Categories
विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा

गतांक से आगे…..
सोमक साहदेव्य
इसी प्रकार का दूसरा अलंकार ऋग्वेद 4-15 में आए हुए सोमक: साहदेव्य: के विषय का है। जिस पर यहां थोड़ा सा प्रकाश डालने की आवश्यकता है। रायबहादुर चिंतामणि विनायक वैद्य एम.एम. लिखते हैं कि ये सोमक सहदेव महाभारत कालीन व्यक्ति हैं।
महाभारत मीमांसा पृष्ठ 107 पर वैद्य जिन सहदेव सोमक का जिक्र करते हैं, वे चंद्रवंशी ही हैं। किंतु ऋग्वेद 4-15 में आए सोमक सहदेव दूसरे ही हैं। इन मंत्रों के साथ उस घटना का मिलान उचित नही है। वह घटना दूसरी ही है। इन मंत्रों में तो किरणों का और अश्विनों देवताओं का संबंध सोमक सहदेव के साथ लगाया गया है। किरणें और अश्विनों आकाशीय पदार्थ हैं, इसलिए ये हरिवंश अध्याय 62 के सहदेव सोमक नही है। जिन मंत्रों से वैद्य महोदय को यह भ्रम हुआ है वे मंत्र अर्थसहित नीचे लिखे जाते हैं।
बोधद्यन्मा हरिभ्यां कुमार: साहदेध्य:। अच्छा न हूत उदरम्।
उत त्या यजता हरी कुमारात्साहदेव्यात। प्रयता सद्य आ ददे।
एष वां देवावश्निा कुमार: साहदेव्य:। दीर्घायुरस्तु सोमक:।
तं युवं देवाश्विना कुमारं साहदेव्य्। दीर्घायुषं कृणोतन।
अर्थात जब सहदेव के पुत्र ने मुझे दो किरणों के साथ कर दिया तब मैं बुलाये ही तरह हाजिर हो गया। मैंने उस सहदेव पुत्र से उन दोनों किरणों को शीघ्र ग्रहण कर लिया है। हे अश्विनो, देवताओ सहदेव का यह सोमक आपके लिये दीर्घजीवी हो। हे अश्विनो देवताओ उस युवा सहदेव के सोमक को दीर्घायु कीजिए।
अश्विनो के द्वारा चंगे होने वाले सदैव आकाशी ही पदार्थ होते हैं। ये अश्विनो देवताओं के वैद्य हैं। जिस प्रकार त्वष्टा देवताओं के बढ़ई और इंद्र देवताओं के राजा हैं, उसी प्रकार अश्विनो देवताओं के वैद्य हैं। न इंद्र आदि राजा ही मनुष्य हैं, न उनकी प्रजा देवता ही मनुष्य हैं, न उनके वैद्य ही मनुष्य हैं और न उनके सोमक सहदेव रोगी ही मनुष्य हैं। वैद्यक में तो सहदेव सोमक दवा के नाम हैं।
इस शांतनु नामी धान्य के गुण इस प्रकार है-
उष्णा: कषायमधुरा रूक्षा: कटुविपाकिन:। श्लेष्मघ्ना बद्घनिस्यन्दा वातपित्तप्रकोपणा:।।
काषायमधुरस्तेषां शीत: पितापह: स्मृत:। कोद्रवभ सनीवार: श्यामाकक्ष सशांतनु:।।
कहने को तो कोई भी यह सकता है कि यजुर्वेद में आई हुई अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका भी महाभारत कालीन रानियां हैं। पर वेद में तो औषधियों की ही वाचक हैं। वेदों की ऐसी घटनाएं समझने के लिए यहां हम इस विषय को भी लिखना चाहते हैं।
अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका
वेद में दवा को अम्ब कहा गया है। यजुर्वेद 12। 76 में लिखा है कि शतं वोअम्ब धामानि….इमं मेअगवं कृषि। अर्थात हे अम्ब! मुझे आरोग्य कीजिए। यहां रोगी आरोग्य होने के लिए अम्ब दवा से कहता है। दूसरी जगह उक्त तीनों अम्बाओं दवाओं का होम करना भी कहा गया है। वहां लिखा है कि सह स्वस्राम्बिकया तं जुषस्व।
