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इतिहास के पन्नों से

चक्रवर्ती सम्राट कनिष्क गुर्जर वंश से थे – भाग 2

गुर्जर जाति के प्रारंभिक राजवंशों में चेची, कुषाण, खटाना, हूण तथा नागवंश विशेष उल्लेखनीय है।
– मनीषा डी. पवार, एशिया महाद्वीप में गुर्जर, पृष्ठ संख्या 8

बहुत पुराने राजकुल जैसे अम्ब, कुषाण, लावा, ठक, पोसवाल, यादव, परमार, चुलुक, योधेय (जोहिया) तथा प्रतिहार गुर्जर जाति के ही संगठक अवयव है।
– अमर सिंह कसाना, एशिया महाद्वीप में गुर्जर, पृष्ठ संख्या 30

प्राचीन काल में भारतीय संस्कृति का फैलाव था। यदि आप कुषाण काल के सिक्कों को देखे तो उनपर सम्राट कनिष्क का हवन करते हुए चित्र है। यह सब इसी बात का द्योतक है। कुषाण शासकों के शासन की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) तथा दक्षिण की राजधानी मथुरा थी। सन 25 ई से 425 ई तक का कुषाण काल तो अति उत्तम रहा है। महर्षि चरक आदि जैसे वैद्य, कपिल, कणाद जैसे वैज्ञानिक इन्हीं कुषाण गुर्जर शासकों के शासनकाल में हुए है। व्यापार, विज्ञान, कला, कौशल की बहुत उन्नति इन्हीं कुषाण गुर्जर शासकों के समय में हुई।
– डॉ जय सिंह गुर्जर, एशिया महाद्वीप में गुर्जर, पृष्ठ संख्या 35

थे जो भारत मां के लाल, रघुकुल रीति गए है पाल।
कुश के वंशज महान कनिष्क, निर्मित कर साम्राज्य विशाल।
ईराक और जार्जिया, गांधार, पर्शिया और हिमालय पार।
वैदिक आर्य उदभव भूमि, सीमा बनी थी चीन दीवार।
यारकन्द, तिब्बत, ब्रह्मा, स्याम, समस्त ये भारत भूमि धाम।
कनिष्क ने राज्य किया इकक्षत्र, बढ़ाकर इक्ष्वाकु का नाम।।

– पंडित बालकृष्ण गौड़, एशिया महाद्वीप में गुर्जर, पृष्ठ संख्या 63

कुशानवंशीय कनिष्क ने कई यज्ञ किए, देव मंदिर निर्माण करवाये तथा बौद्ध – हिन्दू धर्म का अनुयायी बनकर अनेक विद्वानों का संरक्षण किया था। उसके राज्य में बौद्ध चरित और सौन्दरानन्द नमक काव्यों के रचयिता अश्वघोष, शून्यवाद के प्रवर्तक और प्रकाण्ड दार्शनिक नागार्जुन पाश्र्व और वसुमित्र आदि शोभा पाते थे। आयुर्वेद का प्रसिद्ध चरक कनिष्क के आश्रय में रहा है। भवन निर्माण कला, धर्म साहित्य और शास्त्रों के ज्ञान का देववाणी (संस्कृत) में समन्वय करने वाला कनिष्क एवं उसके वंशज तुरुष्क (तुर्क) नहीं हो सकते। कनिष्क के उत्तराधिकारी वासिष्क और हुविष्क थे, जिनमें से हुविष्क राजगद्दी पर बैठा था। वासुदेव इस वंश का अंतिम सम्राट था जिसके विषय में इतिहासज्ञ जैन लिखते है कुषाण वंश का राजा वासुदेव (152 ई से 176 ई) के सिक्के मिले है, वह शिव का उपासक था, लेकिन नाम से कृष्ण का उपासक लगता है। इतिहासकार उसे भागवत (भागवतधर्म) का अनुयायी मानते है।
एम. एस. जैन, प्रारंभिक इतिहास, पृष्ठ संख्या 173
– फतहलाल गुर्जर, भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रहरी गुर्जर प्रतिहार, पृष्ठ संख्या 81 व 82

कुषाण वंश
चौ खुर्शीद भाटी, गुर्जरों का सम्पूर्ण इतिहास, पृष्ठ संख्या 215 से 222

महान सम्राट कनिष्क कुषाण गुर्जर वंश के है।
– प्रिंसिपल गणपति सिंह जी, गुर्जर वीर वीरांगनाएं, पृष्ठ संख्या 8 से 15

