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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गौ और गोवंश की रक्षा कैसे की जाए, भाग-2

गोदुग्ध को हमारे यहां प्राचीन काल से ही स्वास्थ्य सौंदर्य के दृष्टिकोण से अत्यंत लाभदायक माना गया है। हमारे देश में स्वतंत्रता के वर्षों पश्चात भी गोदुग्ध, छाछ, लस्सी आदि हमारे राष्ट्रीय पेय रहे हैं। सुदूर देहात में आप आज भी जाएंगे तो लोग आपको चाय-कॉफी के स्थान पर दूध आदि ही देंगे। हां, इतना अवश्य है कि अब यह प्रचलन बहुत अधिक नही रहा है। इसका प्रथम कारण तेजी से गोवंश का होता नाश है। जबकि दूसरा कारण विदेशी शीतल पेय पदार्थों की कंपनियों का हो रहा विस्तार है। क्योंcow_gaay_indian-cowकि इन कंपनियों के शीतल पेय भारत में तभी बिकेंगे जब भारत के परंपरागत शीतल पेय पदार्थों को तथा दूध लस्सी आदि को समाप्त कर दिया जाएगा। इसलिए गाय को ये कंपनियां यथा शीघ्र कटवा कटवा कर समाप्त कर देना चाहती हैं। विदेशी शीतल पेय पदार्थों की भारत में बहुत बड़ी खपत है। सवा अरब की जनसंख्या वाला इतना बड़ा बाजार संसार में कहीं और नही है। चीन की जनसंख्या तो नि:संदेह भारत से अधिक है परंतु वह पश्चिमी देशों को उतना मुंह नही लगाता जितना उन्हें भारत मुंह लगाता है। इसलिए चीन की अपेक्षा भारत पश्चिमी देशों के लिए बड़ा बाजार है।
शीतल पेय बनाने वाली विदेशी कंपनियां भारत को दोनों हाथों से लूट रही हैं। बहुत बड़े स्तर पर भारी धन हमारा विदेशों में जा रहा है। अंग्रेजों के काल में जितना धन बाहर जा रहा था उससे भी अधिक धन आज विदेशों में जा रहा है। बिना किसी विशेष सर्वेक्षण के आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं-इसकी विपुलता का। हम इसे इस प्रकार से समझ सकते हैं-भारत की जनसंख्या है, लगभग सवा अरब। इसमें से 25 करोड़ की जनसंख्या उन लोगों की है जो स्वयं को अति आधुनिक मानते हैं, और जो लगभग एक अरब लोगों को विकास में पीछे छोड़कर आगे बढ़कर स्वयं को ‘सभ्य समाज’ के निर्माता कहते हैं। इससे आगे लगभग चालीस करोड़ लोग भारत में ऐसे हैं जो मध्यम वर्गीय कहे जाते हैं जबकि शेष साठ करोड़ लोग भारत में आज भी ऐसे हैं जो हरक्षेत्र में पिछड़ेपन का शिकार हैं और अभी भी बहुत ही दयनीय अवस्था में जीवन यापन कर रहे हैं। इनमें से ये 60 करोड़ लोग अपनी गरीबी में भी मस्त है, जबकि 25 करोड़ लोग अपनी अमीरी में भी अप्रसन्न हैं। कारण कि निचले स्तर पर खड़े 60 करोड़ लोगों ने अपनी इच्छाओं को समेटना सीख रखा है और वह भारतीय जीवन शैली को अपने लिए वरदान मानते हैं, इसलिए उसी में प्रसन्न है। परंतु ऊपर के 25 करोड़ लोगों की इच्छाओं की आग भड़क रही है। जबकि मध्यमवर्गीय लोगों का समाज मध्य में पिस रहा है।
विदेशी कंपनियों के पेय पदार्थों का ग्राहक 25 करोड़ लोगों के समूह में अधिक है, उससे कम मध्यम वर्ग में तथा उससे कम निचले स्तर के साठ करोड़ लोगों में है। अब यदि बीस करोड़ लोग भी प्रतिदिन भारत में शीतल पेय पदार्थों को खरीदने पर दस रूपया भी व्यय करें तो दो सौ करोड़ रूपया प्रतिदिन विदेशी कंपनियां भारत से लूटकर ले जा रही हैं। इसका अभिप्राय है कि छह हजार करोड़ रूपया प्रति माह और 72000 करोड़ रूपया प्रतिवर्ष भारत से बाहर चला जाता है। इसे और कम कर लें और 50,000 करोड़ प्रतिवर्ष का मान लें तो भी इतनी बड़ी धनराशि