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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

मोदी के आंसू:हिन्दुत्व की राजनीति के मोती

कभी आंसू बन जाते हैं तकदीर,
कभी आंसू मिटा देते हैं तस्वीर।
आंसुओं का भी अपना इतिहास है,
कभी इनसे घबराती है शमशीर।
बादल गरजता है बरसता है,
पर पपीहा एक बूंद को तरसता है।
हृदयाकाश में उठे गर नेकनीयती की बदरिया,
तो आंसू ‘मोदी के मोती’ बनकर झरता है।।

20 मई को भाजपा के नवनिर्वाचित सांसदों की बैठक संसद में हो रही थी। भाजपा के लिए ये दिन सचमुच गौरव और गर्व की अनुभूति कराने वाला था। संघर्ष और सतत संघर्ष के पश्चात आज अपने बलबूते पर पार्टी देश की सरकार बनाने का सौभाग्य प्राप्त कर रही है-इसलिए प्रसन्नता का विषय था। तभी भाजपा के और देश के नायक बनकर उभरे नरेन्द्र मोदी का संसद में प्रवेश होता है। मोदी लोकतंत्र के पावन मंदिर के दरवाजे पर पहुंचते हैं, पहला कदम मंदिर की दहलीज पर रखते हैं,तो मंदिर के पुजारी को अपने कत्र्तव्य धर्म का बोध होता है कि पहला कदम कैसे रखा जाए? मोदी को उत्तर खोजने में तनिक भी देर नही लगी। मोदी अचानक नतमस्तक हो घुटने टेक मंदिर की दहलीज में बैठे गये। मोदी को झुका देखकर सारे सुरक्षाकर्मी सकते में आ गये। मोदी ने राष्ट्र मंदिर के आराध्यदेव सनातन राष्ट्र के गौरव को नमन किया और ईश्वर से प्रार्थना की कि इस सनातन राष्ट्र के गर्व-गौरव को बढ़ाने की मुझे शक्ति और सामथ्र्य देना। प्रार्थना पूर्ण हुई। मोदी राष्ट्र मंदिर में प्रविष्ट हुए। सभी उपस्थित नवनिर्वाचित सांसदों ने मोदी का भव्य स्वागत किया। पार्टी के वयोवृद्घ और कर्मठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया, पर उससे पहले आज के इस गौरवमयी और आनन्दानुभूति कराने वाले क्षणों के दिलाने में मोदी के महत्वपूर्ण योगदान को दृष्टिगत रखते हुए आडवाणी कह गये कि आज हम जो कुछ भी हैं, वह मोदी की ‘कृपा’ से हैं।
मोदी ने इस ‘कृपा’ शब्द को पकड़ लिया। जब उनके बोलने का समय आया तो उन्होंने अपने भाषण का आरंभ ही आडवाणी के ‘कृपा’ शब्द पर बोलने से किया। उन्होंने कहा कि आडवाणी जी ने एक शब्द कहा-कृपा।…..और इससे आगे मोदी मनुष्य की अमर कान्ति के मोती अर्थात आंसुओं के प्रवाह में बह गये। वह शब्द ढूंढ़ रहे थे-पर हृदय से धर्म का बांध टूटे ही जा रहा था, नैतिकता मर्यादा, उच्च मानदण्ड और भारत की ऐतिहासिक परंपरा के सारे मानवीय मूल्यों का इतना तीव्र प्रवाह मोदी के अन्तस्तल में उठ रहा था कि जिस व्यक्ति को लोग ‘निर्मम प्रशासक’ कहते रहे या मानते रहे, आज उसे मोम बनकर पिघलता देखकर सब अचंभित रह गये। सारा वातावरण आंसुओं से भीग गया। देश के करोड़ों लोगों ने यह दृश्य देखा तो उनमें से बहुत से अपने आंसुओं को रोक न ही पाये।
मोदी के आंसुओं में सहजता थी, सरलता थी आत्मीयता थी और बड़ों के प्रति सम्मान का उत्कृष्ट भाव था। इसलिए मोदी के मोतियों का सबने मूल्य समझा और हृदय की भाषा सीधे हृदय में जाकर ऐसे बैठी कि चट्टानों को भी बरफ की तरह पिघलने के लिए विवश कर गयी। वस्तुत: राजनीति भाव शून्य नही होती,राजनीति मूल्य विहीन भी नही होती, राजनीति केवल औपचारिकताओं और राजनीति बीते हुए ‘भीष्म पितामहों’ के हृदयों पर पैर रखकर चलने का एक निर्मम पथ भी नही होती। इसके विपरीत राजनीति में भावनाएं प्रथम पूज्यनीय होती हैं, क्योंकि सबकी भावनाओं के उचित सम्मान के लिए ही राजनीति ने विश्व में अपना पहला कदम रखा था। वह राजनीति राजनीति नही होती जो दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाये या उनके साथ खिलवाड़ करे। राजनीति के अपने मूल्य हैं और उन मूल्यों में सबसे बड़ा मूल्य है मानवतावाद का प्रचार प्रसार करना। इसी मानवता में राज्य का पंथ निरपेक्ष स्वरूप, प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने की राज्य की जिम्मेदारी आदि इस प्रकार समाहित हैं कि मानव का मानवतारूपी धर्म राजनीति के कत्र्तव्य पथ के साथ इस प्रकार एकाकार हो जाता है कि राजनीति और धर्म को अलग-अलग करके देखने का औचित्य ही असफल हो जाता है। यद्यपि भारत में राजनीति और धर्म को अलग-अलग करके देखने का अनीति -परक प्रयास किया जाता रहा है। इसलिए राजनीति को भावशून्य और हृदयहीन माना गया। यही कारण है कि राजनीति को भाव प्रधान मानने वाले इस देश में अब से पूर्व किसी प्रधानमंत्री ने संसद के दरवाजे पर घुटनों के बल बैठकर अपना मस्तक नही टेका और संसद के भीतर स्वयं को ‘कृपा’जैसे महिमामंडित करने वाले शब्दों पर इतनी विराट अहंकार शून्यता का प्रदर्शन नही किया कि जिसे देखकर सारा देश ही रो पड़े। सचमुच नेता केा इतना ही उदार हृदयी और अहंकार शून्य होना चाहिए।
