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विशेष संपादकीय वैदिक संपत्ति

मनुष्य का आदिम ज्ञान और भाषा-19

गतांक से आगे…..

कानपुर में हमारे मित्र पं. बेनीमाधवजी प्रसिद्घ पंडित हैं। आपके चार पुत्र थे, चारों के नाम आपने राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न रक्खे थे, जिनमें राम और लक्ष्मण अब तक चिरंजीव हैं। प्रयाग जिले के बघेला ताल्लुकेदार कुंवर भरत सिंह जी यूपी में सैशन जज थे। वे चार भाई थे। चारों के नाम राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न थे।

ये घटनाएं बतलाती हैं कि आदर्श शब्दों से ही लोग नामों का अनुकरण करते हैं। रामायण से जिस प्रकार राम लक्ष्मण नाम रखे गये और वेद से जिस तरह कृष्ण अर्जुन नाम रखे गये उसी तरह वेदों को ही देखकर सहदेव सोमक और अम्बा अम्बिका तथा पुरूद्रहा आदि नाम भी रक्खे गये हैं। मनुस्मृति में लिखा है कि वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक संज्ञाश्च निर्ममे अर्थात वेदों के शब्द पहले के और मनुष्यों के नाम बाद के हैं।

इस वर्णन से सहज ही ज्ञात होता है कि जिनको परिश्रम नही करना और जिन को पाश्चात्य विद्वानों के कथन पर वेद से अधिक विश्वास है, वे प्रभावित होने के कारण ही वेदों से इतिहास निकालने का श्रम करते हैं।

कृष्ण की बृजलीला और विभूतियां

एक दिन हमने भी वेदों से भागवत के दशम स्कंध की वे घटनाएं निकालना शुरू की थीं, जो श्रीकृष्णभगवान को कलंकित करती हैं। पर हमारे  इस खेल का अच्छा परिणाम निकला और भागवत तथा गीता से संबंध रखने वाली दो बड़ी घटनाओं पर बहुत बड़ा प्रकाश पड़ा। पहले हम वे मंत्रांश एकत्रित करते हैं, जिनसे कृष्ण की ब्र्रजलीला दिखलाई पड़ती है।

1. स्तोत्रं राधानां पते।

2. गवामप ब्रजं वृषि।

3. वासपत्नीरहिगोपा अतिष्ठन।

4. त्वं मृचक्षा वृषभानु पूर्वी: कृष्णास्वग्ने अरूवो वि भाहि।

5. तमेददधारय: कृष्णासु रोहिणीषु।

6. कृष्णा रूपाणि अर्जुना बि वो मदे।

इनमें राधा, गौ, ब्रज, गोप, वृषभानु, रोहिणी, कृष्ण और अर्जुन सभी मंडली एकत्रित हो गयी है। इसी मंडली के आधार पर भागवत की  रचना हुई है। पर इन मंत्रों में आये हुए अन्य शब्दों को जब देखोगे तो पता लगेगा, कि ये सब आकाशीय पदार्थ हैं।

ऋ. 6। 9 । 1 में कहा है कि अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च अर्थात अर्जुन और कृष्ण दोनों दिन के नाम हैं। इसी तरह राधा, धन और अन्न को कहते हैं। गो, किरणें हैं और व्रज किरणों का स्थान द्यौ है। और भी सब इसी प्रकार के आकाशीय पदार्थ हैं। वेदों के इस कृष्णार्जुन अलंकार से ही भागवत और गीता का यह स्थान बनाया गया है, जिसमें कृष्ण ने अपनी विभूतियों का वर्णन किया है कि वृक्षों में पीपल मैं हूं इत्यादि। ऋग्वेद में सूर्य, इंद्र और विद्युत अर्थात आकाशस्य आश्नेय शक्तियां कहती हैं कि-

