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इतिहास के पन्नों से

चक्रवर्ती सम्राट कनिष्क गुर्जर वंश से थे – भाग 1

कुषाण (कसाना) राजवंश 25 ई. से 380 ई. तक यह न केवल गुर्जर जाति का बल्कि भारतीय इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण राजवंश है। इस वंश के कई सम्राट हुए हैं लेकिन यदि अकेले कनिष्क सम्राट की ही बात करें तो उनका साम्राज्य दक्षिणी चीन और रूस से लेकर वर्तमान उत्तरी भारत तक पर उसका अखंड राज्य था। उसकी राजधानी पेशावर थी उसके कई प्रांत पाल थे जिनमें मथुरा एक महत्वपूर्ण था उसके काल के सिक्के, अभिलेख, शिलालेख पूरे मध्य एशिया और भारत में मिलते हैं। उसके समय में गणित, विज्ञान और चिकित्सा क्षेत्र में बहुत प्रगति हुई। इस कुषाण वंश में सम्राट कुजुल कदाफिस, सम्राट विम कदाफिस, कनिष्क, क्षत्रप, वसिष्क, सम्राट हुविष्क, वासुदेव प्रथम का नाम उल्लेखनीय हैं। कुषाण वंश से गुर्जरों के अनेक क्षत्रपों के नाम पर अनेक वंश और गौत्र विकसित हुए।

पंडित बालकृष्ण गौड़ लिखते हैं –

यारकन्द, तिब्बत ब्रह्मा स्याम, समस्त थे भारत भूमि धाम।
कनिष्क ने राज्य किया इक छत्र, बढ़ाकर इक्ष्वाकु का नाम।।

– राजपाल सिंह कसाना, अखिल भारतीय गुर्जर महासभा इतिहास के आईने में, पृष्ठ संख्या 4

कस्सी आर्यों से प्रादुर्भूत गुर्जर जाति का कुषाण वंश अपने उत्कर्ष काल प्रथम शती में मध्य एशिया से लेकर समस्त उत्तरी भारत तक के विशाल भू भाग का अधिपति बन गया था। कुषाणों की नागर आदि शाखाएं राजनैतिक शक्ति बन चुकी थी। रूसी इतिहासकारों ने भी इस तथ्य को बेहिचक स्वीकार किया है कि दक्षिणी रूस से लेकर उत्तरी भारत तक का समस्त क्षेत्र कुषाणों के आधीन था और मौर्य वंश के भग्नावशेषों पर कुषाण गुर्जरों के साम्राज्य की आधारशिला स्थापित हुई थी। इस वीर कर्मा जाति ने प्रथम शती से लेकर ग्यारहवीं शती तक भारतीय धर्म तथा संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन किया।
– डॉ दयाराम वर्मा, परीक्षितगढ़ का गुर्जर राजवंश पुस्तक के प्राक्कथन में

– कुषाण गुर्जर की शाखा है।
Bombay Gazetter Vol. IX Part I Page 491

कसाने अपने कुशन साम्राज्य काल में भारत और भारत के बाहर सुदूर मध्य एशिया के उपनिवेशों तक मे पाए जाते हैं। पेशावर के आसपास, कश्मीर, पंजाब, देहली, राजपुताना, मालवा, मध्य भारत, मध्यप्रदेश बरार तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसे हुए हैं। इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान महामहोपाध्याय राय बहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा एवं अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों द्वारा तथा एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका दिन यह पता चलता है कि यू-ची अथवा कुषाण पूर्णतया आर्य एवं आर्य सभ्यता से ओतप्रोत थे। उनकी राजनैतिक परिस्थिति और सामाजिक दृष्टिकोण से भारतीय आर्य जाति के राजन्य (क्षत्रिय) गुर्जर समूह में मिलना स्वाभाविक था, जिनका स्त्रोत यू – ची – कुशन पवित्र चेची गौत्र तथा वंश के रूप में गुर्जरों में विद्यमान हैं। इन आर्य कुशन यूची लोगों ने ऋषिक तुषार नाम से भी इतिहास में प्रसिद्धि पाई है। गुर्जरों के वर्तमान कुशन कसाने वंश से भी यही स्पष्ट होता हैं।
– यतीन्द्रकुमार वर्मा, गुर्जर इतिहास, पृष्ठ संख्य 166

गुर्जरों का कसाना नामक गौत्र महान कुषान सम्राटों का वंश है क्योंकि कसाना या कुशान गौत्र गुर्जरों के अतिरिक्त भारत में अन्य किसी जाति में नहीं है।
– रतनलाल वर्मा, भारतीय संस्कृति के रक्षक, पृष्ठ संख्या 13