मोदी ने पहली बार राजनीति को उसका वास्तविक धर्म समझाया है कि ‘भीष्म पितामहों’ के अनुभवों का यदि लाभ नही उठाया और उन्हें समुचित सम्मान नही दिया तो उसके अभिशाप से पुन: ‘महाभारत’ का साज सज सकता है। सम्मान के पात्र लोगों को और प्रतिष्ठानों को सम्मान मिलना ही अपेक्षित है। इसलिए मोदी ने बड़ी श्रद्घा और आत्मीयता से अहंकारशून्यता का प्रदर्शन करते हुए अपना मस्तक भाजपा के वयोवृद्घ नेता आडवाणी के श्रीचरणों में झुका दिया और ‘मृत्यु शैय्या’ पर बड़े भीष्म अटलजी को भी बड़े सम्मान के साथ याद किया। जब मोदी राजनीति के इस निर्मम जंगल में ऐसे मानदण्डों के या मूल्यों के छायादार पौधे लगा रहे थे,तो उसी समय मोदी के आगमन से भाजपा के भीतरी अंतकर्लह की काल्पनिक दीवारें धड़ाधड़ गिर रही थीं, सारे संदेहों का और मीडिया में व्याप्त भ्रांतियों का बड़ी तेजी से निवारण भी हो रहा था। हिन्दुत्व की वास्तविकता विमल राजनीति के दर्शन हो रहे थे और लग रहा था कि स्वातंत्रय वीर सावरकर का वह सपना अपना मूत्र्तरूप लेने लगा था जिसमें उन्होंने राजनीति का हिंदूकरण करने का संकल्प व्यक्त किया था।
मोदी ने यह सच ही कहा था कि आज जिस ऊंचाई पर हम खड़े हैं उसके पीछे बीती चार पांच पीढिय़ों का संघर्ष है। तनिक स्मरण करें जब देश में 1875 में आर्य समाज की स्थापना हुई और उसके ठीक सात वर्ष पश्चात हिंदू महासभा का प्रथम अंकुर 1882 में हिंदूसभा के रूप में प्रस्फुटित हुआ तो अंग्रेजों को लगा कि ये दोनों राष्ट्रवादी संगठन तुम्हारी नींव को हिलाकर रख देंगे। इसलिए 1885 में इन दोनों राष्ट्रवादी संगठनों की कार्ययोजना की हवा निकालने के लिए इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना इस देश में की गयी। एक षडयंत्र के अंतर्गत इन दोनों संगठनों को अंग्रेजों ने 15 अगस्त 1947 को भारत की सत्ता का उत्तराधिकारी नही बनने दिया और सत्ता उस कांग्रेस को सौंप दी गयी जो उनके अपने मिशन को आजाद भारत में भी आगे बढ़ा सकती थी। यद्यपि मजहब के नाम पर विभाजित देश के पाकिस्तान नामक भूभाग का शासन यदि मुस्लिम लीग के हाथों जा सकता था तो भारत का शासन हिंदू महासभा जैसे हिंदूवादी संगठन के हाथों में आना चाहिए था।
अब 1875 से 2014 तक के इन 139 वर्षों में जिन पीढिय़ों ने भारत की पंथनिरपेक्ष और भावप्रधान, सामासिक संस्कृति और वैश्विक शांति के लिए समर्पित हिंदू राजनीति को साकार और सफल करने का ताना-बाना बुना है या उसके लिए संघर्ष किया है, आज उनके सपनों को साकार करने का समय है। मोदी से सचमुच बड़ी बड़ी अपेक्षायें हैं।
यह चुनाव विकास के नाम पर लड़ा गया दिखाया जा रहा है, पर यह भ्रांति है। सहारनपुर से अलीगढ़ तक भाजपा का परचम पश्चिमी उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक दंगों से दुखी लोगों ने विकास के नाम पर नही लड़ा है। अपितु अपने हो रहे ‘विनाश’ को रोकने की प्रत्याशा के साथ लड़ा है। भावनाओं को समझना चाहिए। उन्हें उपेक्षित कर अनावश्यक रूप से आत्महत्या के लिए प्रेरित करना फिर एक अन्याय होगा। दूसरे यह भी ध्यान रखा जाए कि ‘लव जिहाद’ से हमारा वही युवा दुखी है जो हमारी बेटियों को रोज ही किन्हीं भेडिय़ों की हविश का शिकार बनते देख रहा है, और उसने भी मोदी को विकास के नाम पर नही अपितु अपने भविष्य के इस सर्वनाश को रोकने की प्रत्याशा के साथ वोट दिया है। मोदी जिस विकास की राह पर देश को डालना चाहते हैं, उस राह पर खड़ी इन विनाश की झाडिय़ों का सर्वनाश करना भी उनका लक्ष्य होना चाहिए। इस समय उनके निर्मल, विमल और पवित्र व्यक्तित्व से देश अभिभूत है। हम आशा करते हैं कि वह देश की भटकी हुई राजनीति को नई दिशा और देश को नयी ऊंचाईयां देंगे।

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