हिंदुत्व को नई परिभाषा देने का एक सार्थक प्रयास है यशस्वी भारत

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ललित गर्ग

सूरज की एक किरण को देखकर सूरज बनने का सपना संजोने वाला महान होता है। वह और अधिक महान होता है, जो सूरज बनने का सपना देखकर परिपूर्ण सूरज बन जाता है। शताब्दियों के बाद कोई-कोई व्यक्ति ऐसा होता है। वह अपनी रोशनी से एक समूची परंपरा एवं संस्कृति को उद्भासित कर देता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में कुछ ऐसे विरल सरसंघचालक हुए हैं, संघ के सरसंचालकों की समृद्ध एवं शालीन परंपरा में वर्तमान का बहुचर्चित नाम है मोहन भागवत। उनकी विरलता या महत्ता के प्रमुख मानक हैं- सशक्त राष्ट्रीयता, हिन्दुत्व और लोकहितकारी प्रवृत्तियां। इन तीन सोपानों के आधार पर वे महत्ता के ऊंचे शिखर पर आरूढ़ हो गए। उन्होंने हिंदुत्व की नयी व्याख्याएं दी हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं हिंदुत्व को लेकर उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तक ‘यशस्वी भारत’ का दिल्ली में 19 दिसम्बर 2020 को विमोचन होने जा रहा है। यह केवल पुस्तक नहीं है बल्कि हिंदुत्व को समग्र परिवेश में समझने का एक आईना है। आज हिंदू शब्द की परिभाषा को फिर से परिष्कृत कर राष्ट्रीयता के साथ सम्बद्ध करना आवश्यक है और यह पुस्तक इस महत्वपूर्ण कार्य को करने का एक माध्यम है।
किताब में मोहन भागवत ने हिंदुत्व-दर्शन का निरूपण किया है, वह समग्र है, शाश्वत है, सार्वकालिक है, वह कोई कांच का नाजुक घर नहीं है कि आलोचना की बौछार से किरचें-किरचें होकर बिखर जाये। भागवत ने जिस सत्य को उजागर किया है, वह हजारों साल पहले भी सत्य था और आज भी उतना ही सत्य है। बल्कि नई परिस्थितियों एवं राजनीतिक स्थितियों के साथ उसकी उपयोगिता और अधिक बढ़ी है। क्योंकि भारत से निकले सभी संप्रदायों का जो सामूहिक मूल्यबोध है, उसका नाम ‘हिंदुत्व’ है। इसलिए संघ हिंदू समाज को संगठित, अजेय और सामथ्र्य-संपन्न बनाना चाहता है। इस कार्य को संपूर्णता तक पहुंचाना ही संघ का उद्देश्य है। इस किताब में मोहन भागवत के भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग विषयों पर दिये गये कुल 17 भाषणों का संग्रह है।
संघ और हिंदुत्व को लेकर अक्सर उद्देश्यहीन, उच्छृंखल एवं विध्वंसात्मक आलोचनाएं होती रही हैं लेकिन इस तरह की नीति के द्वारा किसी का हित सधता हो, तो ऐसा प्रतीत नहीं होता तथा न ही उससे संघ पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। संघ की ऐसी आलोचना करने वाले समय, शक्ति और अर्थ का अपव्यय करते हैं तथा अपनी बुद्धि के दिवालियापन को उजागर करते हैं। संघ न केवल देश बल्कि दुनिया का बहुचर्चित एवं सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन है। जो बहुचर्चित होता है उसका विरोध भी होता है। निरूद्देश्य एवं स्तरहीन विरोध, विरोधी विचारधाराओं एवं संगठनों की स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति, ईष्र्या एवं