कनिष्क केवल कुषाण वंश का ही नहीं अपितु गुर्जर जाति का सर्वश्रेष्ठ सम्राट हुआ है। वह महान साम्राज्य का स्वामी था। कुषाण वंश का वैभव उसके समय में चर्मोत्कर्ष पर था। फलतः यह समय गुर्जरों के महान अभियानों का समय था। गर्व के साथ कहा जा सकता है कि कनिष्क गुर्जर जाति का महान सम्राट था। उसे महिमामण्डित करने वाला अद्वितीय सम्राट था।
– डॉ दयाराम वर्मा, परीक्षितगढ़ का गुर्जर राजवंश, पृष्ठ संख्या 39

कुषाण वंश गुर्जर जाति का ज्ञात प्राचीनतम वंश है जो अब तक कुषाण कसाना गोत्र के रूप में सुरक्षित विख्यात है। अनेक इतिहासविदों ने इस वंश को विदेशी तथा आर्येत्तर सिद्ध करने का प्रयास किया है किन्तु अब भारत तथा रूस के पुरात्वविदों तथा इतिहासकारों ने सिद्ध कर दिया है कि शक आर्य एवं उसका प्रमुख वंश कुषाण भी आर्यों के क्षत्रिय वर्ण से संबंधित है। अति प्राचीन काल में आर्यों के विस्तार एवं प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने की दृष्टि से वैवस्वत मनु के वंशज शक द्वीप गए थे। इसी कारण वे शक कहलाए। सम्पूर्ण मध्य एशिया एवं सोवियत रूस के दक्षिणी प्रदेश शक आर्यों की विचरण भूमि रहे हैं। शकों का उल्लेख प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में मिलता है। रूस तथा यूरोपीय पुरात्वविदों को प्राचीन टीलों तथा नगरों के उत्खनन से जो तथ्य प्राप्त हुए हैं तथा राहुल सांस्कृत्यायन एवं वेद प्रताप वैदिक प्रभृति भारतीय इतिहासकारों के शोध कार्यों से यह स्पष्ट हो गया है कि सम्पूर्ण मध्य एशिया ईरान आदि शक आर्यों की विचरण भूमि रहे हैं। इसी कारण वहां पुरातत्व वेत्ताओं को भारतीय धर्म एवं संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए है। शक आर्यों के क्षत्रिय वर्ण के गुसुर आदि 18 वंश थे। गुसरों से संबंधित यू-ची (चेची) थे जिनसे कुषाण यानी कसाना गोत्र विकसित हुआ है।

कुषाणों के अभिलेखों में गुषेण व गुषन आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है जिससे इस तथ्य की पुष्टि होती है। जनरल कनिंघम ने कुषाणों को गुर्जर बताया है। बम्बई गजेटियर में उन्हें गुर्जर लिखा है। कुषाण वंश न केवल गुर्जर जाति का अपितु अपने समय के संसार के चार महान साम्राज्यों में से एक था। अतः यह वंश गुर्जर जाति के वैभव एवं शौर्य को व्यंजित करने वाला वंश है। इस वंश के सम्राटों ने भारतीय धर्म तथा संस्कृति की पताका को विदेशों में भी पहराया था। यही कारण है कि चीन तथा तिब्बत में आज तक भी बौद्ध धर्म की प्रधानता है। गांधार कला तथा मथुरा कला की शैलियां कुषाण साम्राज्य की देन है जिन पर आज सभी जातियों को गर्व है। शक संवत का चलाने वाला कुषाण वंशीय सम्राट कनिष्क था। जब गुप्त साम्राज्य का उदय हुआ तो कुषाण साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया और वे राजस्थान व गुजरात के प्रदेशों में छोटी छोटी रियासतों के स्वामी बने रहे। इस काल मे गुर्जरों के गोत्रों का तेजी से विकास हुआ। गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात पुनः गुर्जर शक्ति का विकास हुआ तथा हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात प्रतिहार, पंवार, चौहान, चौलुक्य आदि गुर्जर राजवंशों का उदय हुआ।
– डॉ दयाराम वर्मा, परीक्षितगढ़ का गुर्जर राजवंश, पृष्ठ संख्या 47 व 48

भट्टारक मैत्रीक वंश के गुर्जरों ने (कुषाण गुर्जरों की शाखा का या उनका वंशज था) बल्लभी को अपनी राजधानी बनाया इसी प्रकार दछा चावड़ा नामक राजा ने अपनी राजधानी भडौच तथा पुलकेशी गुर्जर सम्राट ने अपनी राजधानी बादामी (बम्बई के निकट) को बनाया।
– डॉ वेदपाल सिंह, गुर्जर और उनका इतिहास में योगदान, पृष्ठ संख्या 130