अहं मनुरवं सूर्यश्चाहुं कबीवां ऋविरस्मि विप्र:।

अहं कुत्वामाहुश्रेमं त्वञ्छेअहं कविष्क्षवा पश्यता मा।

अर्थात हम मनु, सूर्य, कक्षीवान, उशना आदि पदार्थ हैं। शुक्र की टेढ़ी चाल भी हम ही हैं। यहां गीता का यह वाक्य भी कि कवियों में उशना कवि मैं हूं स्पष्ट हो जाता है। वह उशना कोई मनुष्य नही है। उशना नाम शुक्र का है। इसकी चाल बड़ी टेढ़ी बांकी होती है। वेद में नक्षत्रों की इस चाल को काव्य कहते हैं। पश्य देवस्य काव्यं यह वाक्य नक्षत्र काव्यं के लिए कहा गया है। इसलिए जो प्रकाश कृष्ण और अर्जुन है, वही उशना काव्य भी है महाभारत आदि. 4177 में लिखा है कि उशनस्य दुहिता देवयानी अर्थात देवयानी उशना की लड़की है। इससे और भी स्पष्ट हो गया कि उशना शुक्र ही है। इस प्रकार से भागवत की ब्रजलीला और गीता की विभूतियां सूर्य, किरण, वर्षा, अन्न, प्रकाश, ग्रह ग्रहगति और विद्युत आदि ही है। इन वैदिक वर्णनों को शब्दसाम्य के कारण कथाओं के रूप में लिखकर पौराणिक कवियों ने व्यर्थ ही बात का बतंगढ़ बना दिया है।

हमने कहा तो था कि एक खेल पर सुलझ गई यह उलझन कि भागवत और गीता किस प्रकार वेद के अलंकारों से कथाओं की सृष्टि करते हैं। हमारे कहने का मतलब सिर्फ यह है कि पुराणों में असंभव कथाएं जो लिखीं हैं वे वेद के आकाशीय वर्णन हैं, जिनको तत्नाम वाले राजाओं के साथ मिला दिया गया है। यहां तक हमने चंद्रवंश से संबंध रखने वाले राजाओं का वर्णन किया। अब सूर्यवंश के राजाओं के भी दो नमूने देख लेने चाहिए।

राजा इक्ष्वाकु

पुराणों में सूर्यवंश का मूल पुरूष मनु है और उसका आदि पुरूष राजा इक्ष्वाकु है। मनु शब्द भी वेदों में आया है पर वह अहं मनुरभवं सूर्यश्राहं के अनुसार आकाशस्य पदार्थ ही है। इक्ष्वाकु शब्द ऋग्वेद में एक ही जगह आया है। यस्य इक्ष्वाकु उप व्रते रेवानू मरायी एधते। दिवि इव पंच कृष्टय: यहां रायी, दिवि और कृष्टय शब्द हैं इनसे ज्ञात होता है कि इक्ष्वाकु कोई कृषि संबंधी वस्तु है। अर्थववेद में साफ कह दिया गया है कि वह औषधि है-

यं त्वा वेदपूर्व इक्ष्वाको यं वा त्वा कुष्ठ काम्य:

यं वा वसो यमात्स्यस्तेनासि विश्वभेवज:।।

अर्थात जिसको लोग इक्ष्वाकु जानते हैं, कुष्ठकाम्य जानते हैं और खाद्य जानते हैं, ऐसी तू सर्वौषधि है। सुश्रुत सूत्र अ. 4417 में लिखा है कि इक्ष्वाकु कटुतुम्बिका अर्थात इक्ष्वाकु कुटुतुम्बी है।

इक्ष्वाकुकुसुमचूर्ण वा पूर्ववदेव क्षीरेण,

कासश्वासच्छर्दिकफरोगेषु उपयोग:

अमरकोष में भी इक्ष्वाकु कुटुतुम्बी स्यात लिखा हुआ है। इससे ज्ञात होता है कि ऋग्वेद में धन और कृषि से संबंध रखने वाली यह अथर्ववेद की भेषज भी औषधि ही है। इसको राजा या मनुष्य बनाने की बिलकुल गंंजाइश नही है।

क्रमश:

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