मुलायम का समाजवाद और चाचा भतीजे की लड़ाई

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अजय कुमार

ऐसा लग रहा है कि मुलायम सिंह यादव के सक्रिय राजनीति से दूरी बना लेने के बाद समाजवादी पार्टी के बुरे दिन खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव सपा मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में लड़ी और जीती थी।

घर का झगड़ा अगर घर के भीतर सुलझने की बजाए बाहर आ जाए तो जगहंसाई के अलावा कुछ नहीं हासिल होता है। बस फर्क इतना है कि जब आम आदमी के घर-परिवार में झगड़ा होता है इसकी चर्चा कम होती है, लेकिन जब यही झगड़ा किसी बड़ी हस्ती के वहां छिड़ता है तो सब लोग तमाशा देखते हैं। आपसी झगड़े के चलते न जाने कितने औद्योगिक घराने तबाह हो गए। कितने बड़े-बड़े नेताओं का रसूख और सियासत पारिवारिक झगड़े के चलते ‘अर्श से फर्श’ पर आ गया। अब यही बानगी मुलायम सिंह यादव के परिवार में ‘चाचा-भतीजे की जंग के रूप में देखने को मिल रही है। ऐसा लग रहा है कि मुलायम के सक्रिय राजनीति से दूरी बना लेने के बाद समाजवादी पार्टी के बुरे दिन खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव सपा मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में लड़ी और जीती थी। चुनाव जीतने के बाद पुत्र मोह में फंसकर मुलायम ने मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने बेटे अखिलेश यादव को सौंप दी और स्वयं विश्राम की मुद्रा में आ गए। यहीं से समाजवादी पार्टी के पतन का दौर शुरू हो गया था। मुलायम की कम होती सक्रियता के बीच सपा के दिग्गज नेता आजम खान और शिवपाल यादव अपने आप को पार्टी का अघोषित आका समझने और अखिलेश यादव को नियंत्रित करने लगे। करीब ढाई वर्ष तक अखिलेश इसी द्वंद्व में फंसे रहे कि पार्टी का असल नेता कौन है, सपा को साढ़े तीन मुख्यमंत्रियों वाली पार्टी की उपमा मिलने लगी, लेकिन यह भ्रम ज्यादा दिनों तक टिक नहीं सका।

कौन है सपा का सबसे बड़ा नेता इसी दुविधा में फंसी समाजवादी पार्टी का 2014 के लोकसभा चुनाव के समय फजीहत का जो सिलसिला शुरू हुआ था वह 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव तक थम नहीं सका। यहां तक की बीच-बीच में हुए उप-चुनावों में भी सपा को हार का सामना करना पड़ा। 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली हार का ठीकरा तो अखिलेश ने आजम और शिवपाल यादव पर फोड़ दिया, लेकिन 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में जब सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा तो अखिलेश इस हार की जिम्मेदारी लेने की बजाए बगले झांकने लगे। तब उन्हें अपने उस चाचा की याद आई, जिनको बेइज्जत करके उन्होंने पार्टी से निकाल दिया था। जबकि अखिलेश अच्छी तरह से जानते थे कि समाजवादी पार्टी को खड़ा करने में मुलायम के बाद सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका चाचा शिवपाल यादव ने ही निभाई थी। चाचा को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद अखिलेश की दुर्दशा कम होने की बजाए बढ़ती ही जा रही है।

