के ज्ञात कुल क्षेत्र पर स्थापित हो जाता था। प्रकारान्तर से यह प्राचीन भारतीय परिवेश और मानदण्डों के अनुसार केन्द्रीय सार्वभौम सत्ता का ही द्योतक है अतः पाश्चात्यों की उपरोक्त मान्यता तत्त्वतः सही नहीं है।

चक्रवर्तियों की सूची में 12 नाम तो अनेक स्रोतों में मिलते हैं, कई सन्देहास्पद हैं | वैसे भी सूर्यचक्र में 12 अरे होते हैं, अतः सूर्यवंश में 12 चक्रवर्ती होने की बात ही तर्कसंगत लगती है, हो सकता है इसी आधार पर संख्या 12 तक ही कल्पित कर ली गयी हो | “चक्रवर्ती” की पारंपरिक परिभाषा है “पृथ्वीचक्रम् वर्तते” = समुद्रपर्यंत समस्त भूमि पर जिसका चक्र चले | मैत्रेय उपनिषद, महाभारत, बौद्ध तथा जैन साहित्यों में चक्रवर्तियों का उल्लेख है | जिन बारह चक्रवर्तियों की सूची उपलब्ध है, वे सब के सब सूर्यवंशी (इक्ष्वाकु वंश के) थे :–
भरत, सगर, मघवा, सनत्कुमार, शान्ति, कुन्थु, अर, कार्तवीर्य, पद्म, हरिषेण, जय, ब्रह्मदत्त |
यह सूची आज से एक हज़ार वर्ष पहले के ग्रन्थों में है, जब भारत से बाहर का भूगोल भी भारत के पण्डित भूल चुके थे |
ये भरत द्वापर युग के शकुन्तला-पुत्र भरत नहीं, बल्कि सृष्टि के आरम्भ में मनुवंशीय भरत थे जिनके नाम पर भारतवर्ष नाम पडा |
अग्नि पुराण (अध्याय 107 – श्लोक 11-12) , विष्णु पुराण (अंश-2, अध्याय-1 में श्लोक 29-32), नारसिंह पुराण (अध्याय-30) आदि में स्पष्ट वर्णन है कि स्वायम्भुव मनु की छठी पीढी में (मनुपुत्र प्रियव्रत, उनके पुत्र अग्नीध्र, उनके पुत्र नाभि, उनके पुत्र ऋषभ) ऋषभपुत्र भरत हुए थे जिनके नाम पर अग्निपुराण के अनुसार हिमाह्वय का नाम बदल कर भारतवर्ष रखा गया ; अन्यत्र हिमाह्वय का नाम अजनाभवर्ष मिलता है जिसे बदलकर भारतवर्ष नामकरण हुआ | पुराणों और ज्योतिष-सिद्धान्त ग्रन्थों के अनुसार यह काल लगभग 195 करोड़ वर्ष पहले का है | तबसे 454 बार महायुगों की संधियों में प्रलय आ चुके हैं जिनमें पिछले महायुगों के भौतिक अवशेष नष्ट हो जाते हैं, अतः भौतिक पुरातत्व द्वारा इतने प्राचीन प्रमाण ढूँढना असम्भव हैं |
यही भरत विश्व के प्रथम चक्रवर्ती थे | जैन साहित्य में इनके पिता को प्रथम जैन तीर्थंकर माना गया है | किन्तु जैन साहित्य के अलावा किसी भी ग्रन्थ में महावीर स्वामी से पहले किसी “जैन तीर्थंकर” का उल्लेख नहीं मिलता | पुराणों के अनुसार ऋषभ और शान्ति, कुन्थु, अर आदि सनातनी थे, जैन नहीं, किन्तु जैन साहित्य में “शान्ति, कुन्थु, अर” को भी ‘जिन’ कहा गया है जो कई मध्ययुगीन अन्यान्य ग्रन्थों में भी आयातित कर लिया गया |
इक्ष्वाकु वंश दिव्य वंश था, उसके राजा साधारण मानव नहीं थे |
कलियुग में बहुत से लोग सूर्यवंशी कहलाते हैं किन्तु उनका प्राचीन सूर्यवंश से कोई सम्बन्ध नहीं है | प्राचीन सूर्यवंश दिव्यवंश था जिसके राजाओं की औसत आयु (दशरथ जी और राम जी को छोड़कर) 73825 वर्षों की थी, त्रेतायुग अन्त पर था अतः दशरथ केवल 60000 वर्षों तक और राम जी केवल 11000 वर्षों तक ही राज कर पाए, युग ही समाप्त हो गया | वे सबके सब “राजर्षि” थे यह गीता में श्रीकृष्ण ने कहा, और केवल महाभारत युद्ध के लिए उन प्राचीन राजर्षियों का गोपनीय राजयोग सीमित अवधि हेतु अर्जुन को दिया, श्रीकृष्ण के जाते ही वह राजयोग भी चला गया और अर्जुन गाण्डीव उठा भी न सके !
