Categories
इतिहास के पन्नों से भयानक राजनीतिक षडयंत्र

मजहब ही तो सिखाता है आपस में बैर रखना ,अध्याय – 7 (3 ) जब राजपूत योद्धाओं की कर दी गई थी हत्या

राजपूत योद्धाओं की कर दी थी हत्या

अकबर की चित्तौड़ विजय के विषय में अबुल फजल ने लिखा था- ”अकबर के आदेशानुसार प्रथम 8000 राजपूत योद्धाओं को बंदी बना लिया गया, और बाद में उनका वध कर दिया गया।”
‘प्रात:काल से दोपहर तक अन्य 40000 किसानों का भी वध कर दिया गया , जिनमें 3000 बच्चे और वृद्ध थे।”
(अकबरनामा, अबुल फजल, अनुवाद एच. बैबरिज)

बंदी बनाए लाल पहले फिर काट डाले शीश थे, अकबर के यह कारनामे बताओ कैसे उच्च थे?
क्षत्रिय योद्धा हमारे हर प्रकार से आदर्श थे ,
वह आदर्श के आदर्श हैं आदर्श हमारे उत्कर्ष के।।

अकबर के बारे में दिए गए इस विवरण से हमें पता चलता है कि वह अपने विरुद्ध लड़ रहे सैनिकों के प्रति ही कठोर नहीं था बल्कि हिन्दू किसानों और बच्चों के प्रति भी कठोर था। स्पष्ट है कि किसान और बच्चे उसके विरुद्ध कहीं लड़ाई नहीं लड़ रहे थे। ऐसे में उसे अपनी तथाकथित उदारता का परिचय देते हुए किसानों और बच्चों पर किसी प्रकार की कठोरता का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए था।

अकबर के हरम में हिन्दू महिलाओं की स्थिति

अपने हरम को हिन्दू महिलाओं से भरने के लिए ”अकबर ने अनेकों हिन्दू राजकुमारियों के साथ जबरन शादियाँ की थीं, परन्तु कभी भी, किसी मुगल महिला को हिन्दू से शादी नहीं करने दी। केवल अकबर के शासनकाल में 38 राजपूत राजकुमारियाँ शाही खानदान में ब्याही जा चुकी थीं। 12 अकबर को, 17 शाहजादा सलीम को, छः दानियाल को, 2 मुराद को और 1 सलीम के पुत्र खुसरो को।”
अकबर बहुत ही चरित्रहीन व्यक्ति था । उसे भारतीय राजाओं की परम्परा में राजा के आवश्यक गुणों की कसौटी पर यदि कसकर देखा जाए तो उसमें राजा का एक भी गुण नहीं था। हिन्दू महिलाओं के साथ उसने जिस प्रकार के अत्याचार किए और उन्हें अपने हरम में भर -भरकर जिस प्रकार उन्हें केवल ‘खेती’ समझा, उससे उसके चरित्र का वह पक्ष प्रकट होता है जिसके चलते उसने हिन्दू महिलाओं को अपनी वासना और व्यभिचार का जी भरकर शिकार बनाया। उसने गोंडवाना की रानी दुर्गावती को भी अपनी वासना का शिकार बनाना चाहा था।
जिसका उल्लेख आर0सी0 मजूमदार ने ‘दी मुगल एंपायर’ खंड 7 में किया है। वह लिखते हैं :–
”सन् 1564 में अकबर ने अपनी हवस की शान्ति के लिए रानी दुर्गावती पर आक्रमण कर दिया ,किन्तु एक वीरतापूर्ण संघर्ष के बाद अपनी हार निश्चित देखकर रानी ने अपनी ही छाती में छुरा घोंपकर आत्म हत्या कर ली। किन्तु उसकी बहिन और पुत्रवधू को बन्दी बना लिया गया और अकबर ने उसे अपने हरम में ले लिया। उस समय अकबर की उम्र 22 वर्ष और रानी दुर्गावती की 40 वर्ष थी।”
(आर. सी. मजूमदार, दी मुगल ऐम्पायर, खण्ड VII)
वास्तव में अकबर का हिन्दू महिलाओं के प्रति इस प्रकार का दृष्टिकोण उसे अपने मजहब से विरासत में प्राप्त हुआ था। जहाँ पर आज भी यह मान्यता है कि यदि हिन्दू लड़की को गर्भवती किया जाए तो जन्नत में जाने का हक मिल जाता है। इसलिए अकबर के मन मस्तिष्क में भी यही सोच काम कर रही थी। यही कारण था कि वह हिन्दू महिलाओं को अपने हरम में भरने के लिए मीना बाजार लगाया करता था। जहाँ से वह अपनी मनपसंद हिन्दू महिला को अपने सेवकों , सैनिकों और कभी – कभी स्वयं भी उठवाकर मंगवा लिया करता था ।

