संविधान निर्माण पर डा० अंबेडकर के विचार

dr-ambedkar-2हमारे देश के संविधान के विषय में समय-समय पर कुछ लोगों को आपत्तियां होती रही हैं, डा. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा के अंतिम दिन जो भाषण दिया था वह हमारे लिए बहुत कुछ मार्गदर्शन कर सकता है। इस भाषण में डा. बी.आर. अंबेडकर ने कई शंकाओं का समाधान प्रस्तुत किया। जिसे ध्यान से पढऩे और समझने की आवश्यकता है। डा. बी.आर. अंबेडकर  ने संविधान सभा को बताया था कि इस संविधान सभा की कुल ग्यारह बैठकें हुई हैं। उनके उस भाषण से हमें ज्ञात होता है कि इन ग्यारह बैठकों में से छह उद्देश्य प्रस्ताव पास करने तथा मूलभूत अधिकारों पर, संघीय संविधान पर, संघ की शक्तियों पर, राज्यों के संविधान पर, अल्पसंख्यकों पर, अनुसूचित क्षेत्रों तथा अनुसूचित जनजातियों पर बनी उपसमितियों की रिपोर्टों पर विचार करने में व्यतीत हो गयी थी। सातवें, आठवें, नवें, दसवें और ग्यारहवें सत्र प्रारूप संविधान पर विचार करने के लिए प्रयोग किये गये। संविधान सभा के इन ग्यारह सत्रों में 165 दिन कार्य हुआ। इनमें से 114 दिन  प्रारूप संविधान के विचारार्थ लगाये गये।

इन तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत का संविधान किसी ‘एक व्यक्ति के मस्तिष्क की उपज’ नही है और यह अंधे होकर किन्हीं विदेशी संविधानों की की गयी अनुकृति भी नही है। इसे पारित करने में या बनाने में संविधान सभा के लगभग तीन सौ सदस्यों ने अपना मस्तिष्क प्रयोग किया और महत्वपूर्ण विचारों को प्रस्तुत कर संविधान निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। संविधान सभा की जिस प्रारूप समिति के अध्यक्ष डा. बी.आर. अंबेडकर चुने गये थे, उसका चुनाव संविधान सभा की पहली बैठक (9 दिसंबर 1946) से लगभग नौ माह पश्चात 29 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के पश्चात किया गया था। उस प्रारूप समिति की पहली बैठक 30 अगस्त 1947 को हुई थी। इसने कुल 141 दिन कार्य किया। इस प्रारूप समिति द्वारा आधार रूप में इस्तेमाल किये जाने के लिए संवैधानिक सलाहकार द्वारा बनाये गये प्रारूप संविधान में 243 अनुच्छेद और तेरह अनुसूचियां थीं। प्रारूप समिति द्वारा संविधान सभा में जो प्रारूप संविधान प्रस्तुत किया गया था उसमें 315 अनुच्छेद तथा 8 अनुसूचियां थीं। उस पर विचार किये जाने की अवधि के अंत तक प्रारूप संविधान में 395 अनुच्छेद तथा 8 अनुसूचियां हो गयी थीं। प्रारूप समिति के समक्ष कुल मिलाकर लगभग 7635 संशोधन प्रस्ताव लाये गये थे। इनमें से कुल मिलाकर 2473 संशोधन वास्तव में सदन के विचारार्थ प्रस्तुत किये गये और स्वीकार किये गये। इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि संविधान निर्माण के प्रति हमारी संविधान सभा के सदस्य भली प्रकार गंभीर थे, एक एक अनुच्छेद पर उन्होंने गहराई से मंथन किया और साढ़े सात हजार से भी अधिक संशोधन प्रस्ताव लाकर अपने दायित्वों के प्रति अपनी गंभीरता का भी प्रदर्शन किया। डा. बी.आर. अंबेडकर  ने संविधान सभा के समापन भाषण के समय इन तथ्यों का उल्लेख इसलिए किया था क्योंकि उस समय संविधान सभा को लेकर कुछ  लोगों को ये आपत्ति थी कि ये बेकार में ही गठित की गयी है और अनावश्यक देश के धन को नष्ट कर रही है। कुछ लोगों को आपत्ति थी कि इस संविधान सभा ने अनावश्यक ही लंबा समय ले लिया। जबकि कुछ लोग इस संविधान सभा को देश में साम्प्रदायिक दंगों के फेेलने के समय ये कहकर भी चिढ़ाने का  प्रयास कर रहे थे कि जब रोम जल रहा था, तो नीरो बांसुरी बजा रहा था-अर्थात जब देश जल रहा था तो संविधान सभा के सदस्य आराम से मौजमस्ती कर रहे थे। इन सारे आरोपों को सिरे से ही नकारने के लिए पूरी संविधान सभा के कार्यों को औचित्यपूर्ण सिद्घ करने के लिए  डा. बी.आर. अंबेडकर  ने संविधान सभा के द्वारा लिये गये समय का औचित्य पूर्ण, तार्किक और तथ्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया।

