भारत में वन वासियों से ही जैव विविधता सुरक्षित है

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आज अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस है | जो वर्ष 2013 से प्रत्येक वर्ष 3 मार्च को मनाया जा रहा है| पृथ्वी पर इंसानों की आबादी 760 करोड़ है जो पृथ्वी पर पाए जाने वाले पूरे जीवो का महज 0.01 प्रतिशत है लेकिन दुखद आश्चर्य यह है इंसानों ने पूरी पृथ्वी के 83 फ़ीसदी जंगली जानवरों (wild mammals )और 50 प्रतिशत वृक्षों की प्रजातियों को पूरी तरह नष्ट कर दिया| यह सब कितना विस्मयकारी है इंसान जीवो के अस्तित्व को हानि पहुंचा कर तमाम दिवस मनाता है|

जैव विविधता को खतरा आधुनिक सभ्य सुसंस्कृत मानी जाने वाली नगरीय सभ्यता नगरवासी इंसानों से ही है, वनवासियों से जंगल में रहने वाले जानवरों को कोई खतरा ना हुआ है ना कभी होगा| वनवासी सहजीवन सहअस्तित्व की अवधारणा को बहुत गहराई से समझते हैं|

इसका आसान उदाहरण है भारत के दक्षिण भारत मैं कर्नाटक के बेलगिरी रंगना पहाड़ियों पर रहने वाली सोलीगा जनजाति | यह जनजाति बाघों की पूजा करती है बाघों को हुलीवरप्पा देवता का संबोधन इन्होंने दिया है| भारत में वर्ष 2014 में 14 00 के लगभग बाघ थे जो वर्ष 2019 में 3000 के लगभग हो गए हैं… नेशनल टाइगर पापुलेशन ऐस्टीमेशन कार्यक्रम के तहत बाघों की वार्षिक दर वृद्धि सर्वाधिक इसी जनजाति से रक्षित क्षेत्र में पाई गई| सोलिगा जनजाति ने लंबी कानूनी लड़ाई बेलगिरी रंगना पहाड़ी वन्य क्षेत्र में बेदखल होने से बचने के लिए लड़ी है| दरअसल 1973 में सेव टाइगर कार्यक्रम के तहत इस पूरे क्षेत्र को वन्य जीव अभ्यारण घोषित कर दिया गया… वर्ष 2011 में कर्नाटक सरकार ने इसे टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया… 500 वर्ग किलोमीटर में फैला यह जंगली पहाड़ी जंगल देश के पश्चिमी व पूर्वी घाट को जोड़ता है… लाखों वर्षों से इस क्षेत्र में रहने वाली यह जनजाति जबरन इस क्षेत्र से बाहर कर दी गई…. इस जनजाति को जन्मजात वनस्पति शास्त्री भी कहा जाता है…. ऐसा इसलिए यह केवल बाघों को ही नहीं पूजती जंगली जड़ी बूटियों औषधीय वृक्ष वनस्पतियों की भी माहिर जानकार है… यह हरे भरे वृक्षों को नहीं काटती वन उपज शहद जंगली बेर आदि पर ही आजीविका उपार्जन करती है | इनका यह विश्वास है इस जनजाति की उत्पत्ति बांस के वृक्षों से हुई है| आपको आश्चर्य होगा यह जनजाति इतनी प्राचीन है ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी इसी जनजाति के वंशज हैं अर्थात यहीं से इस जनजाति के पूर्वज ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप में गए आप तमाम हुमन जेनेटिक्स शोध में यह सिद्ध हो गया है| कुछ इतिहासकार बुद्धिजीवी मानते हैं यह रामायण कालीन वानर जनजाति की तरह ही समृद्ध नगरीय दक्षिण भारतीय मानव सभ्यता थी |

इकोलॉजिस्ट वेडलाइफ एक्टिविस्ट बड़े-बड़े वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन संस्थान जो कार्य लाखों करोड़ों रुपए खर्च कर नहीं कर सकते यह जनजातियां निशुल्क करती है जीवो व वनस्पति जगत के संरक्षण के लिए| भारत सहित दुनिया में जैव विविधता के संरक्षण में जनजातियों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है या कमतर नहीं आंका जा सकता है|

आपको हम अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस की शुभकामनाएं तो नहीं दे सकते क्योंकि जैव विविधता पर खतरा मंडरा रहा है फिर भी इस दिवस पर आप चिंता व जैव विविधता को बचाने के लिए गहन गंभीर विमर्श जरूर कर सकते हैं…. आप ऐसे ही किसी सकारात्मक घटनाक्रम को साझा कर सकते हैं |

आर्य सागर खारी✍✍✍

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