व्यभिचारी अकबर और हिन्दू समाज

तनिक कल्पना कीजिए कि उस समय बादशाह की इस प्रकार की गतिविधियों को हिन्दू समाज कितना अनुचित और अपमानजनक मानता होगा ? विशेष रूप से तब जबकि नारी जाति का सम्मान करना और किसी दूसरे की बहन बेटी को अपनी बहन बेटी और माता के समान समझना हिन्दू समाज का प्राचीन संस्कार रहा हो। तब किसी ऐसे व्यभिचारी भूखे भेड़िए को ऐसे हिन्दू समाज के लिए सहन करना कितना कठिन हो गया होगा ?
स्पष्ट है कि ऐसी परिस्थितियों में हिन्दू समाज के वीर योद्धा अपनी बहन बेटियों के सम्मान के लिए बार-बार विद्रोह के लिए मचलते रहे होंगे। यही कारण है कि अकबर सहित किसी भी मुगल बादशाह को इन वीर योद्धाओं की जवानी ने कभी चैन की नींद सोने नहीं दिया।
हमें इस विषय में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जब सामान्य हिन्दू परिवार अपनी बहन बेटी को बादशाह की इस प्रकार की वासना की भूख का शिकार होते देखते होंगे या उसके कर्मचारियों के ऐसे अपमानजनक व्यवहार को देखते होंगे तो उनका क्रोध किसी सामान्य मुगल कर्मचारी या मुस्लिम पर फूटता होगा । जैसा कि हम आजादी से पूर्व भारत के लोगों को अंग्रेजों के विरुद्ध भड़कते हुए देखा करते थे। उस परिस्थिति में अकबर या किसी भी मुगल बादशाह के प्रतिनिधि के रूप में उन सामान्य मुस्लिम या कर्मचारियों को अपने सामने खड़े देखकर हिन्दू जन उन पर टूट पड़ते होंगे । इसी से विद्रोह की आग स्थान स्थान पर फैल जाया करती थी।
विद्रोह की इस आग को ही आज के संदर्भ में साम्प्रदायिक दंगे कहना चाहिए। क्योंकि ये विद्रोह शासन की साम्प्रदायिक सोच के विरुद्ध भड़की हुई हिंसा हुआ करते थे। उस समय इन दंगों को सांप्रदायिक शासकों का संरक्षण प्राप्त होता था। जिस कारण तत्कालीन इतिहास लेखक दंगों को अपने राजनीतिक नायकों की इच्छा के अनुरूप लिख दिया करते थे । घटनाओं के पीछे के उस सच को कभी नहीं लिखा जाता था जो हिन्दुओं को मुस्लिम शासकों के विरुद्ध बार-बार विद्रोह करने के लिए प्रेरित करता था।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत
एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय इतिहास पुनर्लेखन समिति

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
meritking giriş
betpark güncel giriş
betgaranti güncel giriş
kolaybet güncel giriş
betnano giriş
betpark
betpark
betpark
betpark
betpark
betpark
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
betpark
betpark
supertotobet
supertotobet
betpark
betpark
supertotobet
bettilt giriş
supertotobet
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vaycasino
vaycasino
hititbet giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
supertotobet
supertotobet
vaycasino
vaycasino
bettilt giriş
bettilt giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
supertotobet
supertotobet
jojobet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
roketbet giriş
vaycasino
vaycasino
supertotobet
supertotobet
celtabet giriş
celtabet giriş
prensbet giriş
prensbet giriş
prensbet giriş
vipslot giriş
vipslot giriş