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विश्वगुरू के रूप में भारत

भारत के महान हिंदू सम्राटों के विजय अभियान 1,2,3,4

भारत के महान हिंदू सम्राटों के विजय अभियान:1
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लेखिका :- कुसुमलता केडिया

भारत के प्रतापी सम्राट सदा से ही विजई अभियान चलाते रहे हैं ।
वेदों में भी ऐसे अभियानों का वर्णन है।
यौवनाश्व के पुत्र मांधाता चक्रवर्ती सम्राट थे और उनका शासन संपूर्ण विश्व में था, ऐसा सभी पुराणों में और प्राचीन भारत इतिहास ग्रंथों में वर्णनहै।
महाकवि कालिदास ने अपने महान काव्य रघुवंशम में सम्राट रघु की विजय यात्रा का विस्तार से वर्णन किया है।
यदि महाभारत युद्ध के बाद के ही विजय अभियानों का उल्लेख करें तो ईसा पूर्व अट्ठारहवी अथवा ईसा पूर्व चौदहवीं शताब्दी में महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य हुए और उनके ही वंश में सम्राट अशोक हुए जिनका शासन यवन प्रांत की सीमा तक था और वर्तमान अफगानिस्तान के गांधार और जलालाबाद में अशोक के शिलालेख मिलेहैं। हिमालय से चेन्नई तक और बंगाल से यवन सीमा तक अशोक का राज्य था। यहां यह भी स्मरण कर लें कि अशोक बौद्ध थे, इसका कहीं कोई साक्ष्य भारतीय स्रोतों में नहीं है ।अशोक के अभिलेखों में भी धर्म या धम्म और सद्धम्म की ही महिमा वर्णित है कहीं भी वहां बुद्ध या बौद्ध धर्म नामक शब्द का प्रयोग नहींहै।
गुप्त वंश ने ईसा पूर्व चौथी से ईसा की छठवीं शताब्दी तक अर्थात 1000 वर्षों तक शासन किया।

अलएकजेंदर वस्तुतः चंद्रगुप्त द्वितीय के समय में ही भारत की ओर बढ़ रहा था और उनकी ही प्रतापी सेनाओं के भय से उस की सेना ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया था
इसी गुप्त वंश में गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त हुए जिन्होंने दूर-दूर तक विजय अभियान चलाया ।
इसमें आगे चलकर चंद्रगुप्त विक्रमादित्य हुए और कुमारगुप्त प्रथम तथा स्कंद गुप्त हुए जिन्होंने भारतीय क्षत्रियों की ही एक अत्यंत प्रतापी शाखा हूणों को हराया था।
रामायण और महाभारत के साथियों से तथा राजस्थान में सुरक्षित क्षत्रियों की वंशावली से प्रमाणित है कि उन भारतीय क्षत्रिय थे। उनका शासन संपूर्ण यूरोप और अरब क्षेत्र तक था और उनसे शताब्दियों तक विश्व थरराता रहता था।
स्कंद गुप्त की महिमा उस प्रतापी हूण सेना को हराने में है।(क्रमशः2)