अयोध्या का उल्लेख अथर्ववेद में है और इक्ष्वाकु वंश के कई राजाओं का उल्लेख ऋग्वेद में है जिनपर इतिहासकार मौन हैं | दयानन्द स्वामी मानते थे कि वेदों में इतिहास नहीं है, वेदों में व्यक्तियों के नामों का वे भावार्थ लगाते थे | भारतीय मान्यता यह रही है कि वेद सृष्टि से पहले भी थे और प्रलय के बाद भी रहेंगे , किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वेदों का इतिहास से सम्बन्ध नहीं – वेदों में वर्णित पदों और परिघटनाओं की इतिहास में आवृति होती है |
चक्रवर्ती और सम्राट में अन्तर होता है | सम्राट का अर्थ है जिसने राजसूय यज्ञ किया हो, राजमण्डल के बारहों प्रभेदों पर जिसका वर्चस्व हो और सभी राजाओं को जिसने वश में कर लिया हो | द्वापर और कलियुग में कोई चक्रवर्ती नहीं हुआ | गौतम बुद्ध के बाद तो अंग्रेजों के अलावा किसी का सम्पूर्ण भारत पर भी वर्चस्व नहीं हुआ |
ज्योतिषशास्त्र की मान्यता है कि जन्मकुण्डली में कम से कम पाँच ग्रह उच्च होकर शुभ भावों में स्थित होने तथा अन्यान्य शुभ योगों के रहने से चक्रवर्ती योग बनता है | जैसी कि पराशर ऋषि के मतानुसार केन्द्रेश और त्रिकोणेश परस्पर राजयोग बनाते हुए यदि सिंहासनांश में हो तो चक्रवर्ती योग बनता है जिस कारण सम्पूर्ण पृथ्वी का पालक बनने की क्षमता मिलती है | पराशर ऋषि ने चक्रवर्तियों की सूची में राजा हरिश्चन्द्र, उत्तम मनु, बलि, वैश्वानर तथा “अन्य कई” हो चुके हैं ऐसा लिखते हुए कहा कि वर्तमान (उनके) युग में युधिष्ठिर तथा भविष्य में शालिवाहन (कनिष्क नहीं) होंगे | ये शालिवाहन गौतम बुद्ध से बहुत पहले वाले हैं |
पराशर ऋषि की सूची अधिक प्रामाणिक लगती है, जिसका पौराणिक कथाओं से साम्य दिखता है | अतः चक्रवर्तियों की संख्या बारह तक ही सीमित नहीं होगी |
पराशर ऋषि ने चक्रवर्ती से भी ऊँचे ज्योतिषीय योगों का उल्लेख किया है :-
केन्द्रेश और त्रिकोणेश परस्पर राजयोग बनाते हुए यदि पारावतांश में हो तो मनु, अर्थात सम्पूर्ण मन्वन्तर का अधिप, होते हैं ; ये ग्रह यदि देवालोकांश में हो तो विष्णु के अवतार जन्म लेते हैं, ये ग्रह यदि ब्रह्मलोकांश में हों तो ब्रह्मादि लोकपाल प्रकट होते हैं ; और ये ग्रह यदि ऐरावतांश में हों तो सम्पूर्ण कल्प का आरम्भ करने वाले स्वायम्भुव मनु जन्म लेते हैं |
षोडशवर्गों के अन्तर्गत दशवर्ग में पाँच वर्गों में यदि उच्चादि ग्रह हों तो सिंहासनांश योग बनता है ; सिंहासनांश योग वाले ग्रह यदि केन्द्रेश और त्रिकोणेश वाला परस्पर राजयोग भी बनाएं तभी चक्रवर्ती योग बनता है | कुछ लोगों ने इस जटिल योग को न समझकर स्थूल नियम बना दिया कि केवल पाँच ग्रह उच्च होने से चक्रवर्ती योग बन जाता है, जो असत्य है | सिंहासनांश योग वाले पाँच षोडशवर्गों में राज-पाट से सम्बंधित वर्ग होने अनिवार्य हैं, वरना अन्य विषय का चक्रवर्ती योग बन जाएगा, राजनैतिक नहीं | अतः लग्नकुण्डली (प्रथम वर्ग), नवांश, होरा, दशमांश और अन्य किसी दशवर्ग में उच्चादि ग्रह यदि परस्पर केन्द्रेश और त्रिकोणेश वाला परस्पर राजयोग बनाएं तो सर्वोत्तम चक्रवर्ती योग बनेगा | दशवर्ग में किन-किन पाँच वर्गों में और कुंडलियों के किन-किन भावों में योगकारक ग्रह स्थित हैं इसपर यह निर्भर करेगा कि किस प्रकार का चक्रवर्ती है |
2003 ईस्वी में 36 लाख से अधिक ऐसे बालकों-बालिकाओं का जन्म हुआ है जिनकी कुण्डली में छ या सात ग्रह उच्च के हैं (हाल में भी कुछ ऐसे बच्चे जन्मे हैं, किन्तु संख्या बहुत कम है), वे सभी चक्रवर्ती नहीं हो सकते (केवल 5 या 6 ग्रह उच्च होने से चक्रवर्ती योग नहीं बनता | उच्च ग्रह यदि अशुभ घरों में हों या अशुभ ग्रहों के सम्बन्धी हों या अशुभ घरों के स्वामी हों तो अशुभ फल देते हैं ) | उन छ या सात उच्च ग्रहों में से कम से कम पाँच ग्रह यदि उपरोक्त चक्रवर्ती योग बनाएं तभी सम्पूर्ण पृथ्वी को एक कर पायेंगे | चक्रवर्ती योग हेतु ग्रहों का केवल उच्च होना ही अनिवार्य नहीं है, मूलत्रिकोणस्थ अथवा स्वगृही होने से भी चक्रवर्ती योग बन सकता है |
किन्तु विशुद्ध चक्रवर्ती योग के अलावा भी अनेक प्रकार के राजयोग होते हैं |

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