जब वीर सावरकर ने दी थी कांग्रेसी नेताओं को राष्ट्रीय हिजड़े की उपाधि

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अजय कुमार

पिक्चर गैलरी का अनावरण करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महिमा गान करते हुए कहा कि सावरकर का व्यक्तित्व सभी देशवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर कांग्रेस की ओर से कड़ा एतराज जताया गया।

किसी राष्ट्र का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि देश को आजादी दिलाने वाले नायकों पर ही सियासत शुरू हो जाए। देश को आजाद कराने के लिए दिए गए उनके बलिदान को थोथा साबित कर दिया जाए और यह सब इसलिए किया जाए जिससे कुछ लोगों की न केवल सियासत चमकती रहे बल्कि उनके पूर्वजों का कद भी ऊंचा रहे, जिन्होंने कभी भी आजादी की लड़ाई में अपना योगदान देने की बात बढ़-चढ़कर प्रचारित-प्रसारित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा। यहां तक की इतिहास तक पलट दिया गया। यही वजह है जिन्होंने आजादी के पूरे आंदोलन के दौरान कभी जेल की हवा नहीं खाई, गोरे सिपाहियों ने जिन पर लाठी नहीं चलाई वह ताल-तिकड़म से आजादी के महानायक बन गए और जिन्होंने दस वर्षों तक सेलुलर जेल में काला पानी की सजा काटी, उन्हें कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। ऐसे ही देश के महान सपूत वीर सावरकर आजकल कांग्रेस की आंख की किरकिरी बने हुए हैं। कांग्रेस एक तरफ देश भर में आजादी के नायक वीर सावरकर के खिलाफ जहर उगलती फिरती है वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र में उस शिवसेना सरकार का हिस्सा बन जाती है जो महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर को अपना नायक मानती है।

खैर, वीर सावरकर (विनायक दामोदर सावरकर) से कांग्रेस का दुराव पुराना है। वीर सावरकर को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच भी तलवारें खिंची रहती हैं। दरअसल, बीजेपी आजादी की लड़ाई में वीर सावरकर को नेहरू जैसे तमाम नेताओं से बड़ा और सच्चा नायक मानती है। इसीलिए योगी सरकार ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद की नवसृजित पिक्चर गैलरी में जैसे ही महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर का चित्र लगाया तो कांग्रेस बिफर गई। परिषद में पार्टी के दल नेता दीपक सिंह ने सभापति रमेश यादव को पत्र लिखकर सावरकर के कार्यों को देश विरोधी बताया और फोटो हटाकर भाजपा के संसदीय कार्यालय में लगाने की मांग की है। पूर्व सपा नेता और सभापति रमेश यादव, जिनका कार्यकाल इस माह के अंत में खत्म हो रहा है, ने भी सियासी गोटियां बिछाते हुए प्रमुख सचिव को तथ्यों की जांच करने के निर्देश देने में देरी नहीं लगाई।

दरअसल, हाल ही में उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सुंदरीकरण कराने के साथ ही वहां पिक्चर गैलरी बनाई गई है, जिसमें तमाम स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों के चित्र लगाए गए हैं। इनमें वीर सावरकर की तस्वीर भी शामिल है। पिक्चर गैलरी का अनावरण करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महिमा गान करते हुए कहा कि सावरकर का व्यक्तित्व सभी देशवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर कांग्रेस की ओर से कड़ा एतराज जताया गया। कांग्रेस के विधान परिषद सदस्य दीपक सिंह ने सभापति को पत्र लिखकर कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के बीच सावरकर का चित्र लगाना उन महापुरुषों का अपमान है। अंग्रेजों से माफी मांगने वाले, उनके साथ मिलकर देश के विरुद्ध लड़ने वाले, मोहम्मद अली जिन्ना की तरह दो राष्ट्र की मांग उठाने वाले को सिर्फ भाजपा की स्वतंत्रता सेनानी मान सकती है। विधान परिषद में प्रशिक्षण-भ्रमण पर आने वाले अधिकारी और छात्र यहां से क्या प्रेरणा लेंगे। कांग्रेस ने मांग की कि सावरकर के चित्र को विधान भवन के मुख्य द्वार से हटाकर भाजपा के संसदीय कार्यालय में लगा दिया जाए।

बहरहाल, कांग्रेस की सोच जो भी हो लेकिन वीर सावरकर को लेकर देश की बड़ी आबादी की सोच कांग्रेस से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखती है। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी वीर सावरकर को भारत रत्न देने की बात कर उन्हें महान देशभक्त बताती है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस उन्हें अंग्रेजों का पिट्ठू करार देकर लगातार विरोध करती रहती है। हालांकि तमाम किन्तु-परंतुओं के बीच यह जान लेना भी जरूरी है कि एक समय ऐसा भी था जब कांग्रेस और वीर सावरकर एक-दूसरे के प्रबल समर्थक हुआ करते थे। वीर सावरकर ने एक समय कांग्रेस को आजादी की मशालवाहक तक करार दिया था। और तो और वीर सावरकर के जेल से छूटने के बाद कांग्रेस के कई नेताओं ने कई शहरों में वीर सावरकर के स्वागत में कार्यक्रम तक रखे थे, लेकिन समय के साथ काफी कुछ बदल गया और कांग्रेस ने वीर सावरकर से दूरी बनाकर उन्हें अपमानित करना भी शुरू कर दिया।