महान हिन्दू सम्राटों के विजय अभियान:2

भगवान राम के समय से उनके वंश में हुए सभी प्रतापी सम्राटों का वर्णन कोसल वंशावली में सुरक्षित है।
कुश का अभिषेक कुशावती में हुआ।बाद में उन्होंने अयोध्या को ही पुनः संवारा और राजधानी बनाया।कुशावती ब्राह्मणों को दे दी जिन्होंने12 वी शताब्दी ईस्वी के आरंभ तक वहां राज्य किया।
कुश ने कई विवाह किए जिनसे अनेक प्रतापी सम्राट हुए।इनमें निषधनभ, पुण्डरीक, क्षेमधन्वा, देवानीक और कौशल्य प्रसिद्ध हैं।
लव की राजधानी श्रावस्ती थी।लव के वंश में वृहदबल ने भारत युद्ध मे भाग लिया था और अभिमन्यु द्वारा वे वीरगति को प्राप्त हुए।पर उनके वंश ने बाद में दीर्घकाल तक राज्य किया।
मगध राज जरासंध का पुत्र सहदेव भारत युद्ध में मारा गया था। उसके पश्चात भी उस वंश में अनेक प्रतापी सम्राट हुए जिनका विस्तार से उल्लेख पुराणों में है।
पांडवों के काल तक हस्तिनापुर ही भारतवर्ष की राजधानी थी। विष्णु पुराण के अनुसार बाद में गंगा नदी ने वह नगर बहा दिया तब सम्राट निचक्षु ने कौशांबी को अपनी राजधानी बनाया जिनके महाबली और महा पराक्रमी आठ पुत्रों का वर्णन विष्णु पुराण में है।
कोसल के सम्राट प्रसेनजित का वर्णन व्हेन त्सांग ने किया है।ये बाद में भगवान बुद्ध के भक्त हो गए।बुद्ध भगवान ने उन्हें उपदेश दिया था।
मगध में प्रद्योत वंश और शिशुनाग वंश में अनेक प्रतापी सम्राट हुए जिनके वर्णन पुराणों में हैं ।बाद में वहां बिम्बिसार वंश के शासन काल में बुद्ध भगवान का प्रभाव फैला।
सम्राट कनिष्क एक अन्य महान प्रतापी सम्राट थे जो ईसवी सन के ठीक पहले दक्षिण भारत से लेकर गांधार और चीनी तुर्किस्तान तक शासन कर रहे थे ।
वह सनातन धर्मके निष्ठावान उपासक थे और इसीलिए शैव और वैष्णव दोनों ही पंथों के महान संरक्षक थे और इसी कारण बौद्ध धर्म का भी भरपूर सम्मान करते थे और बौद्धों की चौथी संगीति आयोजित की थी
उनके सिक्कों पर भगवान शिव,, भगवान विष्णु और भगवान बुद्ध तथा यवन देवी देवताओं के भी चित्र मिलते हैं ।
कनिष्क के ही वंश में हुविष्कऔर वासुदेव ,यह दो अत्यंत प्रतापी शासक हुए जो भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों के भक्त थे।क्योंकि सनातन धर्म के उपासक थे।
ईस्वी सन के आरम्भ से शताब्दियों पहले से महान सातवाहन साम्राज्य था ।ये सनातन धर्म के निष्ठावान अनुयाई थे।
सातवाहनों ने बौद्धों और जैनों के भी मठ मंदिर और बिहार को भरपूर दान दिया और उनके यहां यवन कन्याएं ब्याही गई थी।(क्रमश:3)

महान हिन्दू सम्राटों के विजय अभियान:3
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-महान मौर्य वंश में चंद्रगुप्तसे अशोक तक की ख्याति तो विश्व में है ही।
महान मालव साम्राज्य में सम्राट विक्रमादित्य ने रूम के सम्राट को भी हराया था इसके अभिलेख स्वयं उज्जयिनी में विद्यमान है।
पुष्यमित्र शुंग का साम्राज्य उत्तर में चीन तक फैला था और अनुमान यह है कि जिसे चीन में शुंग वंश का शासन कहते हैं वह वस्तुतः इसी वंश का शासन था।
मालव वंश में एक अत्यंत प्रतापी सम्राट यशोधर्मा हुए जिन्होंने हूण सम्राट मिहिरगुल को पराजित किया। मध्यप्रदेश के मंदसौर में यशो धर्मा के दो कीर्ति स्तंभ हैं जिनके अनुसार उन्होंने ब्रह्मपुत्र से समुद्र तक और हिमालय से महेंद्र गिरी पर्वत तक राज्य किया ।वह सम्राट विक्रमादित्य के ही वंशज थे।
चोलों ने ईसा पूर्व से लेकर 13 वीं शताब्दी ईस्वी तक 1400 वर्षों तक दक्षिण भारत से श्रीलंका तक शासन किया। उनकी राजधानी तंजौर थी
इनमें चोल सम्राट राजेंद्र प्रथम के पास अत्यंत शक्तिशाली नौसेना थी और उन्होंने दूर-दूर तक अपना साम्राज्य फैलाया। सम्राट अशोक के शिलालेख में भी चोलोंको एक स्वतंत्र राज्य कहा गया है ।
चोलोंकी शक्तिशाली नौसेना का अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है ।
14 अत्यंत प्रतापी और प्रसिद्ध सम्राट चोल वंश में हुए।
इसी प्रकार चालुक्य लोग जो अयोध्या के चंद्रवंशी नरेशों के वंशज हैं ,,उन्होंने वातापी में अपनी राजधानी बनाई जिसे इन दिनों बादामी कहा जाता है।
इसी में पुलकेशिन प्रथम विश्व विख्यात प्रतापी सम्राट हुए जिन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया था ।
महाकवि बिल्हन ने पुलकेशिन प्रथम का उल्लेख किया है और महाकवि विद्यापति की रचनाओं में भी उनका उल्लेख मिलता है। इनके कुल देवता भगवान विष्णु और इष्ट देवता स्वामी कार्तिकेय रहे हैं ।
चालुक्य वंश में 21 प्रतापी राजा हुए और इन्होंने चौदहवीं शताब्दी ईस्वी के आरंभ तक राज्य किया ।बंगाल,म्यांमार और अंडमान निकोबार तक इनका शासन फैला था। बाद में चाललुक्य सम्राटों से संबंध स्थापित किया और फिर चोल और चालूक्य मिलकर दूर-दूर तक फैले।
(…..क्रमशः4)
✍🏻कुसुमलता केडिया

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