विपक्ष में केवल कांग्रेस ही दिशाहीन नहीं है, सभी विपक्षी पार्टियों की स्थिति एक जैसी है

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प्रदीप सिंह

भारतीय राजनीति एक विचित्र दौर से गुजर रही है। सत्तारूढ़ दल और विपक्ष के बीच सार्थक संवाद की गुंजाइश ही नहीं रह गई है। असल में संवाद के लिए जरूरी है कि बात तर्कों और तथ्यों के आधार पर हो। तर्क और तथ्य के बिना बनाई गई धारणा के आधार पर अव्वल तो बहस मुश्किल है और हो भी जाए बेनतीजा ही रहती है। यही वजह है कि किसानों और सरकार के बीच बातचीत कोई गति नहीं ले पाई । यह काफी नहीं था कि अब कोरोना वैक्सीन को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। तरीका वही कि जिनको विषय की जानकारी नहीं वही विशेषज्ञ बने घूम रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि देश में कोई सत्तारूढ़ दल पहली बार इतना ताकतवर हुआ है। कांग्र्रेस का लंबे समय तक देश पर एकछत्र राज था। केरल में पहली वामपंथी सरकार बनी तो बहुमत होते हुए भी उसे बर्खास्त कर दिया गया। संविधान के अनुच्छेद 356 का जितना दुरुपयोग कांग्र्रेस ने किया उतना अन्य दलों की सभी सरकारें मिलकर भी नहीं कर सकीं। कांग्रेस की विपक्ष के प्रति सदाशयता की स्थिति यह रही कि आजादी के तीन दशक बाद तक उसने विपक्षी दल को नेता-प्रतिपक्ष का पद ही नहीं दिया। 1977 में पहली बार देश को लोकसभा में विपक्ष का नेता मिला। वह भी पहली गैर-कांग्र्रेसी सरकार में। हालांकि जब 2014 में कांग्र्रेस के पास नेता-प्रतिपक्ष के लिए पर्याप्त संख्या नहीं थी तो उसके लिए अचानक सहानुभूति उपजने लगी। कहा जाने लगा कि भाजपा में जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति संवेदना नहीं है। हालांकि भाजपा ने कांग्र्रेस से दरियादिली ही दिखाई।

भाजपा के लोकसभा में पूर्ण बहुमत पाते ही राजनीति ही नहीं देशनीति के सारे नियम बदल गए। आजादी के बाद से सत्तारूढ़ दल और विपक्ष में एक अघोषित समझौता था कि राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति पर देश एक स्वर में बोलेगा। ऐसा नहीं है कि तब विपक्षी दल इन मुद्दों पर सरकार की आलोचना या विरोध नहीं करते थे। बस उन्हें अपनी लक्ष्मण रेखा का अहसास था। लक्ष्मण रेखा यह थी कि विपक्ष इन मुद्दों पर ऐसी कोई बात नहीं कहेगा जिससे देश के विरोधी उसका लाभ उठा सकें। संकट के समय पूरा देश एक स्वर में बोलता था। अब ऐसा नहीं है। अब देश के दुश्मनों और कुछ विपक्षी दलों की भाषा एक ही होती है। पिछले छह सात वर्षों में ही यह बदलाव आया है। अफसोस की बात है कि सबसे ज्यादा बदलाव देश की सबसे पुरानी और सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी कांग्र्रेस में आया है। उसने अपनी पुरानी स्लेट साफ कर दी है। कांग्रेस में नई इबारत वही लिख रहे हैं जिन्हें न तो राजनीति की समझ है और न ही राष्ट्रीय मुद्दों की गंभीरता का अहसास। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सही लिखा है कि उनके राष्ट्रपति भवन जाने के बाद कांग्र्रेस को राजनीतिक दिशा देने वाला कोई नहीं रह गया। दस साल प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह कभी नौकरशाह वाली मानसिकता से बाहर ही नहीं निकल पाए। देश उनकी रीढ़ ख्रोजता रहा, परंतु वह मिली नहीं। फिलहाल कांग्र्रेस ट्विटर की पार्टी बनकर गई है।