कुषाण गुर्जर थे। कुषाणों के रबातक अभिलेख में गुर्जर शब्द का उल्लेख भी यही सिद्ध करता है कि कुषाण गुर्जर थे। स्पष्ट है कि इक्ष्वाकु वंश क्षत्रिय गुर्जर है, चाहे कुषाण हो, चाहे लौर हो, लेवा हो, चाहे खारी हो, कड़वा हो, नाग हो, और चन्द्रवंशी क्षत्रिय भी गुर्जर गुर्जर है, चाहे कुषाण हो, चाहे जांगल हो, चाहे पांडव हो, चाहे चेची हो, गुरूतर हो, गुर्व: हो, गुरूजन हो। इन सब कुलों का नाम गुर्जर है। मध्य एशिया के इतिहास में इतिहासकारों ने कुषाणों को गुर्जर लिखा है तो भारतीय इतिहास में भारतीय इतिहासकारों द्वारा कुषाणों को गुर्जर लिखा जाना कोई नयी बात नहीं है। वर्तमान में भी कुछ भारतीय लेखकों को कुषाणों को गुर्जर लिखने में अच्छा नहीं लगता है। लेकिन क्या करे उनकी मजबूरी है, भारतीय इतिहास में कुषाणों का उल्लेख तो करना ही पड़ता है अन्यथा उस काल में अराजकता का जन्म हो जाएगा। भारतीय लेखकों को कुषाणों को गुर्जर लिखने का गर्व होना चाहिए, जिन भारतीय कुलों ने मध्य एशिया में राज किया था।
– डॉ केआर गुर्जर, वृहद कुणबे की सामाजिक यात्रा इतिहासकारों का दृष्टिकोण, पृष्ठ संख्या 175

आर्कियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया नामक विभाग के अध्यक्ष सर एलेक्जेंडर कनिंघम ने कुषाणों को गुर्जर लिखा है।
– आर्कियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया, वॉल्यूम 2, पृष्ठ संख्या 61

ऐतिहासिक तोर पर कनिष्क द्वारा स्थापित कुषाण साम्राज्य गुर्जर कौम का प्रतिनिधित्व करता हैं। यह साम्राज्य भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि उन सभी देशो में फैला हुआ था जहाँ आज गुर्जर रहते हैं। कुषाण साम्राज्य की एक राजधानी मथुरा, भारत में तथा दूसरी पेशावर, पाकिस्तान में थी। तक्षशिला और बेग्राम,अफगानिस्तान में इसकी अन्य राजधानी थी। मशहूर पुरात्वेत्ता एलेग्जेंडर कनिंघम इतिहास प्रसिद्ध कुषाणों की पहचान आधुनिक गुर्जरों से की हैं। उनके अनुसार गुर्जरों का कसाना गोत्र कुषाणों का वर्तमान प्रतिनिधि हैं। कनिष्क के साम्राज्य का एक अंतराष्ट्रीय महत्व हैं, दुनिया भर के इतिहासकार इसमें अकादमिक रूचि रखते हैं। प्राचीन काल का अंतराष्ट्रीय व्यापर मार्ग जिसे रेशम मार्ग कहा जाता था कुषाणों के नियंत्रण में था गुर्जरों के पूर्वजों अर्थात कुषाण परिसंघ के लोगो ने अपने साम्राज्य में एक सार्वदेशिक संस्कृति का पोषण किया। कुषाण साम्राज्य के अतरिक्त गुर्जरों से सम्बंधित कोई अन्य साम्राज्य नहीं हैं जोकि पूरे दक्षिणी एशिया में फैले गुर्जर समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इससे अधिक उपयुक्त हो। यहाँ तक की मिहिर भोज द्वारा स्थापित प्रतिहार साम्राज्य केवल उत्तर भारत तक सीमित था तथा पश्चिमिओत्तर में करनाल इसकी बाहरी सीमा थी। अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार कनिष्क ने अपने राज्य रोहण के अवसर पर 78 ईस्वी में शकसंवत प्रारम्भ किया। शक संवत प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को आरम्भ होता हैं, अतः 22 मार्च कनिष्क के राज्य रोहण की तिथि हैं। दक्षिणी एशिया विशेष रूप से गुर्जरों के के प्राचीन इतिहास में यह एक मात्र तिथि हैं जिसे अंतराष्ट्रीय रूप से मान्य पूरी दुनिया में प्रचलितजूलियन कलेंडर के हिसाब से निश्चित किया जा सकता हैं। अतः अन्य पंचांगों पर आधारित तिथियों की विपरीत यह भारत, पाकिस्तान अफगानिस्तान अथवा अन्य जगह जहा भी गुर्जर निवास करते हैं यह एक ही रहेगी।
– डॉ. सुशील भाटी, असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास विभाग