गुर्जर राजाओं के शासन काल में साहित्य की अत्यंत मात्रा में वृद्धि हुई। सर्वप्रथम हम रघुवंशी कुषाण साम्राज्य का निरूपण करेंगे। जिसकी राज्य अवधि 25 ई से 425 ई तक थी। यह बहुत बड़ा साम्राज्य था। जिसकी राजधानी पेशावर तथा मथुरा थी। इस शासन काल में समय समय पर अनेक राजाओं ने विद्या का प्रचुर मात्रा में प्रचार किया। अनेक विद्वान तथा कवि हुए जिन्होंने साहित्य की नाना विधाओं का प्रणय किया।
– डॉ हरिसिंह शास्त्री, गुर्जर और उनका इतिहास में योगदान, पृष्ठ संख्या 166, 167

कुषाण गुर्जर वंशीय थे।
– डॉ जय सिंह, गुर्जर और उनका इतिहास में योगदान, पृष्ठ संख्या 209 से 220

कुषाण वंश जिसमें अनेक प्रतापी सम्राट हुए सूर्यवंशी गुर्जरों का ही एक वंश था व है। कुछ इतिहासकारों की यह धारणा कि कुषाण विदेशी थे पूर्णतः गलत है। बल्कि भारतीय क्षेत्र से ही मध्य एशिया आदि की ओर गए थे तथा बाद में हूणों के आक्रमणों के कारण उन्हें वापिस भारतीय प्रदेश की ओर लौटना पड़ा। कई लोग उनको घुमन्तु व असभ्य कहने का दुस्साहस भी करते हैं जो सर्वथा गलत है। यह कैसे सम्भव है कि जिस वंश के शासन में सोने चांदी के सिक्के प्रचलित रहे हो, जिसके शासन में विद्या, कला कौशल व व्यापार की सर्वाधिक उन्नति हुई हो, जिसके पास सुदृढ व अनुशासित सेना हो तथा जिसका विशाल राज्य बंगाल से कैस्पियन सागर तथा सुदूर मध्य एशिया से लेकर गुजरात व सुदूर दक्षिण तक फैला हो, उसके शासक असभ्य व घुमन्तु कैसे हो सकते हैं?
– डॉ जय सिंह, गुर्जर और उनका इतिहास में योगदान, पृष्ठ संख्या 219

कुषाण गुर्जर है।
– जी. सरवर चौहान, Origin, Rise And Growth Of Gujjars A Brief Account Of History, पृष्ठ संख्या 43 से 63

कुश वंशी कसाने कनिष्क को अपना पूर्वज कहते हैं और अपने को कुशन भी कहते हैं। कुशवंशी सूर्यवंश के क्षत्रियों की संतान किसी समय मध्य एशिया और चीन तक पहुंच गई थी। मध्य एशिया में हुलमन्द पर गुर्जिस्तान, गूजर खासी की प्रसिद्धि उन्हीं के नाम पर है और वे यहाँ पाए जाते हैं। चीन मिश्र ईरान तिब्बत गिलगित मध्य एशिया की कैस्पियन समुद्र की जातियों में गुजर पाए जाते हैं।
– यतीन्द्रकुमार वर्मा, गुर्जर इतिहास, पृष्ठ संख्या 87 (साभार – गुर्जरों का विभिन्न क्षेत्रों में प्रदान)

ईरान के पूर्व का क्षेत्र (वर्तमान अफगानिस्तान) ओल्ड टेस्टामैन्ट में कुश के नाम से लिखा है। मध्य एशिया के लोग इसे हिन्दू कुश कहते थे। जब कनिष्क गद्दी पर बैठा तो उसे कुषाण कहा गया। जनरल कनिंघम ने गुर्जर तथा कुषाणों को एक ही बताया है। कुषाण गुर्जर जाति का ही एक गोत्र है जो रामचन्द्र के छोटे पुत्र कुश से अपनी उत्पत्ति मानता। कुश वंशी कुषाण, कुशान या कसाना साम्राज्य का संस्थापक कुजुल था जिसने 25 ई. में सम्राट पद धारण कर शासन किया था। चीनी लेखकों के अनुसार उसकी मृत्यु 50 ई में 80 वर्ष की आयु में हुई थी। सम्राट कुजुल देव का साम्राज्य वर्तमान अफगानिस्तान, कश्मीर, पंजाब तथा मध्य एशिया तक फैला हुआ था। सम्राट कुजुल देव की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र विम कुशान साम्राज्य का शासक बना। सम्राट विम के बाद सम्राट कनिष्क ने 78 ई. से 120 ई. तक शासन किया उसने कुशान साम्राज्य का विस्तार किया।
– प्रोफेसर सत्येन्द्र पाल आर्य, एशिया महाद्वीप में गुर्जर, पृष्ठ संख्या 5

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