विश्व में हिंदी भाषा का डंका लेकिन अपने ही देश भारत में उपेक्षित क्यों ?

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ललित गर्ग

हिंदी की विश्वभर में बढ़ रही है ताकत, पर अपने ही देश में हो रही है उपेक्षा
राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में आपसी लोगों से सम्पर्क स्थापित करने का अभिनव कार्य किया है। लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए।

 

विश्व हिन्दी दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करना तथा हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है। विश्व हिंदी दिवस पहली बार 10 जनवरी, 2006 को मनाया गया था। आज हिन्दी विश्व की सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली तीसरी भाषा है, विश्व में हिन्दी की प्रतिष्ठा एवं प्रयोग दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, लेकिन देश में उसकी उपेक्षा एक बड़ा प्रश्न है। सच्चाई तो यह है कि देश में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह स्थान एवं सम्मान अंग्रेजी को मिल रहा है। अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं की सहायता जरूर ली जाए लेकिन तकनीकी एवं कानून की पढ़ाई के माध्यम के तौर पर अंग्रेजी को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। आज भी भारतीय न्यायालयों में अंग्रेजी में ही कामकाज होना राष्ट्रीयता कमजोर कर रहा है। राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय प्रतीकों की उपेक्षा एक ऐसा प्रदूषण है, एक ऐसा अंधेरा है जिससे ठीक उसी प्रकार लड़ना होगा जैसे एक नन्हा-सा दीपक गहन अंधेरे से लड़ता है। छोटी औकात, पर अंधेरे को पास नहीं आने देता। राष्ट्र-भाषा को लेकर छाई धुंध को मिटाने के लिये कुछ ऐसे ठोस कदम उठाने ही होंगे।

कितने दुख की बात है कि आजादी के 74 साल बाद भी राजधानी दिल्ली सहित महानगरों में ही नहीं बल्कि हमारे दूर-दराज के जिलों में राज्य सरकारें अपना कामकाज अंग्रेजी में करती हैं। हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है। भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में आपसी लोगों से सम्पर्क स्थापित करने का अभिनव कार्य किया है। लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए। विशेषतः अदालतों में आज भी अंग्रेजी का वर्चस्व कायम रहना, एक बड़ा प्रश्न है। देश की सभी निचली अदालतों में संपूर्ण कामकाज हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में होता है, किंतु उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में यही काम केवल अंग्रेजी में होता है। यहां तक कि जो न्यायाधीश हिंदी व अन्य भारतीय भाषाएं जानते हैं वे भी अपीलीय मामलों की सुनवाई में दस्तावेजों का अंग्रेजी अनुवाद कराते हैं।

आमजन के लिए न्याय की भाषा कौन-सी हो, इसका सबक भारत और भारतीय न्यायालयों को अबू धाबी से लेने की जरूरत है। संयुक्त अरब अमीरात यानि दुबई और अबू धाबी ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अरबी और अंग्रेजी के बाद हिंदी को अपनी अदालतों में तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया है। इसका मकसद हिंदी भाषी लोगों को मुकदमे की प्रक्रिया, उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में सीखने में मदद करना है। न्याय तक पहुंच बढ़ाने के लिहाज से यह कदम उठाया गया है। अमीरात की जनसंख्या 90 लाख है। उसमें 26 लाख भारतीय हैं, इन भारतीयों में कई पढ़े-लिखे और धनाढ्य लोग भी हैं लेकिन ज्यादातर मजदूर और कम पढ़े-लिखे लोग हैं। इन लोगों के लिए अरबी और अंग्रेजी के सहारे न्याय पाना बड़ा मुश्किल होता है। इन्हें पता ही नहीं चलता कि अदालत में वकील क्या बहस कर रहे हैं और जजों ने जो फैसला दिया है, उसके तथ्य और तर्क क्या हैं? ज्वलंत प्रश्न है कि विदेशों में बसे भारतीयों की इस तकलीफ का ध्यान रखने का निर्णय लिया गया है तो भारत में ऐसे निर्णय क्यों नहीं लिये जाते? प्रश्न यह भी है कि विदेशों में ही क्यों बढ़ रही है हिन्दी की ताकत? झकझोरने वाला प्रश्न यह भी है कि राष्ट्र भाषा हिन्दी को आजादी के 72 वर्ष बीत जाने पर भी अपने ही देश में क्यों घोर उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है? हिन्दी की उपेक्षा राष्ट्रीय शर्म का विषय है, जबकि विश्व में हिन्दी की ताकत बढ़ रही है। भारत सरकार के प्रयत्नों से हिन्दी को विश्वस्तर पर प्रतिष्ठापित किया जा रहा है, यह सराहनीय बात है। लेकिन भारत में उसकी उपेक्षा कब तक होती रहेगी, यह प्रश्न भी सरकार एवं आमजन के लिये सोचनीय होना चाहिए।

