क्या हम वास्तव में मनुष्य हैं?

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मनमोहन कुमार आर्य

हम स्वयं को मनुष्य कहते व मानते हैं। संसार में जहां भी दो पैर वाले मनुष्य की आकृति वाले प्राणी जो बुद्धि से युक्त होते हैं, उन्हें मनुष्य कहा जाता है। प्रश्न यह है कि क्या हम वास्तव में मनुष्य हैं? यदि हैं तो क्यों व कैसे है? इन प्रश्नों का उत्तर देने से पूर्व ऋषि दयानन्द ने मनुष्य की जो परिभाषा दी है उस को देख लेना व उस पर विचार कर लेना प्रासंगिक है। ऋषि दयानन्द ईश्वरीय ज्ञान वेद एवं समस्त वैदिक साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान होने सहित एक उच्च कोटि के चिन्तक, विचारक, लेखक, वक्ता, प्रचारक तथा यथार्थ व सत्य धर्म की एकमेव अद्वितीय विभूति थे। उन्होंने मनुष्य की परिभाषा सत्यार्थप्रकाश के साथ प्रकाशित अपने ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ में दी है। मनुष्य व अपनी अन्य मान्यताओं को परिभाषित करने से पूर्व उन्होंने अपने विषय में कुछ घोषणायें की हैं। उनका यहां उल्लेख करना भी समीचीन है। वह लिखते हैं कि ‘जो वेदादि सत्यशास्त्र और ब्रह्मा से ले कर जैमिनि मुनि पर्यन्तों (ऐतिहासिक ऋषियों) के माने हुए पदार्थ हैं जिन को मैं भी मानता हूं, सब सज्जन महाशयों के सामने प्रकाशित करता हूं।’ इन पंक्तियों में ऋषि दयानन्द जी ने यह स्पष्ट किया है कि उनकी सभी मान्यतायें उनकी निजी कपोल कल्पित न होकर उनसे पूर्व वेदादि सत्य शास्त्रों में वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त उनकी सभी मान्यतायें सृष्टि के आदि ऋषि ब्रह्मा से महाभारत काल पर्यन्त के जैमिनि मुनि पर्यन्त ऋषियों द्वारा भी स्वानुभूत, मान्य व स्वीकार्य मान्यतायें थीं। इसके बाद ऋषि दयानन्द बताते हैं कि ‘मैं अपना मन्तव्य उसी को जानता हूं कि जो तीन काल में सब को एक सा मानने योग्य है।

 मेरा कोई नवीन कल्पना वा मतमतान्तर चलाने का लेशमात्र भी अभिप्राय नहीं है किन्तु जो सत्य है उस को मानना, मनवाना और जो असत्य है उस को छोड़ना और छुड़वाना मुझको अभीष्ट है। यदि मैं पक्षपात करता तो आर्यावत्र्त में प्रचलित मतों में से किसी एक मत का आग्रही होता किन्तु जो–जो आर्यावत्र्त वा अन्य देशों में अधर्मयुक्त चाल चलन (परस्पर का व्यवहार) है उस का स्वीकार और जो धर्मयुक्त बातें हैं, उन का त्याग नहीं करता न करना चाहता हूं क्योंकि ऐसा करना मनुष्यधर्म से बहिः (बाहर व त्याज्य) है।’

मनुष्य के विषय में ऋषि दयानन्द का क्या मन्तव्य व परिभाषा है, वह इस प्रकार है। ‘मनुष्य उसी को कहना कि जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख–दुःख और हानि–लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामथ्र्य से धर्मात्माओं कि चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उन की रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हो तथापि उसका नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करें। इस काम में चाहे उस (मनुष्य) को कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जावें परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होवे।’ इन पंक्तियों के बाद भी ऋषि दयानन्द ने मनुष्य के गुणों तथा धर्म विषयक अनेक वचन लिखें हैं जिनका पालन करने से ही मनुष्य, मनुष्य कहलाता है।

