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आज का चिंतन

वेदों में राष्ट्रभक्ति के मंत्र

वयं तुभ्यं बलिहृत: स्याम(अथर्ववेद 12/1/62)
हम सब मातृभूमि के लिए बलिदान देने वाले हों।

अधि श्रियो दधिरे पृश्निमातर: ( ऋ. 1/85/2)*
पृथ्वी को माता मानने वाले देशभक्त सम्मान को अपने अधिकार में रखते है ।
उग्रा हि पृश्निमातर:( ऋ.1/23/10)
(पृश्निमातर:) देशभक्त (हि) सचमुच (उग्रा:) तेजस्वी होते है।

यस्मान्नानयत् परमस्ति भुतम् (अथर्ववेद 10/7/31)
स्वराज्य से बढ़कर और कुछ उत्तम नहीं है।

यतेमहि स्वराज्ये(ऋग्वेद 5/66/6)
हम स्वराज्य के लिए सदा यत्न करें।

ये वेदों का दिशा निर्देश है जो वैदिक धर्मियों को सदैव राष्ट्रभक्त बनने की आज्ञा देता है ।

अर्थववेद में ऋषियों ने कहा- भद्रं इच्छन्तः ऋषयः स्वर्विदः / तपो दीक्षां उपसेदु: अग्रे/ ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातम्/ तदस्मै देवाः उपसं नमन्तु यानि आत्मज्ञानी ऋषियों ने जगत का कल्याण करने की इच्छा से सृष्टि के आरंभ में जो दीक्षा लेकर तप किया था, उससे राष्ट्र-निर्माण हुआ, राष्ट्रीय बल और ओज भी प्रकट हुआ। इसलिये सब विबुध होकर इस राष्ट्र के सामने नम्र होकर इसकी सेवा करें।

इस राष्ट्र का सीमांकन करते हुये ऋग्वेद में ऋषि में कहा था- यस्य इमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रंरसया सह आहुः। यस्येंमे प्रदिशो यस्य तस्मै देवा हविषा विधेम।। अर्थात् हिमवान हिमालय जिसका गुण गा रहा है, नदियों समेत समुद्र जिसके यशोगान में निरत है, बाहु सदृश दिशाएं जिसकी वन्दना कर रही है, उस राष्ट्र-देव को हम अपना हविष्य अर्पित करें।

अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी जी श्रीसूक्त के पद की व्याख्या करते हैं –

उपैतु मां देवसख: कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।
अर्थात् हे देव, हमें देवों के सखा कुबेर, और उनके
मित्र मणिभद्र तथा दक्ष
प्रजापति की कन्या कीर्ति (यश)
उपलब्ध करायें, जिससे हमें और राष्ट्र
को कीर्ति-समृद्धि प्राप्त हो।
ऋग्वेद के परिशिष्ट में प्राप्त श्रीसूक्त का यह सातवाँ मन्त्र है ।
उपैतु मां देवसख : कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥
७॥
हे महादेव सखा कुबेर ! मुझे मणि के साथ
कीर्ति भी प्राप्त हो । मैं इस राष्ट्र में
जन्मा हूँ । इसलिए यह मुझे कीर्ति और धन दें ।

प्रस्थला मद्रगान्धारा आरट्टा नामतः खशाः ।
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायोऽतिकुत्सिताः॥
–कर्णपर्व ४४
. आरट्टा नाम ते देशा बाह्लीका नाम ते जनाः |
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायो विकुत्सिताः ||(पाठान्तर)

धर्म हमारे राष्ट्र के कण-कण में संव्याप्त है इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के
रूप में जाना जाता रहा है। यही कारण रहा है
कि हमारे ऋषियों ने भारत भूमि को माता कहा है। “माता भूमि पुत्रोहं पृथिव्याः” वाला यह राष्ट्र ही है जहाँ ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान पाया व ब्रह्मसाक्षात्कार किया। विश्व को परिवार माननेकी सुंदर कल्पना भी इसी भूमि से उपजी है।
राष्ट्र का शाब्दिक अर्थ है-रातियों का संगम स्थल। राति शब्द देने
का पर्यायवाची है। राष्ट्रभूमि और
राष्ट्रजनों की यह संयुक्त इकाई राष्ट्र ईसीलिए कही जाती है
कि यहाँ राष्ट्रजन अपनी-अपनी देन राष्ट्रभूमि के चरणों में अर्पित करते है।
स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र को व्यष्टि का समष्टि में समर्पण कहते हुए
इसकी व्याख्या की है। आध्यात्मिक राष्ट्रीयता के उद्घोषक श्री अरविंद ने कहा है-राष्ट्र हमारी जन्मभूमि है।
मनुस्मृति हमारे देश की साँस्कृतिक यात्रा की ओर संकेत करती है। भगवान मनु कहते हैं कि भारतवर्ष रूपी यह पावन अभियान सरस्वती और दृषद्वती नामक दो देवनदियों के मध्य देव विनिर्मित देश ब्रह्मावर्त से आरंभ
हुआ। सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ।।
तस्मिन्देशे य आचार: पारम्पर्यक्रमागत: ।
वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते ।।
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन: ।
स्वं स्वं चरित्रम् शिक्षेरन्पृथिव्यां सर्वमानवा: ।।
–मनुस्मृति १/१३६,१३७,१३९

इस प्रकार मनु महाराज द्वारा सदाचार, नैतिकता देवत्व के सम्वर्द्धन प्रचार प्रसार में विश्वास रखने वाली भारतीय संस्कृति को बताया गया है।
महाभारत के भीष्म पर्व में भारत
की यशोगाथा का वर्णन कुछ इस तरह हुआ है-
अत्रतेकीर्तयिष्यामिवर्षभारतभारतम्।
प्रिययमिंद्रस्यदेवस्यमनोवैंवस्वतस्यच॥
अर्थात् “हे भारत! अब मैं तुम्हें उस भारतवर्ष की कीर्ति सुनाता हूँ, जो देवराज इन्द्र को प्यारा था, जिस भारत को वैवस्वत मनु ने अपना प्रियपात्र बनाया था, भारतीय राष्ट्रवाद की व्याख्या करते हुए विष्णुपुराण में लिखा है-
उत्तरम् यत् समुद्रस्य हिमाद्रे: चैव दक्षिणम्। वर्षम् तद्
भारतम् नाम भारती यत्र संतति:’ (२,३,१)।
इस प्रकार हमारे देश का प्राचीन नाम ब्रह्मावर्त और भारतवर्ष है ।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी

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