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विधि-कानून

न्याय तंत्र की मुसीबतें

राष्ट्रीय औसत के मुताबिक हाईकोर्टों में जजों के 38 फीसदी पद खाली पड़े हैं। पुलिस की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है। एक लाख की आबादी पर 156 पुलिसकर्मी का अनुपात बैठता है। जनवरी 2020 की हालत रिपोर्ट में यह बताई गई कि राष्ट्रीय स्तर पर हर तीन जरूरी पुलिसकर्मियों में से एक का पद खाली था। यह तो हुई संख्या की बात।
पिछले दिनों आई इंडियन जस्टिस रिपोर्ट हमें मौजूदा विधि व्यवस्था से जुड़े उन बुनियादी मुद्दों से रूबरू कराती है जो आम तौर पर अनदेखे ही रह जाते हैं। देश की न्याय प्रक्रिया की गड़बड़ियों और इसके नतीजों के उदाहरण हमें मिलते रहते हैं। कभी अदालतों के असंगत फैसले के रूप में तो कभी सही फैसला आने में हुए अत्यधिक विलंब के रूप में, कभी पुलिस ज्यादतियों के रूप में तो कभी जेल प्रशासन की लापरवाही के रूप में। इन सबके मूल कारणों पर बातचीत कम होती है। देश में अपराध नियंत्रण और दंड विधान से जुड़ी पूरी मशीनरी किस हाल में है और किस तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है, इस पर नियमित सार्वजनिक चर्चा संभवत: इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि हमारा ध्यान आम तौर पर तात्कालिक महत्व की चौंकाने वाली घटनाएं ही खींचती हैं, और यह सवाल किसी तात्कालिक घटना से नहीं जुड़ा है।

इसी कमी को पूरा करते हुए इंडियन जस्टिस रिपोर्ट 2020 बताती है कि कैसे हमारा यह तंत्र अपने ही बोझ से चरमरा रहा है। न्यायपालिका में लंबित मामलों की विशाल संख्या की तो बात ही छोड़िए, रिपोर्ट के मुताबिक जनरल केस क्लियरेंस रेट भी ऊपरी और निचली अदालतों में गिरता जा रहा है। और यह स्वाभाविक भी है। सुनवाई तो तब होगी जजों की संख्या पर्याप्त हो। लॉ कमिशन ने 1987 में ही अपनी 120वीं रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि देश में 20,000 की आबादी पर एक जज का अनुपात होना चाहिए। हकीकत यह है कि आज भी 50,000 की आबादी पर एक जज का अनुपात बैठता है। राष्ट्रीय औसत के मुताबिक हाईकोर्टों में जजों के 38 फीसदी पद खाली पड़े हैं। पुलिस की स्थिति भी कुछ बेहतर नहीं है। एक लाख की आबादी पर 156 पुलिसकर्मी का अनुपात बैठता है। जनवरी 2020 की हालत रिपोर्ट में यह बताई गई कि राष्ट्रीय स्तर पर हर तीन जरूरी पुलिसकर्मियों में से एक का पद खाली था। यह तो हुई संख्या की बात। गुणवत्ता पर चर्चा करें तो उसकी एक अहम कसौटी डायवर्सिटी को माना जाता है। इस लिहाज से महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मामला बहुत ही चिंताजनक है। पुलिस में महिलाओं की मौजूदगी का राष्ट्रीय औसत 10 फीसदी है। सिर्फ आठ राज्य ऐसे हैं जहां पुलिस बलों में महिलाओं का अनुपात इससे बेहतर है। अदालतों में भी हर स्तर पर महिलाओं की संख्या बढ़ाए जाने की जरूरत है। बिहार, उत्तराखंड, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा जैसे राज्यों के हाईकोर्टों में महिलाओं का औसत शून्य है।
जाहिर है, ऐसी स्थिति में पुलिस और अदालतों से महिलाओं के प्रति संवेदनशील होने की सीमित अपेक्षा ही की जा सकती है। काम के बढ़ते बोझ और काम निपटाने वाले हाथों की लगातार कमी के बीच न्याय तंत्र के लिए ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश नहीं रह पाती। ऐसे में अगर जेलों में कैदियों की संख्या क्षमता से कहीं अधिक बनी हुई है और उनमें 70 फीसदी कैदी विचाराधीन हैं, जिनके बारे में यह भी पता नहीं है कि वे दोषी हैं या बेकसूर, तो आश्चर्य कैसा!

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