वेद में सामाजिक जीवन और उसकी की बारीकियां

VYASAडा. आर. एन. कथड़
वैदिक ऋषियों ने समाजसंस्था की स्थापना करने हेतु सद्व्यवहार तथा नैतिक आचरणों के विषय में बहुत कुछ कहा है। जिसमें तत्कालीन सामाजिक नियम, रूढि़ परंपरा, राज्यव्यवस्था, सामाजिक कुरिवाज, सतीप्रथा, जुआ, धनोपार्जनव्यवस्था, पति पत्नीकत्र्तव्य संबंधी नियम, नारी प्रतिष्ठा आदि विषय शामिल हैं। इस लेख में ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद के मंत्रों के आधार पर समाज से संबद्घ और समाज के लिए उपादेय विषयों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
कौटुम्बिक सामाजिक व्यवहार-
मनुष्य का संबंध न केवल अपने आपसे किंतु दंपती, कुटुम्ब जाति, समाज तथा समस्त संसार के प्राणिमात्र से है। इसलिए सबके साथ प्रेम दया और सहानुभूति से व्यवहार का उपदेश वेदों में दिया गया है। दंपती प्रेम के विषय में ऋग्वेद में कहा गया है कि जो दंपती एक मन होकर यज्ञ अर्थात उत्तम कामों के लिए साथ साथ चलते हैं और नित्य परमेश्वर से प्रार्थना करते हें, वे श्रेष्ठ हैं। अथर्ववेद में भी पति, पत्नी को एकमन होकर आनंदपूर्वक उत्तम कर्मों में लगे रहने तथा परस्पर प्रेम और विनोद के साथ व्यवहार करने का उपदेश दिया गया है।
कौटुम्बिक व्यवहार संबंधी सुचारू उपदेश अथर्ववेद में प्राप्त होता है, जहां कहा गया है, पुत्र पिता का आज्ञाकारी और माता का इच्छाकारी हो तथा स्त्री पति से मधुर और शांत वाणी से बातचीत करे, भाई से भाई द्वेष न करे और न बहन, बहन से ईष्र्या करे। सब लोग अपने-अपने व्रत अर्थात मर्यादा में रहकर सदैव आपस में भद्रभाषा से ही बातचीत करें।
अथर्ववेद तथा यजुर्वेद में मनुष्य से कैसे व्यवहार करना चाहिए उसके बारे में कहा हे-तुम सब मनुष्यों के जलस्थान एक समान हों, तुम सब अन्न को एक समान ही बांट कर लो। मिलक कर्म करो। मैं तुम्हारा हृदयों को एक समान करता हूं। तुम एक दूसरे से प्रीति से रहा। यजुर्वेद में प्राणिमात्र के साथ प्रेम, दया और सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार के िलए कहा है-हे परामात्मन मेरी दृष्टि को दृढ़ कीजिए जिससे सब प्राणियों को मित्रभाव से देखूं और हम सब परस्पर एक दूसरे को मित्रदृष्टि से देखें।
कुटुम्बव्यवस्था-
समाजव्यवस्था योग्य प्रकार से चले, उसके लिए संयुक्त कुटुम्बप्रथा की व्यवस्था थी। ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है, हम पुत्र पौत्र परंपरा को न तोड़ें। विवाह सूक्त में सूर्या को दिये गये उपदेश, हे वधू तुम ससुर, सास, ननद और देवर के प्रति महारानी बनो। इस से भी इस बात की पुष्टि होती है। वहां पर भी कहा गया है कि हे कन्या तुम गृहपत्नी बनने के लिए पति के घर जाओ एवं पति के वश में रहकर घर की व्यवस्था करो। इस से प्रतीत होता है कि कुटुम्ब में पुरूष प्रधान है, स्त्री को पति के वश में रहकर घर की व्यवस्था करनी चाहिए।
पिता-पुत्र के व्यवहार संबंधी भी कुछ नियम थे, जिनमें पुत्र पिता का पालन करता है तथा पिता के धन का वारिस बनता है, ऐसा निर्देश ऋग्वेद के मंत्र में हैं।
सामाजिक रीति रिवाज तथा संस्कार
वेदों में गर्भाधान से अंत्येष्टि तक के संस्कार निरूपित हैं। वेदकालीन ऋषियों ने मनुष्य समाज के लिए षोडश संसकार पालन को कत्र्तव्यकर्म माना है। यह संस्कार मनुष्य के लिए परम आवश्यक है।
षोडश संस्कारों में से प्रमुख विवाह संस्कार है। ऋग्वेद के विवाहसूक्त से ज्ञात होता है कि विवाह कैसा संस्कार है तथा विवाह कैसे स्त्री पुरूषों का होना चाहिए। समावर्तन संस्कार होने के बाद ही विवाह होता है। वर वधू की परस्पर वैवाहिक प्रतिज्ञाओं को वेदमंत्रों में अच्छी तरह बताया गया है। विवाह के समय वर प्रतिज्ञा करता है कि मैं सौभाग्य के लिए तेरा हाथ पकड़ता हूं, तू वृद्घावस्थापर्यन्त मेरे साथ रहे। देवताओं ने मुझे तेरा हाथ पकड़वाया है इसलिए तू धर्म से मेरी पत्नी है और मैं धर्म से तेरा पति हूं। वधू भी प्रतिज्ञा करती हुई कहती है कि हे मननशील पुरूष मैं तुझे अपने वस्त्र से बांधती हूं जिससे कि तू मेरा ही रहे और दूसरी स्त्रियों की कभी बात न करे। इस प्रकार के प्रतिज्ञावचन के बाद ही विवाह होता था। विवाह सदैव योग्य स्त्री पुरूषों का ही होना चाहिए। वही गर्भाधानादि संस्कारों को योग्य प्रकार से कर सकते हैं और उन्हीं की संतान सदाचारी होकर समाज के योग्य हो सकती है।
