Categories
राजनीति

मौन पी.एम. बनाम बोलने वाला पी.एम.

हम एक अद्भुत युगांतरकारी घटना के साक्षी बन रहे हैं, जब एक लादे गये प्रधानमंत्री के लिए इतिहास अपना अध्याय बंद कर रहा है, और उसी समय इतिहास नई आशाओं के साथ अपनी आंखें खोलते हुए नया सवेरा होने की अनूभूति करा रहा है। हम अवसान और उत्थान का अदभुत मिलन देख रहे हैं। हम अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ रहे हैं। नयी संतति अपने हाथ में नये भारत के निर्माण का परचम लेकर मैदान में उतर चुकी है। भारतीय संस्कृति में 16 संस्कार प्रमुख माने जाते हैं। हम भी सोलहवीं लोकसभा का सोलहवां चुनाव संपन्न कर रहे हैं। यह सोलहवां चुनाव किसी के लिए ‘अंतिम संस्कार’ बनने जा रहा है, तो किसी के लिए ‘नव-सृजन’ का एक महान संयोग बनने जा रहा है।
देश की बागडोर इस समय डा. मनमोहन सिंह के हाथ में है। उन्हें लोगों ने ‘मंद मोहन’ ‘मौन मोहन’ ‘बेअसरदार सरदार’ और ऐसे ही उन विशेषणों से संबोधित किया जिनसे उनकी छवि एक कमजोर प्रधानमंत्री की बनी। उनका जन्म 26 सितंबर 1932 को अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ था। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से 1948 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। 1957 में उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की उपाधि प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। ऑक्र्सफोर्ड विश्वविद्यालय के न्यू फील्ड कालेज से 1962 में उन्होंने अर्थशास्त्र में डी-फिल किया। वह भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर रहे। नरसिम्हाराव मंत्रिमंडल में वह वित्तमंत्री रहे और वैश्वीकरण के संदर्भ में उन्होंने भारत को एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया। 22 मई 2004 को वह भारत के 14वें प्रधानमंत्री बने। अब मई के माह में ही उनका अवसान होने जा रहा है। वह मौन रहकर गद्दीनशीन हुए थे, मौन रहकर ही अपना समय काटते रहे और मौन रहकर ही अब देश की जनता उन्हें संन्यस्त करा रही है। वह ईमानदार रहकर बेईमानों के सरताज रहे, सरपरस्त रहे और एक ऐसे नेता रहे कि जिन्हें कभी उनके अपनों ने भी अपना नेता नही माना।
डा. मनमोहन सिंह के रहस्यमयी मौन ने देश की फिजाओं में नेता की खोज का एक अभियान सा चला दिया। उनका मौन जितना गहराता था, उतना ही नेता की खोज का भारतीय जनता का अभियान और भी अधिक तेज होता जाता था। देश की जनता एक बोलता हुआ प्रधानमंत्री चाहती थी, वह ‘रोबोट पी.एम.’ को अपने लिए अभिशाप मान रही थी। परंतु तब देश का बड़ा विपक्षी दल भाजपा अपनी ओर से नेता परोसने में असफल हो रहा था। वह उन लोगों को आगे कर रहा था जिनके माथे या तो जिन्ना की मजार पर जाकर झुककर देश के माथे पर कलंक लगा गये थे या कंधार में जाकर आतंकवादियों को दामाद की सी खातिरदारी करते हुए जाकर सौंपते हुए देश को अपमानित कराने से भी नही चूके थे। इसलिए जनता निराश होकर उस दल से पीछे हटी और हताशा में सत्ता पुन: एक ‘उदास चेहरे’ के हाथों में सौंप दी। उदास चेहरे को सत्ता सौंपते समय देश की जनता को अधिक खुशी नही हुई। इसलिए मतदान में भी लोगों ने अधिक सक्रियता से भाग नही लिया। मजबूरी में सत्ता के लिए चुनाव में जनता ने भाग लिया यदि उस समय 2009 में देश की जनता से यह पूछा जाता कि कितने लोग वर्तमान नेताओं को देश की बागडोर सौंपने को अच्छा मानते हैं, तो परिणाम इन नेताअेां को सचमुच निराश ही करते।
देश में राजनैतिक निराशा के माहौल में 2009 के चुनाव हुए और देश की राजनीति का पारा शून्य से भी नीचे चला गया। ठंडक इतनी बढ़ी कि देश की चुनावी सभाओं में थोड़ी गरमाहट लाने के लिए सिने तारिकाओं का सहारा देश के राजनीतिज्ञों को लेना पड़ा। जिससे पता चलता था कि देश के राजनीतिज्ञों से लोग किस सीमा तक दुखी और निराश हैं? नेता की खोज में 2009 का चुनाव संपन्न हो गया।
अब भाजपा को लगा कि ‘चले हुए कारतूसों’ से शत्रु का सीना शांत नही किया जा सकता। इसलिए उसने अपनी रणनीति में परिवर्तन करना आरंभ किया। जनता ने अपनी मिट्टी की सौंधी-सौंधी गंध से निर्मित होते मोदी को गुजरात से निकालकर दिल्ली की ओर बढऩे का संकेत दिया। मोदी का सितारा गांधीनगर से ‘धूमतारे’ की भांति रोशनी बखेरने लगा। दिल्ली की गद्दी हिली और उसके बूढ़े ‘जफर’ की नींद खुली। उधर भाजपा ने देखा कि भाजपा से अलग और भाजपा से ऊपर एक मोदी का अवतरण हो चुका है। जनता उसे कंधों पर उठाकर गांधीनगर से दिल्ली की ओर चल दी है। व्यापक जुलूस है और बड़े-बड़े जलसे हो रहे हैं। समय ही नजाकत को राजनाथ सिंह ने समझा और इससे पहले कि कुछ होता भाजपा का विलय मोदी के व्यक्तित्व में कर दिया।
आज वही मोदी, ‘मोदी इज भाजपा’ और ‘भाजपा इज मोदी’ का सम्मान पा चुके हैं। देश का राजनीतिक माहौल बड़ा गरम है। पारा बढ़ता ही जा रहा है। नेताओं के मंच पर कहीं कोई सिने तारिका नही दीख रही है। ‘बंपर मतदान’ देश में हो रहा है। लगता है कि देश की जनता द्वारा नेता खोजने का संकल्प अब पूर्ण होने ही वाला है। बंपर मतदान बता रहा है कि जब देश की जनता के अनुसार चुनाव लड़े जाते हैं तो उसका उत्साह लोकतंत्र के इस चुनावी पर्व को और भी अधिक रंगत प्रदान करता है और जब जनभावना का सम्मान नही किया जाता है तो जनता नेताओं की ओर से मुंह फेर लेती है। अब मौन प्रधानमंत्री से छुटकारा पाकर बोलते हुए प्रधानमंत्री को जनता चुन रही है। ये चुनाव इसी बात के लिए याद किये जाएंगे जिनके परिणाम देश को नई दिशा और नयी दशा देंगे।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version