विध्वंस की नीति का स्वयंभू प्रमाण बन जाता है। संघ एवं मोहन भागवत की आलोचना करने वाले तथा उनके व्यक्तित्व पर कीचड़ उछालने वाले लोग एवं संगठन स्वयं को कमजोर अनुभव करते हुए भी समाज एवं राष्ट्र में प्रतिष्ठित होना चाहते हैं, वे ही ऐसी आलोचना करते हैं। उनकी आलोचनाएं एक जीवंत परंपरा को झुठलाने के असफल प्रयास ही रहे हैं। ऐसे लोगांे और संगठनों को सही तथ्यों की जानकारी देने की दृष्टि से ‘यशस्वी भारत’ किताब की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
भारत एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है और हिंदुत्व देश की पहचान का सार है। संघ स्पष्ट रूप से देश की पहचान को हिंदू मानता है क्योंकि राष्ट्र की सभी सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाएं इसी के सिद्धांतों से चलती हैं। भागवत के अनुसार ‘हिन्दुत्व’ ऐसा शब्द है, जिसके अर्थ को धर्म से जोड़कर संकुचित किया है। संघ की भाषा में उस संकुचित अर्थ में उसका प्रयोग नहीं होता। यह शब्द अपने देश की पहचान, अध्यात्म आधारित उसकी परंपरा के सनातन सत्य तथा समस्त मूल्य सम्पदा के साथ अभिव्यक्ति देने वाला शब्द है। संघ मानता है कि ‘हिंदुत्व’ शब्द भारतवर्ष को अपना मानने वाले, उसकी संस्कृति के वैश्विक व सार्वकालिक मूल्यों को आचरण में उतारना चाहने वाले तथा यशस्वी रूप में ऐसा करके दिखाने वाली उसकी पूर्वज परम्परा का गौरव मन में रखने वाले सभी 130 करोड़ लोगों पर लागू होता है।
मोेहन भागवत की खोजपूर्ण निगाहों ने अपने युग के पार देखकर जिस सत्य को पकड़ा, दुस्साहसी कालचक्र उसे किसी भी कोण से खण्डित नहीं कर पाया। उसने तो देश के हर उदारवादी एवं प्रबुद्ध विचारक एवं व्यक्ति को एक ठोस जमीन दी है, काश! चिन्तन का सिलसिला सही ढंग से सही दिशा में आगे बढ़ पाता तो राजनीतिक स्वार्थ, कट्टरपन व अलगाव की भावना, भारत के प्रति शत्रुता तथा जागतिक वर्चस्व की महत्वाकांक्षा, इनका एक अजीब सम्मिश्रण भारत की राष्ट्रीय एकात्मता के विरुद्ध काम नहीं कर पाती। देश व समाज को तोड़ना चाहने वाले, हमें आपस में लड़ाना चाहने वाले, इस शब्द को, जो सबको जोड़ता है, अपने तिरस्कार व टीका टिप्पणी का पहला लक्ष्य बनाकर अपना स्वार्थ साधते रहे हैं।
‘हिन्दू’ किसी पंथ, सम्प्रदाय का नाम नहीं है, किसी एक प्रांत का अपना उपजाया हुआ शब्द नहीं है, किसी एक जाति की बपौती नहीं है, किसी एक भाषा का पुरस्कार करने वाला शब्द नहीं है। मोहन भागवत के अनुसार ‘हिन्दू’ शब्द की भावना की परिधि में आने व रहने के लिए किसी को अपनी पूजा, प्रान्त, भाषा आदि कोई भी विशेषता छोड़नी नहीं पड़ती। केवल अपना ही वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा छोड़नी पड़ती है। स्वयं के मन से अलगाववादी भावना को समाप्त करना पड़ता है। भारत की विविधता के मूल में स्थित शाश्वत एकता को तोड़ने का घृणित प्रयास, हमारे तथाकथित अल्पसंख्यक तथा अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों को झूठे सपने तथा कपोलकल्पित द्वेष की बातें बता कर चलता रहा है। ’भारत तेरे टुकड़े होंगे’ ऐसी घोषणाएँ देने वाले लोग इस षड्यंत्रकारी मंडली में शामिल हैं। यह पुस्तक ऐसे लोगों को सावधान करती है।
