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इतिहास के पन्नों से हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

दलितोद्धार के लिए प्राण न्योछावर करने वाले हुतात्मा वीर मेघराज जी जाट

डॉ विवेक आर्य

क्या आपने किसी ऐसे समाज सुधारक का नाम सुना है जिनका जन्म सवर्ण जाट परिवार में हुआ हो और उन्होंने दलितों के सामाजिक उत्थान के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए हो?

संभवत नहीं।
ऐसे महान आत्मा का नाम था वीर मेघराज जी।
वीर मेघराज जी स्वामी दयानंद की उसी शिष्य परम्परा के अनमोल रत्न थे जो दलितोद्धार जैसे पवित्र कार्य के लिए अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटे। स्वामी दयानंद द्वारा जातिवाद के उनर्मुलन एवं पिछड़े और निर्धन वर्ग के उद्धार के सन्देश को हजारों आर्यों ने सम्पूर्ण देश में घर घर पहुचायाँ। अनेक कष्ट सहते हुए भी, अनेक प्रकार के दुखों को सहते हुए भी इस पवित्र यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देने वाले आर्यों में वीर मेघराज का नाम विशेष स्थान रखता है। आपका जन्म 1881 में इंदौर के नारायणगढ़ में एक स्वर्ण जाट परिवार में हुआ था। बचपन से पौराणिक संस्कारों में पले बढे मेघराज की जिज्ञासु प्रवृति थी। एक वर्ष आपके क्षेत्र में आर्यसमाज के प्रचारक श्री विनायकराव जी का आगमन हुआ। विनायक जी ने अन्धविश्वास, सच्चे ईश्वर की भक्ति, जातिवाद उनर्मुलन आदि का प्रचार किया तो अज्ञानी लोगों ने उन पर ईट पत्थर आदि से वर्षा कर उन्हें घायल करने की कोशिश करी। मेघराज का इस अमानवीय व्यवहार से ह्रदय परिवर्तन हो गया और वे समाजसेवी और तपस्वी विनायक राव को अपने घर ले आए। उनकी सेवा करी, उनसे वार्तालाप किया , शंका समाधान किया। उनसे प्रेरणा पाकर मेघराज जी ने स्वामी दयानंद के ग्रंथों का स्वाध्याय किया और सिद्दांत रूप से अपने को समृद्ध कर आप सच्चे आर्य और वैदिक धर्मी बन गए।

अब मेघराज जी दीन दुखियों, दलितों और अनाथों की सेवा और रक्षा में सदा तत्पर रहने लगे। इस कार्य के लिए आप अपने मित्रों के साथ कोसों दूर दूर तक प्रचार करते थे। सन 1938 में इंदौर के महाराज ने अपने राज्य के सभी दलितों को मंदिर में प्रवेश देने की साहसिक घोषणा कर दी। इस घोषणा से अज्ञानी लोगों में खलबली मच गई। पोंगा पंडितों ने घोषणा कर दी की वे किसी भी दलित को किसी भी मंदिर में प्रवेश नहीं करने देंगे। उनके प्रतिरोध से राजकीय घोषणा कागजों तक सिमित रह गई।

      वीर मेघराज से यह अनर्थ न देखा गया। करुणासागर दयालु दयानंद का शिष्य मेघराज दलितों को समान नागरिक अधिकार दिलवाने के लिए तत्पर हो उठा। उन्होंने दलित बंधुयों में घोषणा कर दी की में आपको आपका अधिकार दिलाने के लिए आगे लगूंगा। आप मेरे साथ मंदिर में प्रवेश करना।  जो कोई मुझे या आपको रोकने की कोशिश करेगा उसे में इंदौर नरेश के पास ले जाऊँगा। वीरवर की हुंकार से अज्ञानी दल में शोर मच गया।  वे मेघराज को कष्ट देने के लिए उनके पीछे लग गए। 

मेघराज किसी कार्य से जंगल में गए तो उन्हें अकेले में घेर लिया और लाठियों से उन पर वार कर उन्हें घायल अचेत अवस्था में छोड़कर भाग गए। जैसे ही यह समाचार उनकी पत्नी और मित्रों को मिला तो वे भागते हुए उनके पास गए। वीर मेघराज को अपनी अवस्था पर तनिक भी दुःख नहीं हुआ। उन्होंने यहीं अंतिम सन्देश दिया की “भगवान इन भूले भटके लोगों की ऑंखें खोलें।यह सुपथगामी हो और आर्य जाति का कल्याण हो। ” इतना कहकर सदा सदा के लिए अपनी ऑंखें मूंदकर अमर हो गए।

उन समय आर्य मुसाफिर आदि पत्रों में उनकी पत्नी का यही सन्देश छपा की अपने पति की मृत्यु के पश्चात भी वे दलितोद्धार जैसे पवित्र कार्य से पीछे नहीं हटेंगी। सरकार ने कुछ लोगों को दंड में जेल भेज दिया। कुछ काल बाद वे आर्यसमाज के साथ मिलकर वीर मेघराज के अधूरे कार्यों में लग गए। जिन्हें मेघराज जीते जी न बदल सके उन्हें उनके बलिदान ने बदल दिया।

वीर मेघराज के बलिदान पर हमे एक ही सन्देश देना चाहते हैं –

आज भी उनकी मुहब्बत कौम के सीने में हैं ,मौत ऐसी हो नसीबों में तो क्या जीने में हैं।
दलित समाज में पैदा होकर दलितों के लिए कार्य करने वाले ज्योतिबा फुले और डॉ अम्बेडकर का नाम तो सभी राजनीतिक पार्टिया लेती है। मगर सवर्ण समाज में पैदा होकर दलितों के लिए संघर्ष करने वाले स्वामी श्रद्धानन्द, लाला लाजपत राय, भक्त फूल सिंह, मास्टर आत्माराम अमृतसरी सरीखे लोग आपको स्वामी दयानंद का शिष्य ही मिलेगा। आर्यसमाज के जातिवाद को मिटाने के संकल्प में भागी बने। तभी यह देश बचेगा।
यह प्रेरणादायक संस्मरण आज के समय में हम सभी को विश्व भातृत्व और आपसी सद्भाव का पावन सन्देश देता है।

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