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आओ कुछ जाने

क्या विभीषण ने अपने भाई के साथ गद्दारी की थी ?

कहते हैं,
विभीषण अपने अग्रज रावण व देश के स्थान पर राम का साथ दिया |
यदि इसमें धर्म-अधर्म, न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य की दृष्टि मिला दिया जाये तभी विभीषण की दृष्टि व मानसिकता को समझा जा सकता है |


क्या राम से मिलने से पूर्व विभीषण ने अग्रज भाई को समझाने का पुरजोर प्रयास नहीं किया ?
परन्तु रावण अपनी शक्ति के घमण्ड में किसी की भी बात व सलाह नहीं माना | विभीषण को तो पद-प्रहार कर राम के पास चले जाने को कहा |
जबकि यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राम-लक्ष्मण को छल से दूर कर सीता का हरण कर अपनी वीरता का नहीं कायरता का परिचय दिया |
कभी राम तो कभी लक्ष्मण के पास परिणय-निवेदन करने वाली व्यभिचारिणी शूर्पणखा का साथ देने वाले खर-दूषण, कुम्भकरण-मेघनाथ सहित पुरे परिवार, हित, मित्र, पुरे राज्य का नाश हुआ |
रावण ने भी शूर्पणखा का साथ देकर अपनी वीरता, विद्वता, नीतिज्ञता, पर प्रश्न खड़ा कर दिया |
क्या ऐसे बहन-भाई व परिवार के किसी सदस्य का साथ देना उचित माना जा सकता है ?
रावण व उसके साथ देने वाले की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग ही आज अपने परिवार के सदस्य व मित्र-बन्धु का साथ देते हैं, भले ही वो बलात्कारी, व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी, कुसंस्कारी, राष्ट्र-समाज-धर्म द्रोही हो |
हमें भी कुम्भकरण-मेघनाथ से प्रेरणा ले कर अन्याय व अधर्म का साथ देनी चाहिये न कि विभीषण से प्रेरणा ले कर सत्य, न्याय व धर्म का साथ देनी चाहिए |
यह हमारे संस्कार ही तय कर सकते हैं |
अतः विभीषण की आलोचना करने से पूर्व विभीषण की मानसिकता व इन तथ्यों पर भी दृष्टि अवश्य डालनी चाहिए |
……राजेश बरनवाल |

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