सामाजिक कुप्रथा-
सामाजिक कुप्रथाओं में दहेजप्रथा, सतीप्रथा प्रचलित थी। परदाप्रथा तथा अक्षों से खेलने का निर्देश भी मिलता है। वैदिक ऋषि ने इन कुप्रथाओं से समाज को मुक्ति दिलाने का प्रयास किया है।
सूर्या विवाहसूक्त में विवाह के समय पिता पुत्री अंजन, पिटारी, ओढऩी, वस्त्र और कंघा आदि वस्तुएं देता है। ऋग्वेद के 1.109.2 में कहा गया है, ”हे इंद्र और अग्नि गुणहीन कन्या का भाई उत्तम वरलाभ के लिए जितना धन देता है उससे अधिक तुम देने वाले हो। इससे भी इस बात की पुष्टि मिलती है।
ऋग्वेद के मंत्र 10.18.8 में कहा गया है, तू मृतक के पास क्यों सोई है, इसके साथ मरने का विचार छोड़ दे। कुप्रथाओं से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि के प्रयास ने स्त्री को सतीप्रथा से मुक्ति दिला कर उसे पुनर्विवाह करने का आदेश दिया है।
जुआ से जुआरी को मुक्ति दिलाने हेतु ऋषि ने अक्षसूक्त में उपदेश दिया है। जुआ खेलने वाले की सभी निंदा करते थे। उपदेश देते हुए कहा है, पासों से मत खेलों। खेती से जो धन मिले, उसी को बहुत मानकर प्रसन्न रहो। ऋग्वेद के एक मंत्र 8.33.19 में कहा गया है, हे स्त्री तू नीचे देख, ऊपर न देख। तू पैरों को आपस में मिला। तेरे ओष्ठ और कमर को कोई न देखे।
इससे प्रतीत होता है कि तत्कालीन समय में परदाप्रथा भी रही होगी।
स्त्री का स्थान
समाज में स्त्री की प्रतिष्ठा होती थी। ऋग्वेद के 10.27.12 में कहा गया है, जो सुगठित शरीर वाली भली नारी होती है, वह बहुत से पुरूषों में से अपने मन के अनुकूल पति चुन लेती है। इससे स्वयंवर प्रणाली से विवाह होता था ऐसा ज्ञात होता है। ऋग्वेद के अन्य मंत्र 10.117.7 में निर्दिष्ट है कि स्त्री मृत्युपर्यन्त माता पिता के साथ रहकर उनके धन की भागीदार बन सकती है। घोषा के आख्यान से भी वह विदित होता है कि भाग्यहीन पुत्री वृद्घावस्था तक अविवाहिता रहकर पिता के घर निवास कर सकती है तथा ब्रह्मज्ञानोपासना कर सकती है।
धनोपार्जनव्यवस्था-
वेदकाल में धनोपार्जनव्यवस्था वर्णव्यवस्थानुसारी थी। ऋग्वेद 10. 90. 12 में वर्ण व्यवस्था का सर्वप्रथम निर्देश है। उसी वर्णव्यवस्थानुसार ब्राह्मण अध्ययन अध्यापन तथा धार्मिक कार्य करता करवाता था। क्षत्रिय राज्यरक्षा का कार्य करता है। वैश्य को कृषिकार्य करना चाहिए तथा शूद्र को सेवाकार्य करना चाहिए, जिससे समाज व्यवस्था समानांतर चले।
धनोपार्जन हेतु मुख्यतया कृषिकार्य किया जाता था। इस दरिद्रता नाशक सर्वप्रधान व्यवसाय खेती के लिए ऋग्वेद 4.57.1-8 में प्रार्थना की गई है कि खेत के स्वामी के लिए सब सुखकारी हो। इस के सिवा व्यापारी को अपने व्यापार में मन लगाने का उपदेश दिया गया है। अथर्ववेद में सुनार, बढई, तक्षा, रथ्कार, कुलाल, बढ़ई, निषाद तथा अन्य छोटे बड़े कारीगरों का भी सत्कार किया गया है। सुनार आभूषणादि, पणि सूद खाकर, वैद्य औषधि जुलाहा वस्त्र आदि से धनोपार्जन कर सकते हैं।
राज्यव्यवस्था-
राज्यव्यवस्था के लिए क्षत्रिय को राष्ट्रहित के लिए राजकर्म में नियुक्त किया जाता था। ऋग्वेद में राजा को पसंद नही करने वाली प्रजा की हार हुई है ऐसा वर्णन है।
राजा शूरवीर, धनुर्धारी और शत्रु का नाश करने वाला होना चाहिए ऐसा यजुर्वेद में कहा गया है। राज्य की रक्षा करना तथा उसका योग्य नेतृत्व करना-ये दो राजा के प्रमुख कत्र्तव्य थे। राजा के कत्र्तव्यों का निर्देश ऋग्वेद 10.173.74 युद्घशस्त्रादि की जानकारी दी गयी है।

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