जीवात्मा के पुनर्जन्म का सिद्धांत सत्य नित्य होने सहित विश्वसनीय है

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ओ३म्

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मनुष्य में भूलने की प्रवृत्ति व स्वभाव होता है। वह अपने जीवन में अनेक बातों को कुछ ही समय में भूल जाता है। हमने कल, परसों व उससे पहले किस दिन क्या क्या व कब कब भोजन किया, किस रंग व कौन से वस्त्र पहने थे, किससे कब कब मिले थे, कहां कहां गये थे, यह पूरी तरह से स्मरण नहीं रहता। हम जो बातें करते हैं, उसे करने के बाद दो चार मिनट के अपने भाषण व बातचीत को यथावत् दोहरा नहीं सकते। इससे सिद्ध होता है कि हम बहुत सी बातों को साथ साथ ही भूलते जाते हैं। कुछ बातें ऐसी होती हैं कि जो हमें याद रहती हैं परन्तु हमें सभी बातें याद नहीं रहती, यह भी पूरी तरह से सत्य है। हमें अपनी स्मृति के अनुसार यह ज्ञात नहीं होता कि हमारा इस जन्म से पूर्व कोई जन्म था या नहीं? इसका कारण हमें पूर्वजन्म की विस्मृति होना ही प्रतीत होता है।
यदि हमारा पूर्व जन्म नहीं था तो फिर हम इस जन्म में कहां से आ गये? इससे पहले हमारा अस्तित्व था या नहीं? यदि था तो हम जन्म धारण न करने पर क्या करते थे? और यदि हम यह मान लें कि हमारा अस्तित्व ही नहीं था तो फिर हमारा अस्तित्व उत्पन्न कैसे हो गया? किसने उत्पन्न किया व क्यों किया? हम यह भी जानते हैं कि अभाव से किसी भाव पदार्थ को उत्पन्न नहीं किया जा सकता। हर निर्मित वस्तु का उपादान कारण व निमित्त कारण दोनों होते हंै। बिना उपादान कारण व निमित्त कारण के कोई वस्तु बनती नहीं है।

आत्मा एक चेतन पदार्थ है। चेतन पदार्थ किसी जड़ पदार्थ से उत्पन्न नहीं हो सकता। अतः प्रकृति व सृष्टि के भौतिक पदार्थों से अभौतिक आत्मा की उत्पत्ति होना सम्भव नहीं है। प्रकृति से इतर दूसरा चेतन पदार्थ ईश्वर है जो सर्वव्यापक व एकरस होने सहित अखण्डनीय होता है। अतः ईश्वर से भी आत्मा की उत्पत्ति होना असम्भव होता है। यदि आत्मा ईश्वर से उत्पन्न हुआ होता तो इसमें भी ईश्वर की सर्वज्ञता व आनन्द आदि गुण होने चाहियें थे जो कि किसी भी आत्मा में देखे नहीं जाते। इससे आत्मा की सत्ता ईश्वर एवं जड़ प्रकृति से भिन्न व स्वतन्त्र सिद्ध होती है। वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन करने से आत्मा के अस्तित्व का समाधान हो जाता है। वेद एवं वैदिक साहित्य में ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति को अनादि, नित्य, अविनाशी तथा अमर बताया गया है। इन तीनों पदार्थों का पृथक पृथक अस्तित्व है। ईश्वर व जीवात्मा दो चेतन पदार्थ है परन्तु दोनों के गुण, कर्म व स्वभाव कुछ समान व कुछ भिन्न हैं। जो गुण, कर्म व स्वभाव भिन्न हैं उनसे दोनों पदार्थों की पृथक पृथक सत्ता का होना सिद्ध होता है। इस प्रकार से ईश्वर व जीवात्मा दो पृथक सत्तायें व पदार्थ सिद्ध होते हैं। दोनों ही चेतन, अनादि, नित्य, अविनाशी तथा अमर हैं। ईश्वर सर्वज्ञ, अजन्मा एवं सर्वव्यापक तथा जीव एकदेशी, अल्पज्ञ तथा जन्म-मरण धारण करने वाला है। जीवात्मा का अनादि व नित्य होना तथा जन्म व मरण धारण करने से आत्मा का पूर्वजन्म व पुनर्जन्म होना सत्य सिद्ध होता है। प्रकृति जड़ पदार्थ है जो सत्व, रज व तम गुणों की साम्यावस्था को कहते हैं। इसी से परमात्मा ने सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, ग्रह, उपग्रह तथा नक्षत्रों आदि से युक्त यह समस्त सृष्टि बनाई है। वही इसका पालन व नियंत्रण करता है। उसी से इस सृष्टि की उत्पत्ति, पालन व प्रलय होता है। यह सृष्टि ईश्वर के अपने किसी प्रयोजन के लिए नहीं है अपितु यह ईश्वर के पुत्र व पुत्री समान जीवात्माओं के भोग व अपवर्ग=मोक्ष के लिए बनाई गई है। जीवात्मा ही इस सृष्टि में सुख व दुःखों का भोक्ता सिद्ध होता है। सृष्टि में जन्म लेकर सुखों के भोग के कारण ही जीवात्मा कर्म के बन्धनों में फंसता है और कर्मों का फल भोगने के लिए ही इसका अनादि काल से बन्धन, अवागमन व मोक्ष होता आ रहा है। इसका विस्तृत उल्लेख वैदिक साहित्य सहित सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में देखा जा सकता है।

