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वैदिक संपत्ति : द्रविड़ और आर्य शास्त्र

वैदिक संपत्ति

गतांक से आगे …

द्रविड़ और आर्य शास्त्र

पुराणों में जितने यज्ञों का वर्णन है,उन सब में यजुर्वेद से अध्वर्यु की ही योजना पाई जाती है। विष्णु और वायुपुराण के देखने से ज्ञात होता है कि, जनमेजय के दोनों यज्ञों के शल्क यजुर्वेद से अध्वर्यु की की योजना हुई थी। और धर्मराज के यज्ञ में याज्ञवल्क्य की ही योजना हुई थी। यदि प्राचीन काल में चरक की योजना का कायदा होता, तो जिन याज्ञवल्क्य आदि के द्वारा इस तैत्तिरीय वीर की उत्पत्ति बतलाई जाती है, उन्हीं के समय में उन्हीं के साथ चरक की ही नियुक्ति होती है,परंतु वहां चरक का कहीं पता नहीं मिलता। चरक की आर्य- समाज में नियुक्ति ही नहीं है। चरक तो अनार्य जाति का आचार्य है।

बृहदारण्यक उपनिषद में लिखा है कि,’ मद्रेषु चरका:पर्यव्रजाम ‘अर्थात चरक तो मद्र देश के घूमने वाले हैं।कर्ण ने भी मद्रों की निंदा की है। अतः मद्य,मांस व्यभिचार करने का प्रचार करने वाले यही है। इसलिए यजुर्वेद 30/18 के ब्राह्मणभाग में स्पष्ट लिखा हुआ है कि, ‘दुष्कृताय च चरकाचार्य’ अर्थात दुष्ट कर्म करने वालों को चरकाचार्य कहते हैं।अतएव चरक को महत्व देने वाला यह तैत्तिरीय वेद निश्चय ही दुष्कर्मी विदेशियों का – असुरों का – रावण का – द्रविड़ो का – बनाया हुआ है ,इसमें संदेह नहीं।

(4) अगले जमाने में जब वेदों का पठन-पाठन था ,उस समय ऋषियों ने वेदों के पठन-पाठन करने की कई एक विधियां निर्धारित की थी। विधियों को शाखाभेद कहा करते थे। शाखाभेद के प्रवर्तक ही गोत्रप्रवर्तक होते थे ।जो विद्यार्थी जिस शाखा का अध्ययन करता था,वह अपने को उसी शाखा और उसी शाखा के प्रवर्तक ऋषि के गोत्र का कहता था। इसलिए उस जमाने में एक-एक वेद की अनेक शाखाएं और अनेक गोत्र हो गए थे।और अनेक ब्राह्मण अनेक शाखाओं और अनेक गोत्रों में विभक्त हो गए थे। परंतु इस तैत्तिरीय वेद की कोई भी भिन्न शाखा नहीं थी , न इनके कोई नवीन गोत्र ही बने थे।इसलिए द्रविड़ों में शाखाभेद नहीं पाया जाता। शाखाभेद के लिए उनके यहां उसी तैत्तिरीय वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में लिखा है।
इसमें शाखाभेद के स्थान में अनुवाकों की संख्या का भेद रखा गया है।इस तैत्तिरीय वेद के 64 अनुवाक द्राविडों के ,,80 आंधों के ,,74 कर्नाटकओ के और 89 अन्य के हैं।इस प्रमाण से यह स्पष्ट हो गया कि वेद की शाखाएं नहीं है ।साथ ही यह भी सिद्ध हो गया कि ,यह समस्त वेद इन्हीं में चरितार्थ है और इस वेद का आर्य जनता से कुछ वास्ता नहीं है।हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि,किसी भी आर्य ब्राह्मण की शाखा तैत्तिरीय कृष्णावेद नहीं है। इसलिए यह वेद इन्हीं का या इनके पूर्व आचार्य रावणादि का बनाया हुआ है। इसके अतिरिक्त समस्त द्राविड़ों के वही गोत्र हैं, जो अन्य शुद्ध ऋग्वेदी ,यजुर्वेदी ,सामवेदी ब्राह्मणों के हैं। क्या कारण है कि तैत्तिरीय से संबंध रखने वाला कोई गोत्र नहीं है ? कारण स्पष्ट है कि तैत्तिरीय का किसी ऋषि मुनि से वास्ता नहीं है।वह रावणादि द्राविड़ों की रचना है और उन्हीं के लिए है।क्योंकि मनुस्मृति में लिखा है कि ‘यक्षरक्ष:पिशाचान्नं मद्य मांस सुरासवम् ‘ अर्थात् मद्यमांस आदि राक्षसों के ही खाद्य पेय पदार्थ हैं। उधर चारवाक कहता है कि,’मांसानां खादनं तद्वन्निशाचरसमीरित्तम् ‘अर्थात वेद में मांसाहार निशाचरों का मिलाया हुआ है।इधर हम देख रहे हैं कि रावणादि राक्षस माद्यमांसभक्षी थे। अतः वेदों के नाम से माद्यमांस का प्रचार उन्हीं का किया हुआ है।आगे हम इस रावणदिकृत तैत्तिरीय साहित्य से मद्यमांस की लीला भी दिखलाने का यत्न करते हैं।
क्रमशः

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट

चेयरमैन :  उगता भारत

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