ऋषि दयानन्द के कथनानुसार मनुष्य वही हो सकता है कि जो मननशील अर्थात् सोच–विचार कर निर्णय करता हो और जो उचित हो उसे करे और अनुचित का त्याग करने वाला हो। दूसरी बात ऋषि कहते हैं कि वह अपनी आत्मा के समान दूसरों के सुख–दुःख व हानि लाभ को भी समझे और उसके ही अनुरूप व्यवहार करे। हमें जिस प्रकार से सुख प्रिय और दुःख अप्रिय होता है, उसी प्रकार से हम दूसरों के सुख व दुःख का ध्यान रखें और जैसे हम दूसरों से सुख चाहते हैं, दुःख नहीं चाहते, उसी प्रकार हम भी दूसरों को सुख दें तथा दुःख न दें। जिस प्रकार हमें हानि अप्रिय है और लाभ प्रिय है उसी प्रकार हम दूसरों को लाभ पहुंचाने का प्रयत्न करें तथा हमारे किसी कार्य व व्यवहार से किसी की कोई हानि न हो, इसका हमें ध्यान रखना चाहिये। क्या हम ऐसा करते हैं? जो ऐसा करते हैं वह वस्तुतः मनुष्य हैं और जो नहीं करते वह मनुष्य की आकृति के प्राणी होकर भी मनुष्य नहीं कहे जा सकते। मनुष्य के अन्दर एक यह गुण भी होना चाहिये कि वह अन्यायकारी बलवान् मनुष्यों से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल मनुष्यों से भी डरता रहे। यह गुण भी अपवाद स्वरूप ही मनुष्यों में पाया जाता है। अतः इस आधार पर भी सभी मनुष्य, मनुष्य सिद्ध नहीं होते। ऋषि दयानन्द आगे कहते हैं कि इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामथ्र्य से धर्मात्माओं कि चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उनकी रक्षा, उन्नति व उनसे प्रियाचरण करें। इसके विपरीत अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हो तथापि उसका नाश, अवनति और उससे अप्रियाचरण सदा किया करे। यह कार्य भी सामान्य मनुष्यों के लिये तो असम्भव सा है तथा अन्य बलवान् व उच्च शिक्षित मनुष्य भी इसका पालन व आचरण नहीं करते देखे जाते। इस दृष्टि से भी सभी मनुष्य आकृति वाले प्राणी सच्चे मनुष्य सिद्ध नहीं होते।

मनुष्य विषयक अपने मन्तव्य को समाप्त करते हुए ऋषि दयानन्द लिखते हैं कि जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करें। इस काम में चाहे उस को (मनुष्य को) कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे (उसके) प्राण भी भले ही जावें, परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होवे। ऋषि के इन शब्दों से पता चलता है कि वह मनुष्य उसी को मानते हैं जो किसी को अकारण दुःख न दे, सबसे प्रियाचरण करें और देश व समाज से असत्य, अज्ञान, अन्याय व अभाव को दूर करने का तन, मन व धन से प्रयत्न करे। ऐसा करने वाला प्राणी ही मनुष्य कहलाने का अधिकारी होता है। मनुष्य की यह बहुत उच्च कोटि की परिभाषा है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो वह आदर्श पुरुष व महापुरुष कहा जा सकता है। देश, समाज तथा इतिहास में हम देखते हैं कि कुछ ऐसे लोगों को महात्मा, महापुरुष तथा महामानव बना व कहा जाता है कि जिनके अन्दर मनुष्य के यह आदर्श गुण नहीं पाये जाते हैं। राजनीति में जिसका प्रभुत्व होता है, वह जिसको जो पुरस्कार, विभूषण तथा सम्मान देना चाहता है, दे देता है। ऐसा लगता है कि वहां गुणों व अवगुणों दोनों की उपेक्षा कर दी जाती है। हम देखते हैं कि देश में ऋषि दयानन्द, चाणक्य, सरदार पटेल, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, शहीद भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, चन्द्र शेखर आजाद आदि को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह अधिकारी थे। मनुष्य की परिभाषा में पूरे उतरने वाले मनुष्यों पर विचार करें तो हमें राम, कृष्ण, दयानन्द, चाणक्य सहित हमारे सभी प्राचीन ऋषि मुनि ही मनुष्य कोटि के पुरुष सिद्ध होते हैं। हमें इस परिभाषा को जानना व समझना है। उसके बाद इसमें कही गई बातों को अपने जीवन में चरितार्थ करने का प्रयत्न करना है। हम जितना इस मन्तव्य व परिभाषा को चरितार्थ कर पायेंगे उतना ही अधिक हमारा उत्थान व कल्याण होने सहित देश व समाज का हित होगा।

