1926 की अपनी टंकारा यात्रा और टंकारा शताब्दी समारोह विषयक महात्मा नारायण स्वामी जी के रोचक संस्मरण

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छह मास के प्रचार अर्थ लंबे भ्रमण काल में कुछ घटनाएं उल्लेखनीय हैं। उनका यहां उल्लेख किया जाता है –

टंकारा शताब्दी :

मौरवी राज्य में टंकारा एक बड़ा कस्बा है। मौरवी तक रेल है। मौरवी से टंकारा का ट्रांबे [ट्रेम्बे] जाती है। टंकारा ऋषि दयानंद का जन्म स्थान होने से प्रसिद्ध है। काठियावाड़ी भाइयों ने टंकारा में जन्म शताब्दी मनाने को काठियावाड़ में प्रचार प्रारंभ करने का एक अच्छा साधन समझ कर वहां शताब्दी उत्सव मनाया था। उत्सव में बहुत से संन्यासी, उपदेशक और थोड़े-थोड़े प्रायः सभी प्रांत के आर्य भाई एकत्र हो गए थे। लगभग 500 के बाहर से नर नारी वहां पहुंच गए थे, परंतु उत्सव की उपस्थिति लगभग 4000 स्थानीय और आसपास के व्यक्तियों के आ जाने से हो जाया करती थी। 5 दिन तक बराबर उत्सव मनाया गया। ऋषि दयानंद का जिस घर में जन्म हुआ था उसे देखा और कुछ देर तक उसमें भीतर जाकर बैठा भी। स्वामी श्रद्धानंद जी भी वहां आ गए थे। ऋषि के अवशिष्ट संबंधियों से भेंट हुई।

पिता के वंश में उस समय कोई नहीं था। हां भगिनी के वंश में निम्न थे –

  1. प्रेम भाई पुत्री, 2. मागा [बोघा रावल] , पुत्र, 3. कल्याण जी पुत्र – कल्याण जी के दो पुत्र 1. पोपटलाल और 2. प्राणशंकर उस समय थे। सं० 2 का पुत्र केशव नामक है।

टंकारे में आर्यसमाज की स्थापना :

इसी शताब्दी के अवसर पर टंकारे में आर्यसमाज की स्थापना हुई और श्री पोपटलाल जी उसके मन्त्री नियत हुए। वह चूहे वाला प्रसिद्ध शिव का मन्दिर भी देखा गया जिस पर, टंकारा निवासियों ने एक कपड़े पर, मोटे अक्षरों में यह लिखकर टाँग रखा था – “स्वामी दयानन्द के पिता करसनजी तिरवारी का बनवाया हुआ शिव मंदिर।”

स्वामीजी का बचपन का नाम मूलशंकर नहीं, अपितु मूलजी दयाराम और उनके पिता का श्री अम्बाशंकर नहीं, अपितु श्री करसन जी तिरवारी था।

इब्राहीम पटेल :

ऋषि दयानन्द के बचपन का साथी और उनके साथ खेलने वाला एक व्यक्ति इबराहीम पटेल था। उससे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई। उसकी आयु उस समय (1926 ई० में) 105 वर्ष की थी। वह ऋषि दयानन्द के सम्बन्ध में अनेक मोटी-मोटी बातें सुनाता रहा। उससे जिरह करने के ढंग से उपस्थित पुरुषों में से किसी एक ने कुछ प्रश्न किये। उनके उत्तर उसने इस प्रकार दिए –

एक व्यक्ति का प्रश्न – स्वामीजी तो छोटे कद के और काले रंग के थे न?

उत्तर – नहीं; वे बड़े लम्बे और गोरे रंग के थे।

प्रश्न – लड़कपन में तो स्वामी दयानन्द बड़े सीधे-सादे थे न?

उत्तर – नहीं; वे बड़े नटखट थे।

इस उत्तर को सुनकर सब हँस पड़े। कई पुरुषों ने बड़े प्रेम और श्रद्धा से उसे कुछ दिया भी।

देवेन्द्रनाथ (स्वामी जी के जीवन-चरित लेखक) को, जब यह निश्चय हो गया था कि यह वही घर है जिसमें स्वामी दयानन्द ने जन्म लिया था तो टंकारा के लोगों ने बतलाया कि बड़ी श्रद्धा से उन्होंने वहाँ की धूलि को लेकर अपने मस्तक से लगाया और अपने को कृतकृत्य समझा। मैं भी वहाँ की थोड़ी सी धूलि अपने साथ लाया था और उसे अपने रामगढ़ के आश्रम में रख दिया था।

टंकारा में मौरवी के राजा और वीरपुर के ठाकुर साहिब से तथा अन्य अनेक काठियावाड़ के गण्यमान्य पुरुषों से भेंट हुई। वीरपुर के ठाकुर साहिब, काठियावाड़ के एक मात्र आर्य राजा हैं। हम जब टंकारा से रुखसत होकर ट्रेम्बे पर चढ़ने लगे तो ठाकुर साहिब आये और उन्होंने बड़े प्रेम और श्रद्धा से अपने राज्य में आने का निमन्त्रण दिया था। धन्यवाद देते हुए उन्हें उत्तर दिया कि अवसर प्राप्त होने पर आने का पूरा यत्न करूँगा। मौरवी के राजा साहिब ने, अभिनन्दन-पत्र का उत्तर देते हुए बड़े अभिमान से कहा कि ऋषि दयानन्द जैसे महान् व्यक्ति उनके राज्य में उत्पन्न हुए हैं, इसका उन्हें और उनके राज्य को बड़ा गौरव है। प्रशंसित राजा साहिब ने शताब्दी के उत्सव के लिए बहुत सा सामान अपने राज्य से दिया था और बहुत धन खर्च करके शताब्दी के केम्प में पानी के नल भी लगवा दिए थे।

[स्रोत : “महात्मा नारायण स्वामी जी की आत्मकथा”, संपादक : डॉ.ज्वलन्त कुमार शास्त्री, पृष्ठ 127-129, हितकारी प्रकाशन समिति हिंडौन सिटी का संस्करण 2020, प्रस्तुतकर्ता : भावेश मेरजा]

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