मोहन भागवत जैसे महान व्यक्तित्व को निंदा के वातूल विचलित नहीं कर पाते और प्रशंसा की थपकियां प्रमत्त नहीं बना सकती। सभी सर संघचालकों ने निंदा एवं प्रशंसा दोनों को सहना सीखा है, सम रहना सीखा है। इसलिए संघ महान बना है। उस पर कीचड़ उछालने की जो हरकते होती रही हैं, वर्तमान में वे पराकाष्ठा पर पहुंच गयी हैं, पर इससे संघ का वर्चस्व कभी धूमिल होने वाला नहीं है। क्योंकि इसकी नीति विशुद्ध और सैद्धांतिक आधार पुष्ट है। विरोध करने वाले व्यक्ति और संगठन भी इस बात को महसूस करते हैं फिर भी जनता को गुमराह करने के लिए और मनोबल कमजोर करने के लिए जो व्यक्ति और संगठन उजालों पर कालिख पाते रहे हैं, इससे उन्हीं के हाथ काले होते हुए देखे गये हैं। ऐसे लोगांे को सद्बुद्धि आये, वे अपना समय एवं श्रम किसी रचनात्मक काम में लगाये तो राष्ट्र एवं मानवता की अच्छी सेवा हो सकती हैं। संघ ने स्तर का विरोध एवं आलोचना का हमेशा स्वागत किया है। उसकी तटस्थ समीक्षा के लिए संघ के द्वार हर क्षण खुले रहे हैं। ऐसी तटस्थ समीक्षाओं का निचोडऋ है ‘यशस्वी भारत’ पुस्तक। यह पुस्तक भारत को सशक्त बनाने का आह्वान है, जिसमें मोहन भागवत नेे विभिन्न मुद्दों पर संघ के दृष्टिकोण को समग्रता से विवेचित किया है। पुस्तक के प्रथम संस्करण का शीर्षक है- हिंदू, विविधता में एकता के उपासक। इसमें कहा गया है कि ‘हम स्वस्थ समाज की बात करते हैं, तो उसका आशय संगठित समाज होता है। हमको दुर्बल नहीं रहना है, हमको एक होकर सबकी चिंता करनी है। किताब में संघ के बारे में कहा गया है, हमारा काम सबको जोड़ने का है। संघ में आकर ही संघ को समझा जा सकता है। संगठन ही शक्ति है। विविधतापूर्ण समाज को संगठित करने का काम संघ करता है।
पुस्तक में राष्ट्रीयता को संवाद का आधार बताया गया है। संघ मानता है कि वैचारिक मतभेद होने के बाद भी एक देश के हम सब लोग हैं और हम सबको मिलकर इस देश को बड़ा बनाना है। इसलिए हम संवाद करेंगे। संघ का काम व्यक्ति निर्माण का है। व्यक्ति से समाज एवं समाज से राष्ट्र निर्मित होता हैं। समाज में आचरण में परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं। यह स्वावलंबी पद्धति से, सामूहिकता से चलने वाला काम है। आइए संघ के हाथों को इतना मजबूत और विश्वसनीय बनायें कि निर्माण का हर क्षण इतिहास बने। नये एवं सशक्त भारत का निर्माण हो, जिसका हर रास्ता मुकाम तक ले जाये। सबकी सबके प्रति मंगलभावनाएं मन में बनी रहे। आज देश ने राष्ट्रीयता के ईमान को, कत्र्तव्य की ऊंचाई को, संकल्प की दृढ़ता को और मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिये ‘यशस्वी भारत’ के रूप में मोहन भागवत ने फिर आह्वान किया है। आओ, फिर एक बार जागें, संकीर्णता एवं स्वार्थ की दीवारों को ध्वस्त करें।

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