वेद के एक मन्त्र में ‘मनुर्भव’ शब्द आता है जिसमें मनुष्य को मनुष्य बनने को कहा गया है। यहां भी वेद के अनुसार मनुष्य मानवोचित गुणों को धारण करने व उसका पोषण करने वाले पुरुष को बताया गया है। यदि वेदाध्ययन किया जाये तो सम्पूर्ण वेदों में मनुष्य को दिव्य गुणों को धारण करने की प्रेरणा की गई है। ‘ओ३म् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद् भद्रन्तन्न आसुव।।’ इस वेदमन्त्र में सभी दुरितों को छोड़ने तथा सभी भद्र विचारों व आचरणों को धारण करने की प्रार्थना ईश्वर से की गई है। यह मन्त्र भी मनुष्य को मनुष्य बनने की प्रेरणा दे रहा है। ऋषि दयानन्द जी के जीवन में एक घटना आती है जिसमें बताया गया है कि ऋषि दयानन्द भ्रमण करते हुए एक बार ऐसे स्थान पर पहुंच गये जहां एक बालक की बलि दी जा रही थी। उसकी मां विलाप कर रही थी। वह कह रही थी कि उसका एक ही बालक है और वह माता विधवा है। उसके बालक को छोड़ दिया जाये जिससे वह जीवित रह सके। ऋषि दयानन्द इस दृश्य को देख व सुन कर द्रवित हो जाते हैं और बलि देने वाले व्यक्तियों के पास जाकर कहते हैं कि उस बालक को छोड़ दो और उसके स्थान पर उनको बलि चढ़ा दो। ऋषि दयानन्द की बात मान ली जाती है परन्तु इससे पूर्व की ऋषि दयानन्द की बलि दी जाये वहां मनुष्य बलि की विरोधी हथियारों से युक्त राजा की सेना वा शस्त्रास्त्र से युक्त लोग आ जाते हैं और बलि देने वाले व्यक्ति उस स्थान से भाग जाते हैं। हो सकता है कि यह घटना पूर्ण सत्य न हो परन्तु इसे पढ़कर ऋषि दयानन्द का सच्चा स्वरूप विदित होता है। ऋषि दयानन्द ने दयानन्द नाम धारण ही उनमें दया के गुण की प्रचुरता के कारण किया था। यह घटना उनके उस गुण को प्रदर्शित करने के साथ एक सच्चे मनुष्य के कर्तव्य पर भी प्रकाश डालती है। यदि यह घटना सत्य है तो यह एक घटना ही ऋषि दयानन्द को संसार का महामानव सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है, ऐसा हम अनुभव करते हैं।

हम मनुष्य हैं या नहीं? इस पर सबके विचार अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु हमें लगता है कि महर्षि दयानन्द जी ने जो अपना मन्तव्य दिया है, वह वेदों का वा ईश्वर का कहा हुआ मन्तव्य है तथा वह वेदों के अनुकूल ह। वह मन्तव्य ऋषि के जीवन में सत्य चरितार्थ होता है। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

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