विपक्ष में केवल कांग्र्रेस ही दिशाहीन नहीं है। उसमें अखिलेश यादव जैसे नेता भी हैं। उन्हें कोरोना वैक्सीन में देश के वैज्ञानिकों की मेहनत नहीं, बल्कि भाजपा का अक्स दिखता है। यह तो सरकार का विरोध भी नहीं है। इसे दिमागी दिवालियेपन का सुबूत ही माना जा सकता है। कांग्रेस में भी शशि थरूर, आनंद शर्मा और जयराम रमेश जैसे नेताओं के वैक्सीन से जुड़े बयानों से यही लगता है कि उन्हें इसे बनाने वाले वैज्ञानिकों से ज्यादा जानकारी है। भारत ने दो वैक्सीन कोविशील्ड और कोवैक्सीन बनाने में सफलता हासिल की है। देश के लिए यह गर्व की बात है। उसी को लेकर विपक्ष दुष्प्रचार में लग गया है जबकि इसे बनाने वाली भारतीय कंपनी के वैज्ञानिक, आसीएमआर के निदेशक बलराम भार्गव, अखिल भारतीय आयुॢवज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन जैसे दिग्गजों को कोवैक्सीन की सुरक्षा और प्रभाव पर कोई संदेह नहीं है। इतना ही नहीं कोरोना के जिस नए रूप से इन दिनों यूरोप सहमा हुआ है, उस पर भी भारतीय वैक्सीन प्रभावी सिद्ध होगी।

दरअसल अंध विरोध करने वाले भूल जाते हैं कि भारत दुनिया का इकलौता देश है जिसे वैक्सीन बनाने और लगाने का इतना वृहद अनुभव है। ऐसे में दवा और शोध के बारे में विज्ञानियों की बात पर भरोसा किया जाए या नेताओं की बात पर। विज्ञानियों को वैक्सीन के सुरक्षित और प्रभावी होने का यकीन है, लेकिन विपक्षी नेताओं को नहीं। उन्हें यह भी अहसास नहीं है कि इस उपलब्धि पर सवाल उठाकर वे सरकार या प्रधानमंत्री का नहीं, बल्कि विज्ञानियों का ही अपमान कर रहे हैं। दरअसल इसकी आड़ में उनके निशाने पर एक ही व्यक्ति है-नरेंद्र मोदी। मोदी के राज में कुछ अच्छा हो तो विपक्ष की समस्या बढ़ जाती है। खराब हो तो खुशी की बात है। वह देश के लिए अच्छी है या नहीं इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं। यही कारण है कि पिछले छह वर्षों से अदाणी और अंबानी को देश का पाकिस्तान और चीन से बड़ा शत्रु साबित करने का कुत्सित प्रयास जारी है। देश का गरीब आदमी जानता और मानता है कि मोदी सरकार उनके हित में काम कर रही है, मगर विपक्षी दलों का एक समूह देश को बरगलाने में जुटा है कि मोदी सरकार उद्योगपतियों की सरकार है। अन्यथा क्या वजह थी कि जो आंदोलन किसानों के नाम पर किया जा रहा है उसकी आड़ में रिलायंस जियो के टावरों को नुकसान पहुंचाया जाता जिसका खेती-किसानी से कोई लेनादेना ही नहीं।

असल में विपक्षी दलों की पूरी आस इसी बात पर टिकी है कि किसान संगठनों और सरकार के बीच कोई समझौता न हो पाए। विपक्ष की हालत यह हो गई है कि समस्या के समाधान में उसकी रुचि नहीं रह गई है। वह समाधान में समस्या खोजता है। उसे समस्या में ही अपना राजनीतिक भविष्य नजर आता है। इसीलिए किसानों के मसले का हल नहीं निकल रहा है और न ही निकलने के आसार दिखते हैं। बात सरकार तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस आधार पर सही गलत ठहराया जाता है कि वह सरकार के विरोध में जाता है या पक्ष में।

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