कुषाण गुर्जर है।
– डॉ केआर गुर्जर, गुर्जर क्षत्रियों की उत्पत्ति एवं गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य, पृष्ठ संख्या 59

जो बहादुर गुर्जर सम्राट हुए उनका कुछ परिचय देना यहाँ आवश्यक हो जाता है। महान सम्राट कनिष्क कुषाण, जैनेन्द्र यशोधर्मा, गुर्जर प्रतिहार सम्राट नागभट्ट, गुर्जर सम्राट मिहिरभोज, सम्राट महिपाल, भोज परमार, महाराजा गुर्जरेश्वर, महाराजा भीमदेव प्रथम सोलंकी, महाराजा कर्णदेव, प्रथम गुजरी महारानी मीनल देवी व जयसिंह सिद्धराज, गुजरी महारानी नायिका देवी। उपरोक्त सम्राट व साम्राज्ञीयों ने वीर वीरांगनाओं ने भारत पर राज्य किया।
– चौधरी प्रताप सिंह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, गुर्जर गाथा, पृष्ठ संख्या 3

गुरुत्तर गुरु सभ्यता और संस्कृति के पोषक गुर्जर सम्राट कनिष्क महान। गुरुत्तर गुरु गुर्जर शकार्य सभ्यता और संस्कृति के गौरव कुषाण साम्राज्य के अंतर्गत सम्राट कनिष्क के शासनकाल को कहा जा सकता है। सम्राट कनिष्क का साम्राज्य 78 ईस्वी से 101 ईसवी के लगभग रहा। सम्राट कनिष्क को वैदिक संस्कृति एवं सौर धर्म का रक्षक अथवा पोषक कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। कुषाण सूर्यवंशी गुर्जर परंपरा में माने जाते हैं। भारत वर्ष के इतिहास में मौर्य युग की भांति कुषाण काल की सभ्यता और संस्कृति की उन्नति के पीछे भी एक विशाल साम्राज्य द्वारा प्रदत्त सुविधाएं थी, जिन के अभाव में समृद्ध संस्कृति की विशेष उन्नति संभव न थी। मौर्य साम्राज्य के पतन के पश्चात कुषाण साम्राज्य ही इतना विशाल था जिसके अंतर्गत न केवल संपूर्ण उत्तरी भारत अपितु इसके बाहर के भी पर्याप्त भूभाग मध्य एशिया तक के सम्मिलित थे। सम्राट कनिष्क के शासन काल में भारत का विदेशों के साथ में घनिष्ठ संपर्क स्थापित हुआ। इस दृष्टि से कुषाण काल भारतीय संस्कृति के इतिहास में अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सांस्कृतिक दृष्टि से कुषाण युग में कई नवीन तत्वों का उदय हुआ जिनका बाद में भारतीय संस्कृति में काफी महत्वपूर्ण स्थान हो गया। सम्राट कनिष्क के शासन काल में यज्ञ संस्कृति एवं सौर धर्म का पुनरुत्थान हुआ। कनिष्क ने”देव”उपाधि धारण की। कनिष्क के शासनकाल में महायान को बौद्ध धर्म के रुप में मान्यता प्रदान की गई।मध्य और पूर्वी एशिया में बौद्ध धर्म के साथ साथ भारतीय संस्कृति का प्रचार होने लगा। कुषाण युग की आर्थिक व्यवस्था ने सभ्यता की उन्नति को प्रोत्साहन दिया।यह युग साहित्यिक रचनाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण युग था। कनिष्क विद्वानों का आश्रय दाता था।अश्वघोंष इस समयावधि में साहित्य प्रगति का नेता था। नागार्जुन ने दर्शन ग्रंथों की रचना का कार्य किया।चरक को कनिष्क का राज वैद्यराज कहा जाता है। उसने चिकित्सा शास्त्र की रचना की। कनिष्क के शासन में गांधार कला की प्रगति हुई। गांधार और मथुरा कनिष्क के समय के प्रमुख कला केंद्र थे। मथुरा की सभी कलाकृतियों का लाल पत्थर में निर्माण हुआ। मथुरा कला का भरहुत और सांची की कलाओं के साथ निकट संबंध है सांचीक् और भरूहुत की कलाकृतियों में एक प्रकार की सूक्ष्म प्रतीकात्मकता का आभास मिलता है जिसका मथुरा की कला में अभाव है। कनिष्क के शासन काल में सूर्य की आदम कद प्रतिमाओं एवं अनेक सूर्य मंदिरों का निर्माण हुआ। कनिष्क का प्रभावी राज्य क्षेत्र कश्मीर भी रहा है। कनिष्क की राजधानी पेशावर और मथुरा रही है।
– डॉ मोहनलाल वर्मा, संपादक – देव चेतना