मनुष्य को अपने व दूसरों के पूर्वजन्म के अनेक संकेत मिलते हैं। मनुष्य की सन्तान उत्पन्न होती है तो वह बिना सिखाये माता का दुग्ध पीना आरम्भ कर देती है। नियम है कि मनुष्य कोई काम बिना सीखे वा सिखाये नहीं कर सकता। नवजात शिशु के दूध पीने से यह ज्ञात होता है कि इसे पूर्वजन्मों में माता का दुग्ध पीने का अभ्यास है, उन्हीं संस्कारों की स्मृति व अभ्यास से सन्तान बिना सिखाये अपनी माता का दुग्ध पान करती हैं। सभी बच्चे समान रूप से रोते हैं। रोना भी पुराने संस्कारों व अभ्यास के कारण से ही होता है। बच्चों में यह भी देखा जाता है कि वह निद्रा में कभी मुस्कराते हैं तथा कभी डर कर चैंक जाते हैं। मुस्कराने का कारण किसी पुरानी स्मृति को स्मरण करना होता है। इससे भी यह विदित होता है कि शिशु की जीवात्मा अपने पूर्वजन्म की स्मृतियों को, जो जन्म के समय तक वह भूली नहीं हैं, स्मरण कर ही मुस्कराता है। इसी प्रकार से सोते सोते डरने या चैंकने का कारण भी उसके पूर्वजन्म की स्मृतियां ही होती हैं। एक ही माता पिता से कई बच्चे जन्म लेते हैं। सभी भाई बहिनों को माता पिता एक समान वातावरण देते हैं। उनका भोजन वह रहन सहन समान होता है। ऐसे में देखा जाता है कि सभी बच्चों की प्रवृत्तियां, रुचियां, पसन्द नापसन्द तथा भोजन में रुचि भिन्न-भिन्न होती है। भाई बहिनों में यह भी देखा गया है कि एक की बुद्धि व स्मरण शक्ति दूसरों से न्यून व उत्तम कोटि की होती है। इससे भी पूर्वजन्म के संस्कारों का होना सिद्ध होता है। एक ही आचार्य से पढ़ने वाले सभी शिष्यों का उस विषय का ज्ञान एक जैसा नहीं होता। वह उनकी ग्राह्य शक्ति के अनुरूप न्यून व अधिक होता है। यदि पुनर्जन्म न होता तो सभी मनुष्यों की प्रवृत्तियां, खाने व जीवन शैली की पसन्द तथा ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता एक समान होती। यहां हम देखते हैं कि कोई कला विषय को पसन्द करता है तो कोई विज्ञान को। कोई विधि विषय को पसन्द करता है तो विज्ञान व गणित आदि विषयों को। मनुष्य की इन सब प्रवृत्तियांे का कारण पूर्वजन्म व पुनर्जन्म को मान लेने पर आसानी से समझ में आ जाता है और इससे पुनर्जन्म का सिद्धान्त भी सिद्ध हो जाता है।

पुनर्जन्म पर सुप्रसिद्ध ग्रन्थ गीता का एक श्लोक में एक वाक्य प्राप्त होता है जिसे सभी वैदिक व पौराणिक अपना आदर्श वाक्य मानते हैं। वह है ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ध्रुवं जन्म मृतस्य च’। इसमें कहा गया है कि जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु होना निश्चित व अवश्यम्भावी है। संसार में सबका यही अनुभव है कि जो जन्म लेता है वह मरता है। इस श्लोक वाक्य में यह भी कहा गया है जन्मे व्यक्ति की मृत्यु ध्रुव व अटल है इसी प्रकार से मरने वाले मनुष्य व आत्मा का जन्म वा पुनर्जन्म होना भी ध्रुव व अटल है। हमें लगता है कि यह ऐसा प्रबल तर्क है कि जिसका खण्डन नहीं किया जा सकता। यह शास्त्रों के जीव के भोग व अपवर्ग प्राप्ति के सिद्धान्त का पोषक सिद्धान्त होने से सर्वथा सत्य एवं मान्य है। यहां हमें कर्म-फल भोग विषयक सर्वमान्य सिद्धान्त का भी ध्यान आता है। उसमें कहा गया है कि ‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं’। इसका अर्थ है कि जीवात्मा वा मनुष्य को अपने किये शुभ व अशुभ कर्मों का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। मनुष्य जीवन भर कर्म करता है। यह शुभाशुभ कर्म मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं क्रियमाण, संचित कर्म व प्रारब्ध कर्म। क्रियमाण कर्मों का फल साथ साथ मिल जाता है। संचित कर्मो। का फल जीवन के शेष भाग में मिल जाता है। प्रारब्ध कर्मों का फल पुनर्जन्म के रूप में प्राप्त होता है। योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि जी ने भी कहा है कि मनुष्य के प्रारब्ध कर्मों के अनुसार ही जीवात्मा का आगामी पुनर्जन्म जिसमें जाति, आयु व भोग सम्मिलित हैं, परमात्मा द्वारा निर्धारित किया जाता है। यह सर्वथा सत्य एवं निर्विवाद है परन्तु कुछ अविद्या से युक्त मनुष्य इसे भी बिना किसी तर्क व युक्ति के स्वीकार नहीं करते। इन सब युक्तियों व प्रमाणों से अनादि व नित्य जीवात्मा का पुनर्जन्म होना सत्य सिद्ध होता है।