उन्होंने उपस्थित सदस्यों को बताया कि तनिक अन्य देशों की संविधान सभाओं के विषय में भी देखें, जिन्होंने अपना अपना संविधान बनाने में लंबा समय लिया। उन्होंने कहा था-अमेरिकन कन्वेंशन ने 25 मई 1787 को पहली बैठक की और अपना कार्य 17 सितंबर  1787 अर्थात चार माहों के भीतर पूरा कर लिया। कनाडा की संविधान सभा की पहली बैठक दस अक्टूबर 1864 को हुई तथा दो वर्ष पांच माह का समय लेकर मार्च 1867 को ये संविधान पूर्ण कर लिया। ऑस्टे्रलिया की संविधान सभा मार्च 1891 में बैठी और नौ वर्ष लगाने के पश्चात 9 जुलाई 1900 को संविधान कानून बन गया। दक्षिण अफ्रीका की सभा की बैठक अक्टूबर 1908 में हुई और एक वर्ष के श्रम के पश्चात बीस सितंबर 1909 को संविधान कानून बन गया। जो संविधान हमारे देश के संविधान से कम समय में बनकर तैयार हो गये थे, उनके विषय में यह सच है कि वे हमारे देश के संविधान से बहुत छोटे आकार के हैं। जैसे हमारे देश के संविधान में जहां 395 अनुच्छेद हैं वही अमेरिका के संविधान में सात अनुच्छेद हैं जिनमें से पहले चार तब मिलाकर सब 21 धाराओं में विभाजित हैं। कनाडा के संविधान में 147 ऑस्टे्रलियाई संविधान में 128 तथा दक्षिण अफ्रीकी संविधान में 153 धारायें हैं। यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि अमेरिका, कनाडा, ऑस्टे्रलिया और दक्षिण अफ्रीका के संविधान निर्माताओं को संशोधनों की समस्या का सामना नही करना पड़ा था। वे जिस रूप में प्रस्तुत किये गये उसी रूप में पारित भी कर दिये गये थे। जबकि भारत के संविधान में ऐसे 2473 गंभीर संशोधनों को स्वीकार किया गया, संविधान सभा जिन्हें वास्तव में उचित माना। संविधान सभा की ‘ड्रफ्टिंग कमेटी’ को संविधान सभा के एक सदस्य नजीरूद्दीन अहमद ‘ड्रिलिंग कमेटी’ कहकर उसका उपहास उड़ाया करते थे। श्री अहमद एकमात्र ऐसे सदस्य थे जिन्होंने कमेटी की कार्य प्रणाली की अंतिम दिन भी प्रशंसा नही की थी यद्यपि संविधान सभा के शेष सदस्यों ने ‘ड्राफ्टिंग कमेटी’ के कार्य और कार्य प्रणाली की प्रशंसा करने में कोई कमी नही छोड़ी थी। तब डा. बी.आर. अंबेडकर ने कहा था-”मुझे यह देखकर प्रसन्नता होती है कि प्रारूप समिति द्वारा किये गये कार्य की प्रशंसा करने में एक अकेले सदस्य को छोड़कर संविधान सभा के सभी सदस्य एकमत थे। मुझे विश्वास है कि अपने श्रम की इतनी सहज और उदार प्रशंसा से प्रारूप समिति को प्रसन्नता होगी।”