सम्राट कनिष्क महान 78 ई. से 120 ई.(कुषाण साम्राज्य) – गुर्जर मनुपुत्र इक्ष्वाकु के वंशज है। इक्ष्वाकु की राजधानी कौशल (अयोध्या) थी।यह क्षेत्र आर्यावर्त कहलाता था जो भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान का क्षेत्र पड़ता था।आर्यावर्त का विस्तार करते हुए इक्ष्वाकु पुत्र यहां से पलायन कर उत्तर की ओर गए।यह क्षेत्र शकदीप कहलाया और इक्ष्वाकु वंशज ऋषिक कहलाए ।चीनी भाषी लोगों ने इन्हे यू ची कहा,यू ची से बात में चेची शब्द बना। शकदीप के ऋषिकों की बड़ी खांप खटाना, कुषाण, श्वेत हूण कहलाए। शकदीप के आर्यों की 14 खापें हुई, चेची से कुषाण शाखा बनी जो सबसे शक्तिशाली थी।शेष शाखाएं श्वेत हूण,शक,खटाना(खोटान) राज्य हुए। 1. महाभारत में विवरण मिलता है कि राजसूय यज्ञ के समय अर्जुन अश्वमेघ लेकर शकदीप गया था तथा शकदीप के ऋषिको, कुषानो से युद्ध किया था। 2. डा. श्याम सिंह शशि ने कुषाणो को कुश की संतान माना है। 3. साईक्लोपीडिया ब्रटानिका के खंड 2_ 3 के पृष्ठ संख्या 639 में कुषाणो को गुर्जर लिखा है। 4.अलबरूनी की पुस्तक लंदन में के अनुसार कुशानो की 60 पीढ़ियों ने काबुल पर शासन किया। 5.ब्रह्म सिद्धांत पुस्तक में कनिष्क का वंशक्रम महाभारत के युधिष्ठिर तक दर्शाया गया है तथा कनिष्क से पहले की पीढियां भी ब्रह्म सिद्धांत पुस्तक में दर्ज है। 6.तारीख ए गुर्जर पुस्तक के लेखक राणा अली हसन चौहान ने पृष्ठ संख्या 435 में भी उपरोक्त लिखा है। 7.चरक संहिता के रचयिता ऋषि चरक कनिष्क कुषाण का दरबारी मंत्री था। 8. कुषाणो (सम्राट कनिष्क )के संबंध में टोकियो इंपिरिल यूनिवर्सिटी के प्रो. श्री हाजिमें नकामपुरा जो संस्कृत,पाली व इतिहास के विद्वान थे। उनको भारत के राष्ट्रपति डा. राधाकृष्ण ने विद्या वाचस्पति की मानस उपाधि दी थी।उन्होंने पुस्तक वे ऑफ थिंकिंक ईस्टर्न पीपल के पृष्ठ संख्या 170 से 171 में कनिष्क को कसाना गुर्जर लिखा है। कुषाण साम्राज्य की पीढियां – 1.कुजुल कदाफिश 25 ई. 50 ई. तक। राजधानी पुरुषपुर(पेशावर) थी। 2. विम कदाफीश (कदाफिश द्वितीय) 50 ई. से 78 ई. तक रहा। सोने के सिक्कों का प्रचलन किया। 3.कनिष्क महान ने 78 ई.से 120 ई तक शासन किया ,यह विश्व के 4 साम्राज्यो चीन, कुषाण, पर्शिया,रोम में से एक था। इनकी राजधानी पेशावर तथा ब्रांच मथुरा थी।चरक इनका मंत्री व राजवेद्य था।वर्तमान शक संवत कनिष्क महान ने 78 ई. से चलाया था। 4.सम्राट हुविषक 120 ई. से 152 ई. तक (कनिष्क का पुत्र)। 5. वासुदेव प्रथम 152 ई. से 186 ई. तक। इनके बाद कुषाण साम्राज्य बंट गया तथा 425 ई. तक रहा।उसके बाद कुषाणो के मंत्री लालिया शाही ब्राह्मण ने सत्ता पर कब्जा कर लिया।
– शैतान सिंह गुर्जर, राष्ट्रीय महासचिव – गुर्जर इतिहास साहित्य एव भाषा शोध संस्थान

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