ऋषि दयानन्द के पूना में दिए गये पन्द्रह प्रवचन उपलब्ध हैं। इनमें छठा प्रवचन जन्म विषयक है जो उन्होंने शनिवार 17 जुलाई, 1875 को स्थान बुधवार पेठ में भिड़े के बाडे में दिया था। जन्म व पुनर्जन्म विषय पर यह महत्वपूर्ण उपदेश व प्रवचन है। पुनर्जन्म विषय में रुचि लेने वाले सभी मित्रों को इसको अवश्य पढ़ना चाहिये। इसमें मनुष्य को अपने पूर्वजन्म का ज्ञान क्यों नहीं रहता, वह उसे क्यों भूल जाता है, इस पर प्रकाश डाला है। वह लिखते हैं ‘जीव का ज्ञान दो प्रकार का है–एक स्वाभाविक और दूसरा नैमित्तिक है। स्वाभाविक ज्ञान नित्य रहता है और नैमित्तिक ज्ञान की घटती-बढ़ती, न्यूनाधिक और हानि-लाभ आदि ये सब प्रसंग आते रहते हैं। इसका दृष्टान्त-जैसे अग्नि में ‘दाह करना’ यह स्वाभाविक धर्म है अर्थात् यह धर्म तो अग्नि के परमाणुओं में भी रहता है। यह उसका निज धर्म उसे कभी भी नहीं छोड़ता। इसलिए अग्नि की दाहक शक्ति का जो ज्ञान है वह स्वाभाविक ज्ञान होता है। अब जीव को -‘‘मैं हूं” अर्थात् अपने अस्तित्व का जो ज्ञान है वह स्वाभाविक है। फिर भी देखो कि (अग्नि के) संयोग के कारण जल में उष्णता धर्म उत्पन्न होता है, और वियोग होने से वह उष्णता धर्म नहीं रहता। इसलिए जल के उष्णता विषय का जो ज्ञान है वह नैमित्तिक ज्ञान है। जल में शीतलता विषय का जो ज्ञान है वह स्वाभाविक ज्ञान है, परन्तु चक्षु, श्रोत्र इत्यादि इन्द्रियों से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह आत्मा का नैमित्तिक ज्ञान है। यह नैमित्तिक ज्ञान तीन कारणों से उत्पन्न होता है–देश, काल और वस्तु। इन तीनों का जैसा जैसा कर्मेन्द्रियों के साथ सम्बन्ध होता है वैसे-वैसे संस्कार आत्मा पर होते हैं। अब जैसे-जैसे ये निमित्त निकल जाते हैं, वैसे-वैसे इस नैमित्तिक ज्ञान का नाश होता है, अर्थात् पूर्व जन्म का देश, काल, शरीर का वियोग होने से उस समय का नैमित्तिक ज्ञान नहीं रहता। इसको छोड़ इस विचार में एक बात और ध्यान में रखने योग्य है कि ज्ञान का स्वभाव ऐसा है कि वह अयुगपत् क्रम से होता है अर्थात् एक ही समयावच्छेद करके आत्मा के बीच दो तीन ज्ञान एकदम स्फुरित नहीं हो सकते। इस नियम की पापिका से पूर्वजन्म के विस्मरण का समाधान भली-भांति हो जाता है। इस जन्म में ‘मैं हूं’ अर्थात् अपनी स्थिति का ज्ञान आत्मा को ठीक-ठीक रहता है, इसलिए, पूर्वजन्म के ज्ञान का स्फुरण आत्मा को नहीं होता।’

हमने इस लेख में जीवात्मा के अनादि व नित्य होने सहित आत्मा के पूर्व व पुनर्जन्म पर कुछ विचार प्रस्तुत किये हैं। हमें लगता है कि इन विचारों से आत्मा के पुनर्जन्म होने की पुष्टि होती है। पुनर्जन्म पर अनेक विद्वानों के प्रामाणिक ग्रन्थ मिलते हैं। उनके अध्ययन से जिज्ञासु बन्धुओं की सभी भ्रान्तियां दूर हो जाती है। पुनर्जन्म का होना विद्या से युक्त सिद्धान्त है और न मानना अविद्या के कारण से होता है। इसी लिए ऋषि दयानन्द ने सिद्धान्त दिया है कि अविद्या का नाश तथा विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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