वैदिक संपत्ति: विदेशियों का भारत आगमन

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गतांक से आगे…
अर्थात वशिष्ठ की नंदनी गौ की कथा के पूर्व ही मलेच्छ जातियों ने द्रविड़ देश आबाद कर दी लिया था। वाल्मीकि रामायण और महाभारत के इन दोनों प्रमाणों से इनका ऑस्ट्रेलिया से आना सिद्ध होता है। इन प्रमाणों के अतिरिक्त इनकी भाषा, रूप ,गठन आदि के मिलन से पाश्चात्य विद्वानों ने भी निश्चित कर दिया है कि ऑस्ट्रेलियानिवासी ही है। भारत वर्ष के इतिहास में ई०मार्सडन बी ए लिखते हैं की,कुछ लोग ख्याल करते हैं कि द्रविड़ लोग दक्षिण से आए, अथवा उस देश से आए ,जो अब दक्षिणी महासागर में डूब गया है और दिखलाई नहीं पड़ता। या उन टापूओं से आए, जो एशिया और ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्व में जुड़े थे और अब समुंदर में डूब गए हैं। इसी तरह मिस्टर मैनिंग अपने ‘प्राचीन और मध्यन्तरीय भारत’ नामी ग्रंथ में अनेक विद्वानों की सम्मतियों को उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि मिस्टर नॉरिस कि सम्मति है कि द्रविड़ भाषाएं सब एक दूसरे से संबंध रखते हैं ।

इतना ही नहीं, प्रत्यूत वे आगे बढ़कर यह कहते हैं कि द्रविड़ और ऑस्ट्रेलिया की भाषाओं में निश्चित रूप से घनिष्ठ संबंध है। मिस्टर जान हटट भी जो बहुत दिनों तक आस्ट्रेलिया में रहे हैं , वे भी इसी तरह कहते हैं। साथ ही डॉक्टर रोस्ट का भी यही विचार है। वे भी कहते हैं कि ऑस्ट्रेलियानिवासी ,मंगोलियनओ और भारतीय द्रविड़ो की भाषा के व्याकरण का सांचा बिल्कुल ही एक है। मिस्टर क्लैडवेल कहते हैं कि इसमें जरा भी संदेह नहीं की सीलोन- लंका – से आकर लोगों ने दक्षिणी ज़िले में निवास किया हैं। इन प्रमाणों से अच्छी तरह प्रकट हो जाता है कि यह द्रविड़ दक्षिणी टापू के अर्थात आस्ट्रेलिया आदि के रहने वाले हैं। इन्हीं को यहां वाले असुर,राक्षस ,नाग ,महिष और कपि कहते थे। इनके यह नाम अनन्यावश नहीं रखे गए थे, किंतु इनके कर्म ही इस प्रकार के थे। यह बात बहुत पुराने जमाने से प्रसिद्ध है कि इन असुरों ,राक्षसों, यक्ष, रक्ष और पिशाचों का स्वभाविक खाना-पीना मांस, मद्य था । मनुस्मृति अध्याय 11 श्लोक 95 में लिखा है कि ‘ यक्षरक्ष:पिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवस’ अर्थात मद्य मांस आदि अभक्ष्य पदार्थ ही यक्ष और पिशाचओ का अन्न है। इसी तरह वाल्मीकि रामायण में लिखा है यह मनुष्य मांस खाने वाले राक्षस दंडकारण्यवासी मुनियों को खा जाते हैं। इन्हीं लोगों में से मारीच और सुबाहु विश्वामित्र के यज्ञ में क्या-क्या कृत करते थे यह भी देखने योग्य है। वाल्मीकि रामायण बाल कांड 19/6 में लिखा है कि ‘ तौ मांसरूधिरौघेण वेदिं तामभ्यवर्षताम् ।’ अर्थात मांस और रुधिर से यज्ञवेदी को पाट दिया था । विश्वामित्र रामचंद्र से कहते हैं कि ‘ इमो जनपदों नित्यं विनश्यति राघव।’ अर्थात हे रामचंद्र इन लोगों ने इसी तरह इन दोनों राज्यों का सत्यानाश कर दिया है। इसी तरह रामचंद्र जिस समय दंडकारण्य में पहुंचे उस समय भी वहां के तपस्वीयों ने उनसे कहा हे रामचंद्र! अरणय में अत्यंत क्रूर और मनुष्य भक्षक लोग रहते हैं। वे हम तपस्वी और ब्रह्मचारीयों को मारकर खा जाते हैं । अतः किसी प्रकार इनका निवारण कीजिए। रामचंद्र को एक दिन इनमें से विराध नामक एक राक्षस मिला । वह चर्बी और रूधिर से सना हुआ व्याघ्रचर्म पहने हुआ था । इसी तरह एक दिन ऋषियों ने रामचंद्र को अस्थियों का 1 ढेर दिखाकर कहा था ।
क्रमशः

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