संविधान निर्माण को किसी एक व्यक्ति के मस्तिष्क की उपज के संभावित आरोपों से बचाने के लिए डा. बी.आर. अंबेडकर ने सर बी.एन. राव की इस बात के लिए प्रशंसा की कि उन्होंने जो कच्चा प्रारूप समिति के विचारार्थ संविधान सभा में प्रस्तुत किया वह वास्तव में ही प्रशंसा के योग्य हैं, इसलिए इस संविधान निर्माण का बहुत सा श्रेय सर बी.एन. राव के प्रयास को दिया जाना चाहिए। प्रारूप समिति के उन सदस्यों को भी डा. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान निर्माण का श्रेय दिया जिन्होंने प्रारूप समिति की 141 बैठकों में भाग लिया और अपने अमूल्य विचार प्रस्तुत किये। इसके अतिरिक्त श्रेय का बड़ा भाग उन्होंने संविधान के मुख्य ड्राफ्टसमैन श्री एस.एन. मुखर्जी को दिया, जिन्होंने जटिलतम प्रस्तावों को सरलतम व स्पष्टतम कानूनी भाषा में रखने का प्रशंसनीय श्रम किया। इसके अतिरिक्त डा. बी.आर. अंबेडकर उन सदस्यों को भी श्रेय देना नही भूले थे जिन्होंने आधी आधी रात तक बैठकों में उपस्थित रहकर संविधान को जनोपयोगी बनाने हेतु अपने अमूल्य विचार एवं सुझाव प्रस्तुत किये और पूरी गंभीरता से संविधान सभा की बैठकों में भाग लिया। डा. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान सभा को ‘भानुमति का कुनबा’ बताने के आरोप को ये कहकर नकार दिया था कि यदि यह सभा भानुमति का कुनबा होती तो यहां जैसी व्यवस्था देखी गयी है वह ना होती और यहां पूर्णत: अव्यवस्था और अनुशासनहीनता का ही साम्राज्य होता। उनका मानना था कि संविधान सभा में पार्टी अनुशासन के सामने घुटने न टेककर कुछ लोगों ने अपने विद्रोही विचार प्रस्तुत किये और उनके विचारों को संविधान में उचित स्थान व सम्मान भी दिया गया है। जिससे संविधान की उपयोगिता में चार चांद लग गये हैं। यदि ये सदस्य ेऐसे विद्रोही विचार व्यक्त ना करते तो संविधान निश्चित रूप से अधिक उपयोगी न बन पाता। इन विद्रोही विचार व्यक्त करने वाले लोगों में उन्होंने जिन लोगों के नाम गिनाये थे उनमें श्री कामत,  डा. पीएस देशमुख, श्री सिन्धवा, प्रो. सक्सेना, पं. ठाकुरदास भार्गव का नाम विशेष रूप से उल्लेखित किया था। अंत में उन्होंने डा. राजेन्द्र प्रसाद के द्वारा संविधान सभा के कुशल संचालन को भी संविधान निर्माण का श्रेय दिया और कहा कि यदि ऐसा कुशल संचालन ना किया गया होता तो हम आज जिस लक्ष्य को प्राप्त कर सके हैं वहां तक उतनी सफलता के साथ ना आये होते। आपने जो सौजन्य और समझ सभा के सदस्यों के प्रति दर्शायी है वे उन लोगों द्वारा कभी भुलाई नही जा सकती, जिन्होंने इस सभा की कार्रवाईयों में भाग लिया है। ऐसे अवसर आये थे जब प्रारूप समिति के संशोधन ऐसे अवसरों पर अस्वीकृत किये जाने थे जो विशुद्घ रूप से तकनीकी प्रकृति के थे। मेरे लिए वे क्षण बहुत आकुलता से भरे थे, इसलिए मैं विशेष रूप से आपका (डा. राजेन्द्र प्रसाद का) आभारी हूं कि आपने संविधान निर्माण के कार्य में यांत्रिक विधिवादी रवैया अपनाने की अनुमति दी।

हमें भी संविधान निर्माण के श्रेय के संबंध में डा. बी.आर. अंबेडकर के विचारों का सम्मान करना चाहिए। यदि हम इस संविधान के निर्माण का सारा श्रेय डा. बी.आर. अंबेडकर को ही देंगे तो फिर उनके उन विचारों का या संवैधानिक प्राविधानों का क्या होगा जिनसे डा. बी.आर अंबेडकर स्वयं भी असहमत थे?

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