हिन्दी को कानून की भाषा बनाने का जो काम भारत में सबसे पहले होना चाहिए था, वह काम संयुक्त अरब अमीरात ने किया है, सर्वोच्च न्यायालय तो अभी भी अंग्रेजी में ही सारे काम-काज के लिये अड़ा हुआ है। वहां मुकदमों की बहस अंग्रेजी में ही होती है। जहां बहस ‘अंग्रेजी’ में होती है, वहां फैसले भी अंग्रेजी में ही आते हैं। अभी सुना है कि उनके हिंदी अनुवाद की बात चल रही है। बात केवल कानून के सर्वोच्च संस्थान की ही नहीं है, बल्कि समस्त सरकारी कामकाज भी अंग्रेजी में ही होता है, उच्च शिक्षा भी अंग्रेजी में ही दी जा रही है, यहां तक प्राथमिक-माध्यमिक शिक्षा में भी अंग्रेजी का ही बोलबाला है, कैसे हम अपनी भाषा को प्राथमिकता देंगे? कब भारत के भाग्य निर्माता हिन्दी को जनभाषा, राजकाज की भाषा एवं कानून की भाषा का दर्जा देकर बधाई के पात्र बनेंगे? भारत एक है, संविधान एक है। लोकसभा एक है। सेना एक है। मुद्रा एक है। राष्ट्रीय ध्वज एक है। लेकिन इन सबके अतिरिक्त बहुत कुछ और है जो भी एक होना चाहिए। बात चाहे राष्ट्र भाषा की हो या राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत- इन सबको भी समूचे राष्ट्र में सम्मान एवं स्वीकार्यता मिलनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को चाहिए कि वह ऐसे आदेश जारी करे जिससे सरकार के सारे अंदरूनी काम-काज भी हिन्दी में होने लगें और अंग्रेजी से मुक्ति की दिशा सुनिश्चित हो जाये। अगर ऐसा होता है तो यह राष्ट्रीयता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक अनुकरणीय एवं सराहनीय पहल होगी। ऐसा होने से महात्मा गांधी, गुरु गोलवलकर और डॉ. राममनोहर लोहिया का सपना साकार हो सकेगा।

दुनिया में जितने भी देश महाशक्ति के दर्जे में आते हैं, उनकी अदालतों में मातृभाषा चलती है। यूरोपीय देशों में जैसे-जैसे शिक्षा व संपन्नता बढ़ी, वैसे-वैसे राष्ट्रीय स्वाभिमान प्रखर होता चला गया। रूस, चीन, जापान, वियतनाम और क्यूबा में भी मातृभाषाओं का प्रयोग होता है। लेकिन भारत और भारतीय अदालतें कोई सबक या प्रेरणा लिए बिना अंग्रेजी को स्वतंत्रता के 74 साल बाद भी ढोती चली आ रही हैं। अदालतों को अब इस भाषायी रंगभेद की दासता से मुक्त होने की जरूरत है। नेता हो या जनता- हिन्दी की यह दुर्दशा एवं उपेक्षा सोचनीय है। अत्यन्त सोचनीय है। खतरे की स्थिति तक सोचनीय है कि आज का तथाकथित नेतृत्व दोहरे चरित्र वाला, दोहरे मापदण्ड वाला बना हुआ है। उसने कई मुखौटे एकत्रित कर रखे हैं और अपनी सुविधा के मुताबिक बदल लेता है, यह भयानक स्थिति है। इसी कारण हिन्दी को आज भी दोयम दर्जा हासिल है।

हिन्दी को उसका गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के लिये नरेन्द्र मोदी एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी के प्रयत्नों को राष्ट्र सदा स्मरणीय रखेगा। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने सितंबर 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण देकर न केवल हिन्दी को गौरवान्वित किया बल्कि देश के हर नागरिक का सीना चौड़ा किया। भारत और अन्य देशों में 70 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। पाकिस्तान की तो अधिकांश आबादी हिंदी बोलती व समझती है। बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अफगानिस्तान में भी लाखों लोग हिंदी बोलते और समझते हैं। फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद जैसे देश तो हिंदी भाषियों द्वारा ही बसाए गये हैं। हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी भारत में प्रत्येक स्तर पर इसकी इतनी उपेक्षा क्यों? शेक्सपीयर ने कहा था- ‘दुर्बलता! तेरा नाम स्त्री है।’ पर आज शेक्सपीयर होता तो आम भारतीय एवं सरकारों के द्वारा हो रही हिन्दी की उपेक्षा के परिप्रेक्ष्य में कहता- ‘दुर्बलता! तेरा नाम भारतीय जनता एवं शासन व्यवस्था है।’ क्योंकि दुनिया में हिन्दी का वर्चस्व बढ़ रहा है, लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं होना, इन्हीं विरोधाभासी एवं विडम्बनापूर्ण परिस्थितियों को ही दर्शाता है।

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