वीर सावरकर से कांग्रेस का विरोध जगजाहिर है, लेकिन इतने मात्र से सावरकर का कद छोटा नहीं हो जाता है। आधुनिक भारत में हिंदुत्व राष्ट्रवाद के पुरोधा माने जाने वाले सावरकर का बाल गंगाधर तिलक, दादा भाई नौरोजी, महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचंद्र बोस और नरीमन जैसे नेता भी समय-समय पर तारीफ करते रहे थे। वीर सावरकर हमेशा गोरी सरकार की आंख की किरकिरी बने रहे थे। इसीलिए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने काला पानी की सजा देकर सेलुलर जेल में बंद कर दिया था। 1920 में गांधी, वल्लभभाई पटेल और तिलक ने ब्रिटिश शासकों से सावरकर को बगैर शर्त छोड़ जाने की मांग रखी थी, लेकिन इस सबके बावजूद वीर सावरकर और कांग्रेस एक घटना को लेकर इस तरह आमने-सामने आए कि दोनों के बीच दुश्मनी की दीवार खड़ी हो गई।

हुआ यह कि नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविन्स में कुछ हिंदू युवतियों का अपहरण हो गया। इस अपरहरण कांड को लेकर तमाम तरह की खबरें फैल रही थीं। इसी में एक खबर यह भी थी कि कुछ स्थानीय नेताओं जिसमें डॉ. खान साहिब के नाम से मशहूर अब्दुल जफ्फार खान का भी नाम शामिल था, ने अगवा की गई युवतियों को वापस मुस्लिम अपहरणकर्ताओं को सौंपे जाने की मांग की थी। उनकी इस मांग का कांग्रेस के नेताओं ने अपनी सभा में समर्थन किया था। इससे क्रोधित वीर सावरकर ने कांग्रेसी नेताओं को कथित रूप से ‘राष्ट्रीय हिजड़े’ ही उपाधि दे दी। इसके बाद कांग्रेस और वीर सावरकर एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन बन गए। उस समय कांग्रेस ने वीर सावरकर का विरोध करते हुए कहा था कि वह जिस घटना को आधार बनाकर कांग्रेस पर लांछन लगा रहे हैं, वह घटना काल्पनिक है।

इस पूरे प्रसंग का उल्लेख करते हुए वैभव पुरंदरे ने अपनी पुस्तक ‘सावरकर द ट्रू स्टोरी ऑफ फादर ऑफ हिंदुत्व’ में लिखा कि उक्त प्रकरण के बाद पुणे में सावरकर के जेल से छूटने के बाद होने वाले स्वागत कार्यक्रम के प्रभारी कांग्रेसी नेता एनवी गाडगिल ने स्वागत प्रभारी पद छोड़ दिया और सावरकर पर आरोप लगाया कि उन्होंने (सावरकर) जिस खबर पर कड़ी प्रतिक्रिया दी, वही झूठी थी। पुरंदरे ने अपनी किताब में लिखा कि गाडगिल ने कहा था कि डॉ. खान साहिब के नाम से मशहूर अब्दुल जफ्फार खान ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया कि लड़कियां अपहरणकर्ताओं को सौंपी जानी चाहिए। अब्दुल गफ्फार खान सीमांत गांधी के नाम से मशहूर गफ्फार खान के भाई थे। ये उनके नाम से छपा जरूर था। गाडगिल के इस बयान के बाद रिपोर्टिंग को लेकर सवाल खड़े हुए थे।

गाडगिल के इस कदम के बाद सावरकर ने कहा कि अगर खान साहिब के नाम से छपा ये बयान वास्तविक नहीं हुआ तो मुझसे ज्यादा खुशी किसी और को नहीं होगी। पुरंदरे लिखते हैं कि सावरकर ने इस मुद्दे पर कई तरह से सफाइयां दीं और कांग्रेस के साथ कई किस्म की बातचीत हुई, लेकिन सावरकर को कांग्रेस ने ब्लैकलिस्ट में डाल दिया। सावरकर का जो भी कार्यक्रम होता, वहां कांग्रेसी काले झंडे लेकर विरोध प्रदर्शन करने पहुंच जाते थे। इस पूरे घटनाक्रम के बाद सावरकर और कांग्रेस के बीच फिर कभी बात नहीं बनी। सावरकर भी बाबा साहेब आंबेडकर को छोड़ नेहरू, गांधी और सभी प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की समय-समय पर आलोचना करते रहे। उधर, कांग्रेस भी पूरी ताकत से सावरकर के विरोध में खड़ी होकर सावरकर को धीरे-धीरे भारतीय राजनीति से दरकिनार करती चली गई। वीर सावरकर की ऐसी छवि बना दी गई मानो वह हिन्दू राष्ट्र के पक्षधर हों। सावरकर के बारे में कांग्रेस ने अनर्गल प्रचार करके उनकी छवि धूमिल करने का कभी कोई मौका नहीं छोड़ा और यह सिलसिला आज तक जारी है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी तो वीर सावरकर को लेकर निम्न स्तर की सियासत पर उतर आते हैं।

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