से 25,000 गांवों को प्रतिवर्ष प्राथमिक विद्यालय तथा सड़क आदि दी जा सकती है। इसका अर्थ है कि हमारे 25,000 गांवों के विकास का धन प्रतिवर्ष विदेशों में जा रहा है। इसी 50 हजार करोड़ रूपया को यदि हम भारत में ही रोक लें तो एक वर्ष में न्यून से न्यून 50 हजार वर्ग किमी के क्षेत्रफल की बंजर पड़ी भूमि को कृषि योग्य बना सकते हैं। जिससे अन्नोत्पादन तो बढ़ेगा ही साथ ही रोजगार के नये अवसर भी उत्पन्न होंगे। किसान जिस प्रकार आत्महत्या कर रहे हैं, उस पर इससे रोक लग सकती है। इस प्रकार देश को दोहरा लाभ होगा। एक तो हमारा धन बाहर जाने से रूकेगा और दूसरे वह देश में विकास को नयी बयार बहाने में सहायक होगा। यदि हम गाय को अपनी अर्थ व्यवस्था की रीढ़ बना लें तो हमारे किसानों की आर्थिक समृद्घि बढ़ सकती है। सारी व्यवस्था वास्तविक अर्थों में ग्रामोन्मुखी हो सकती है। अभी तक हम ग्रामोन्मुखी आर्थिक नीतियों का मात्र ढिंढोरा पीटते रहे हैं। वास्तव में हमारी आर्थिक नीतियां ग्रामोन्मुखी न होकर उद्योगोन्मुखी रही हैं, जिनसे बड़े बड़े उद्योगपतियों को लाभ मिला है और देश के आर्थिक संसाधनों के बड़े भाग पर मुट्ठी भर औद्योगिक घरानों का एकाधिकार हो गया है। गाय को हमारी अर्थव्यवस्था का आधार बनने से रोककर ये सारा दुष्परिणाम देश को झेलना पड़ रहा है। यदि हम गोदूध, दही, लस्सी आदि को शुद्घ रूप में बाजार में उतार दें और विदेशी कंपनियों के पेय पदार्थों को पूर्णत: निषिद्घ कर दें तो यह निश्चित है कि जहां विदेशी पेय पदार्थों को प्रतिदिन खरीदने वाले लोग बीस करोड़ है, वही गो दुग्धादि को प्रतिदिन खरीदने वाले या सेवन करने वाले 40 करोड़ लोग होंगे। क्योंकि वह शुद्घ स्वास्थ्य वर्धक और विदेशी कंपनियों के पेय पदार्थों की अपेक्षा सस्ते भी होंगे। इसका सीधा आर्थिक लाभ हमारे किसानों को मिलेगा।
हम देख रहे हैं कि हमारे दुधारू पशुओं के कटते जाने से कई दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। जैसे कृषि योग्य भूमि बंजर होती जा रही है पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है, लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है, और हमारे किसान परिवार प्रतिदिन निर्धन होते जा रहे हैं। इसके कई कारण है। इनमें से प्रमुख है गोवंश की समाप्ति के कारण चारे व भूसे को यूं ही जलाकर समाप्त कर देना। हमारे खेतों में से केवल अनाज, अनाज को घर लाया जा रहा है। भूसे को बड़े किसान खेत में ही जला रहे हैं। चारे की फसलें या तो कम कर दी गयीं हैं या फिर मक्का आदि की पूलियों को किसानों द्वारा खेतों में ही जला दिया जाता है। इससे किसान को अपने उत्पादन का दो तिहाई मूल्य ही मिल पाता है। एक तिहाई मूल्य का भूसा तो यूं ही समाप्त हो जाता है, या फिर उसे ईंट भट्टे वाले ईंटें पकाने के लिए सस्ते मूल्य पर खरीद ले जाते हैं। इससे पशुओं के गोबर से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया बाधित हुई है। जैविक खाद न मिलने से तथा रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग से खेतों की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है और भूमि तेजी से बंजर हो रही है। हमें बंजर पड़ी भूमि को उर्वरा बनाना था और हम कृषि योग्य भूमि को ही बंजर बनाने की डगर पर चल रहे हैं। भूसा पशुओं के लिए है ना कि ईंटें पकाने के लिए। ईंटें कोयला से पकती हैं। परंतु ईंटों को भूसा से पकाकर उनकी गुणवत्ता को कम किया जा रहा है। ऐसे भवन भूकंप आदि प्राकृतिक आपदाओं के समय सहजता से फट जाते हैं, या भूमिसात हो जाते हैं, जो भूसे की आग से पकी इन ईंटों से बने होते हैं। हम गाय को मार रहे हैं तो दुष्परिणाम चारों ओर से ही हमारे सामने अपनी भयंकरता के साथ खड़े दीख रहे हैं।