उधर, चाचा शिवपाल के जाने के बाद कमजोर होती समाजवादी पार्टी में नई जान फूंकने, यूपी की सत्ता में वापसी से लेकर केन्द्र में समाजवादी पार्टी को मजबूती प्रदान करने तक के लिए अखिलेश ने परस्पर विरोधी विचारधारा वाली कांग्रेस और बसपा से भी हाथ मिलाने में संकोच नहीं किया था, लेकिन सभी प्रयास और गठबंधन बेकार साबित हुए। लगता है इसके बाद अखिलेश यादव को चाचा शिवपाल की अहमियत समझ में आ गई होगी, इसीलिए वह शिवपाल यादव पर डोरे डाल रहे होंगे। उधर, अभी तक समाजवादी पार्टी में वापसी की राह देख रहे शिवपाल यादव सियासी हवा का रूख भांपकर अखिलेश पर तंज कसने लगे हैं। इसके लिए शिवपाल यादव ने भतीजे अखिलेश यादव के 18 नवंबर 2020 को दिए उस बयान का सहारा लिया जिसमें अखिलेश यादव ने सपा सरकार बनने पर चाचा शिवपाल सिंह यादव को कैबिनेट मंत्री बनाने और जसवंतनगर में उनके मुकाबले किसी को न उतारने की बात कहकर यादव परिवार में एका की कोशिश की थी। वैसे अखिलेश के इस ऑफर पर लोगों ने परिवार के बीच एका से अधिक इसके सियासी मायने ज्यादा निकाले थे। अखिलेश के प्रस्ताव को यादव परिवार के परंपरागत वोटों को सहेजने का जतन करार दिया गया था।

बहरहाल, अखिलेश यादव के इस प्रस्ताव पर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस कर कहा है कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव के लिए उनकी पार्टी का सपा में विलय नहीं होगा बल्कि हम तमाम छोटी-छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव द्वारा मुझे एक सीट या फिर हमें कैबिनेट मंत्री पद का प्रस्ताव देना एक मजाक है। ऐसे में साफ है कि शिवपाल अब अखिलेश के दिए प्रस्ताव के साथ सपा के साथ हाथ नहीं मिलाएंगे बल्कि अपनी अलग सियासी जमीन तैयार करेंगे।

बात शिवपाल यादव के 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए गठबंधन प्लान की कि जाए तो शिवपाल यादव की पार्टी की तरह ही उत्तर प्रदेश के पांच छोटे दलों ने बड़े दलों के साथ जाने की बजाय आपस में ही हाथ मिलाकर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है। ऐसे में माना जा रहा है कि वह हाल ही में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर के नेतृत्व में बने भागीदारी संकल्प मोर्चा के साथ हाथ मिला सकते हैं। इस तरह से शिवपाल की यूपी की तमाम पिछड़ी जातियों के नेताओं का एक मजबूत गठबंधन सूबे में तैयार करने की रणनीति भी है। इसी तरह से ओमप्रकाश राजभर की अगुवाई में बाबू सिंह कुशवाहा की जनाधिकार पार्टी, अनिल सिंह चौहान की जनता क्रांति पार्टी, बाबू राम पाल की राष्ट्र उदय पार्टी और प्रेमचंद्र प्रजापति की राष्ट्रीय उपेक्षित समाज पार्टी ने भागीदारी संकल्प मोर्चा के नाम से नया गठबंधन तैयार किया है। ऐसे में शिवपाल यादव की राजनीति भी ओबीसी के इर्द-गिर्द है और ऐसे में इस मोर्चे के साथ मिलकर सूबे में एक नया राजनीतिक समीकरण बना सकते हैं। भागीदारी संकल्प मोर्चा में अभी तक ओबीसी के यादव और कुर्मी समाज नेताओं की कोई पार्टी शामिल नहीं है। वहीं, शिवपाल के अपना दल की कृष्णा पटेल और पीस पार्टी के डॉ. अय्यूब अंसारी से भी रिश्ते ठीक हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि शिवपाल इन दोनों के साथ लेकर इस मोर्चा को नया रूप दे सकते हैं। हालांकि, यह देखना होगा कि शिवपाल की इन कुनबे में एंट्री होती है या फिर कोई दूसरे गुट के साथ अपना समीकरण बनाने की कवायद करेंगे। चर्चा इस बात की भी है कि शिवपाल यादव बिहार चुनाव में ओवैसी की पार्टी को मिली शानदार सफलता के बाद उसको भी इस गठबंधन का हिस्सा बनाने का प्रयास कर रहे हैं ताकि मुस्लिम वोटों के लिए दावेदारी मजबूत की जा सके। लब्बोलुआब यह है कि मुलायम सिंह का समाजवाद चाचा शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश यादव रूपी दो पाटों के बीच पिसता जा रहा है। इससे न तो शिवपाल का भला हो रहा है और न अखिलेश एवं समाजवादी पार्टी का।

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