इनमें साफ कह दिया है कि अम्बिका को बहनों के साथ हवन करो। यजु. (3/60) में भी कहा गया है कि त्रयम्बकं यजामहे सुगंधि पुष्टिवर्धनम अर्थात तीनों अम्बाओं को मैं सुगंधि और पुष्टि बढ़ाने के लिए हवन करता हूं। इन तीनों औषधियों को यजुर्वेद में कहा है कि-
अम्बेअम्बिकेअम्बालिके न मा नयति कश्वन।
ससस्त्यश्वक: सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम।
यहां उक्त तीनों को एक ही जगह कह दिया है। इसके सिवा यह भी बतला दिया कि वे काम्पील में होती है। काम्पील से महाभारत की उक्त कन्याओं का कुछ भी संबंध नही था। वे तो काशीनरेश की कन्यायें थीं और हस्तिनापुर में ब्याह कर आई थी। अत: यह काम्पील या काम्पिल्य फर्रूखाबाद जिले वाला कम्पिला नही है। काम्पील नाम एक औषधि का है, जिसके साथ ही अम्बिका आदि दवाइयां उगती हैं।
अब देखना चाहिए कि बैद्यक में उक्त औषधियों का जिक्र है या नही। भावप्रकाश में लिखा है कि
माचिका प्रथिताम्बष्ठा तथाम्बाअम्बालिका।
अब सिद्घ हो गया है कि यजुर्वेद में महाभारत कालीन कन्याओं और रानियों का जिक्र नही है, प्रत्युत वहां ये औषधियों के नाम हैं।
जिस प्रकार यह दवाओं का वर्णन है उसी तरह सोमक: साहदेव्य: का भी वर्णन औषधियों के ही लिए हुआ है। अन्यथा सूर्यवंशी अम्बरीष के साथ चंद्रवंश सहदेव का नाम क्यों आता? यह ऋग्वेद वाले मंत्र में कहा गया है कि पानी के बिना अम्बरीष आमड़ा का वृक्ष और सहदेव सहदेई का वृक्ष भयमान होते हैं। इस तरह से हमने यहां तक चंद्रवंश के कतिपय राजाओ के नामों को जो वेदों में पाये जाते हैं, उन्हीं मंत्रों के अन्य शब्दों से जांचा और पुराणोक्त चमत्कारिक वर्णनों से मिलाया, तो वे राजा नही-मनुष्य नही, प्रत्युत सृष्टि के कुछ अन्य ही पदार्थ सिद्घ हुए। हमें तो ताज्जुब है कि जो लोग इन शब्दों से राजाओं का अर्थ ग्रहण करते हैं वे उन्हीं मंत्रों में आए हुए अन्य शब्दों का क्या अर्थ करते होंगे? सहदेव और सोमक को पुरू आदि पांचों भाईयों को तथा अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका को एक ही जगह देखकर शायद कोई इतिहास प्रेमी हठ करे कि यह घटना अलौकिक नही है। उनसे निवेदन है कि वे जरा संसार की शैली पर ध्यान दें। वेद में कृष्ण और अर्जुन एक ही जगह आए हैं। पर दूसरी ही जगह अहश्च कृष्ण महरर्जुनंच कहकर वेद में ही बतला दिया है कि दोनों का अर्थ दिन है। यहां लोक में दोनों पुरूषों की अटूट मित्रता से ही कृष्ण अर्जुन नाम रख दिये गये हैं। क्रमश:

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
otobet giriş
xslot giriş
otobet giriş
otobet giriş
otobet giriş
betyap giriş
betyap giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
betpark giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot
xslot
hititbet