अब यदि भूसे का सदुपयोग करते हुए उसे गौ आदि पशुओं को खिलाया जाए तो उससे हमें गोबर मिलेगा जिससे जैविक पदार्थों का निर्माण होगा। किसान को अपनी उपज का वास्तविक मूल्य मिलेगा और जैविक खादों के उत्पादन से रासायनिक खादों को खरीदने की किसान की बाध्यता भी समाप्त हो जाएगी, जिससे किसान की भूमि की उर्वर शक्ति तो बढ़ेगी ही साथ ही सरकारी ऋण देकर खेती कराने की मूर्खतापूर्ण सरकारी नीति पर भी अंकुश लगेगा। किसान को भूसे से जो एक तिहाई उपज मूल्य की क्षति होती है वह इससे पूर्ण होगी और साथ ही सरकारी ऋण न लेने से और जैविक खाद घर में ही मिल जाने से उसकी संपन्नता प्रसन्नता में परिवर्तित हो जागी। वर्तमान आर्थिक नीतियां देश में कहीं कहीं संपन्नता तो ला रही हैं, परंतु संपन्नता के साथा साथ प्रसन्नता नही ला पा रही है। जबकि आर्थिक नीतियां वही प्रशंसनीय होती हैं जो संपन्नता के साथ-साथ प्रसन्नता भी ला सकती है। नि:संदेह गौ आधारित अर्थ व्यवस्था संपन्नता के साथ साथ प्रसन्नता लाने में भी सक्षम होती है। अभी भी समय है कि हम अपनी अर्थ व्यवस्था को गौ आधारित बना दें। गो दुग्धादि को राष्ट्रीय पेय पदार्थ घोषित करें तथा गौ के लाभों को टीवी आदि के माध्यम से प्रचारित प्रसारित करें। सचमुच यह बात सत्य है कि यदि गौ बचेगी तो पृथ्वी बचेगी। जब एक ट्रैक्टर आता है या तैयार किया जाता है तो समझो वह 50 बैलों को कटने के लिए बाध्य करता है। इसलिए खेती को बैल आधारित रखा जाना ही उचित है। मशीनें काम तो शीघ्र करती हैं, परंतु स्मरण रहे कि वो लोगों को बेरोजगार भी करती हैं। टै्रक्टर ने बैलों अनुपयोगी बना दिया तो हमने उसे ‘कट्टीघर’ का रास्ता पकड़ा दिया।
हम गाय को अपने लिए व्यर्थ चिंतन का केन्द्र बना चुके हैं तनिक इसे अपने अर्थ चिंतन के केन्द्र में ले आयें तो देश फिर से ‘सोने की चिडिय़ा’ बन सकता है। हमारे लिए उपयुक्त यही है कि हम भारत को फिर से ‘सोने की चिडिय़ा’ बनाने का उद्यम करें, यह ‘सोने की चिडिय़ा’ हमारे पास गाय है। इसके वास्तविक महत्व को समझकर ही हमारे देश में लोग गाय के भीतर ‘सवा किलो सोना’ होने की बात कहते आये हैं। हमने सवा किलो सोना रखने के इस रहस्य को समझा नही और वैज्ञानिक युग में इसकी सत्यता का पता नही लगाया। बस, इसे देश के लोगों की धार्मिक आस्था से जन्मी अज्ञानता मानकर उपेक्षित कर दिया। इसलिए ‘सोने की चिडिय़ा’ को मिट्टी के समान समझकर काटना आरंभ कर दिया। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हम भूल गये धर्म की ही हत्या करने लगे। हम भूल गये कि धर्म क्या होता है और वह हमें किस प्रकार उन्नत और सुसंस्कृत बनाता है। यदि हमने गाय को समझ लिया तो हम अपने धर्म को भी समझ जाएंगे और धर्म को समझ गये तो जीवन के मर्म को भी समझ जाएंगे। वही होगा हमारे सपनों का ‘उगता भारत’, जगमगाता भारत, समुज्ज्वल भारत-दिव्य भारत और विश्वगुरू भारत।

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