परमात्मा का अस्तित्व

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परमात्मा का अस्तित्व
शास्त्रार्थ महारथी- पंडित रामचंद्र दहेलवी
3 फरवरी को पंडित रामचंद्र जी दहेलवी का देहांत हुआ था।
हम संसार मेँ जो कुछ भी कार्य करते हैँ, वे सब उस परम्‌ पिता परमात्मा के द्वारा किये गये कार्योँ की नकल ही है। अपने द्वारा किये गये समस्त क्रिया-कलापोँ से ही हम उस परमपिता को जान और पहचान सकते हैँ। हमारे सामने कई सज्जन व्यक्ति ये शंका करते हैँ कि भगवान हमारी शंकाओँ का समाधान क्योँ नहीँ करता? परन्तु उन भोले व्यक्तियोँ को यह समझना चाहिए कि भगवान के द्वारा किये गये कार्योँ पर शंका समाधान हमारे द्वारा किये गये क्रिया-कलापोँ से ही होता है। आप जगत का कोई भी पदार्थ लीजिए, उसका बनाने वाला कोई न कोई अवश्य है, मकान, कपड़ा, पुस्तक आदि को भी बनाने वाला कोई न कोई अवश्य है। यहाँ यह बात विचारणीय है कि क्या जड़ पदार्थ स्वंय कोई क्रिया कर सकता है?

यह देखिये, ये पुस्तक मेरे दायेँ हाथ की तरफ रक्खी है, परन्तु यह स्वंय चलकर अपने आप मेरे बांये हाथ की तरफ नहीँ आ सकती। यदि आपकी किसी पुस्तक को कोई स्थान से उठाकर अन्य स्थान पर रखे तो आप तुरन्त यही पूछेँगे कि मेरी पुस्तक यहां पर किसने रक्खी है? इन बातो से सिद्ध है कि संसार के सभी पदार्थ परतन्त्र हैँ अर्थात्‌ प्रबन्ध के आधीन हैँ। रेलवे स्टेशन पर यदि कोई बच्चा अपने पिता से बिछड़ जाये तो पिता के पुकारने पर वो तुरन्त बोल पड़ता है पर यदि किसी बक्सा रेलगाड़ी मेँ छूट जाये तो कोई पुरूष आवाज देकर न पुकारेगा। यदि कोई पुकारेगा तो अन्य सभी उसे नासमझ या पागल समझेगेँ कि बेजान वस्तु को पुकार रहा है।

अपने दैनिक व्यवहारोँ से ही हम भगवान के कार्योँ को अर्थात्‌ उसके अस्तित्व को पहिचानते तथा मानते हैँ। एक बार मैँ रात्रि के समय आर्यसमाज की अंतरंग सभा के अधिवेशन मेँ गया, तो जाते समय अपनी हाथ की छड़ी मुझे नहीँ मिली, अन्ततः मैँ बिना छड़ी के ही चला गया, अंतरंग सभा की बैठक से मैँ जब वापस लौटा, तो घर पर सब बच्चे सो गये थे। प्रातःकाल होने पर मैँने अपने दौहित्र से पूछा कि मेरी छड़ी तुमने कहीँ रक्खी है क्या? वह बोला- नहीँ। फिर उसकी छोटी बहन से पूछा, उसने भी यही कहा कि- मैँने नहीँ उठाई। फिर मैँने इन दोनोँ बच्चोँ की मां अर्थात्‌ अपनी बेटी से पूछा- वह बोली, पिताजी मुझे भी मालूम नहीँ है। अब अन्त मेँ चौथा केवल मैँ ही बाकी रह गया और मैँ भी सत्य कहता हूँ कि मैँने भी उसे कहीँ भी उठाकर नहीँ रक्खा है।

इसके पशचात्‌ मैँ बच्चोँ से बोला- मेरी छड़ी की आदत ही कुछ खराब हो गयी है, वह मुझे बिना बताये ही कहीँ पर चली जाती है।

यह सुनकर छोटी लड़की तुरन्त बोल उठी– नानाजी ! ऐसा कमी नहीँ हो सकता, छड़ी अपने आप कहीँ नहीँ जा सकती, भइया ही छड़ी से बन्दरोँ को भगाया करते हैँ, इन्होँने ही उठायी होगी। छड़ी अपने आप कहीँ नहीँ जा सकती। देखिये! अब आपने देख लिया कि एक छोटा-सा बच्चा भी इस बात को जानता है कि संसार मेँ जड़ पदार्थ स्वयं कोई क्रिया नहीँ कर सकता, क्योँकि वह परतंत्र है।
इसी प्रकार के अपने दैनिक व्यवहार के कार्योँ से हम परमात्मा के कार्योँ को पहचानते हैँ और उसकी सत्ता को अपने दिलो-दिमाग मेँ अनुभव करते हैँ। संसार का कोई भी जड़ पदार्थ आज तक स्वयं नहीँ बना, बल्कि उसका बनाने वाला अन्य कोई ना कोई अवश्य सै, परन्तु जगत का रचियता वह परमात्भा र्है

सोते समय हम लोग इतने बेसुध होते हैँ कि कोई हमेँ जान से मार जाये या हमारे घर से कोई सामान ही क्योँ न चुराकर ले जाये हमेँ कुछ मालूम नहीँ होता। उस समय हम आनन्दस्वरूप उस परमपिता के समीप पहुँच जाते हैँ और जागते हुए अनेकोँ प्रकार की चिन्ताएं हमेँ घेरे रहती हैँ, हम श्वांस लेते हैँ, किन्तु वह भी स्वंय नहीँ लेते। इसमेँ भी किसी का इन्तजाम जरूर होता है। जिसने इस समस्त शरीर रूपी भवन का निर्माण किया है। उसी के इन्तजाम मेँ यह सब कुछ हो रहा है। कुछ लोग कहते हैँ कि- सूर्य, चन्द्र, समुद्र, नदी, वायु, अग्नि को प्रकृति स्वंय बना लेती है। यदि ऐसा है तो वह जमीन बनाने के बाद क्योँ रूक जाती है? आगे घड़ा, तश्तरी आदि क्योँ नही बना देती? अपितु ज्ञानी परमात्मा ही यह सब बनाता है। जिस प्रकार स्कूल का मास्टर बच्चोँ को शुरू मेँ एक लाईन लिखकर देता है और फिर उसे देखकर बच्चा उसी प्रकार लिखता है। इसी तरह मनुष्य की सामर्थ्य जहां तक नहीँ पहुँच सकती थी, वहां तक उस ज्ञानी परमात्मा ने इस सृष्टि को बनाया और उसके बाद फिर मनुष्य बनाता है।

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