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विशेष संपादकीय

राजस्व न्यायालयों की बोझिल न्याय प्रणाली

देश को आजाद हुए 67 वर्ष हो गये, पर दुर्भाग्य है हमारा कि आज भी हमारे देश में  लगाया पैंतीस हजार वही कानून लागू हैं, जो अंग्रेजों ने अपने शासनकाल के दौरान लागू किये गये थे। कानूनी प्रक्रिया भी वही है, जो अंग्रेजों ने यहां चलायी थी। अंग्रेजों की न्यायप्रणाली में दोष होना स्वाभाविक है क्योंकि एक तो वह विदेशी शत्रु शासक थे, जिनका उद्देश्य भारतीय जनता पर दमनात्मक शासन करना था, दूसरे उन्हें देशभक्तों को देशद्रोही सिद्घ करना होता था, और इस प्रकार देशभक्तों को देशद्रोही बनाने के लिए वह भारतीयों का ही प्रयोग करते थे। तीसरे वह इस देश की भौगोलिक, सामाजिक और भाषाई परिस्थितियों में अपरिचित होते थे।

अपनी इसी मानसिकता को छुपाने के लिए अंग्रेजों ने यहां जिस प्रकार की न्याय प्रणाली स्थापित की वह एक दमनकारी शासक के लिए तो अच्छी हो सकती है, परंतु वह किसी लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के लिए कभी भी उचित नही हो सकती। जैसे अंग्रेज यहां की भूगोल और भाषा से अपरिचित होते थे तो वह अपनी इस दुर्बलता को छिपाने के लिए सामान्यत: अपने अधीनस्थ भारतीय कर्मियों, अधिकारियों से स्थलीय आख्या प्राप्त करते थे। यह आख्या प्राप्ति की परंपरा केवल इसीलिए चली कि अधिकारी को प्रकरण के भूगोल और भाषा को समझने में सुविधा हो सके। परंतु स्वतंत्र भारत में ये परंपरा पूर्णत: वैधानिक प्रक्रिया का एक अंग बनाकर रख दी गयी है। जिससे उच्च अधिकारियों को अपने ऊपर से काम टालने का बहाना मिल जाता है और वे निचले अधिकारी से आख्या प्राप्त करने के लिए काम को टाल देते हैं या लटका देते हैं। इसके पश्चात निचले ‘साहब’ पीडि़त पक्ष से ही सौदेबाजी करते हैं, या दूसरे मुठमर्द पक्ष से मोटी धनराशि लेकर अतार्किक और तथ्यों से सर्वथा असंगत आख्या देकर मामले को भ्रमित कर डालते हैं, या उसमें कोई ऐसा पेंच फंसा देते हैं कि जिससे न्याय तकनीकी विन्दुओं में ही फंसकर रह जाए।

इस प्रकार की ‘काम लटकाऊ’ नीतियों के कारण न्याय में देरी तो होती ही है, साथ ही न्याय महंगा भी होता है। न्याय से अन्याय जन्म लेता है, या अन्याय में से न्याय को ढूंढऩे के लिए झूठा नाटक (नूराकुश्ती) किया जाता है। इसी प्रकार की उठापटक देश की न्याय प्रणाली में लगी रहती है।

इस विषय में राजस्व न्यायालयों की तो और भी बुरी स्थिति है। यहां 1995 का एक प्रसंग मुझे स्मरण आ रहा है जिसमें एक व्यक्ति ने डीएम के विरूद्घ शिकायत प्रमुख सचिव (उत्तर प्रदेश) से की। जिस पर प्रमुख सचिव ने अधीनस्थ अधिकारी से आख्या चाही और यह आख्या चाहने का सिलसिला अंत में एक लेखपाल पर आकर रूका। संबंधित डी. एम. (गाजियाबाद)  ने भी यह नही देखा कि प्रकरण क्या है? उसने भी अपने अधीनस्थ के लिए आख्या प्रेषित करने हेतु लिख दिया। तब वह संबंधित लेखपाल मुझे दिखा रहा था कि-‘देखिए! इस देश की न्याय प्रणाली को, कि यहां एक लेखपाल डी. एम. के प्रकरण में जांच करेगा।’

इसे ही तो कहते हैं-‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ यहां चौपट बैठे लोग दूर का रास्ता बताते हैं। मेरे देश के महान लोकतंत्र की माया है ये। जिसमें नालायकों का सम्मान होता है और लायकों का उत्पीडऩ या शोषण होता है। अब आइए, उत्तर प्रदेश के राजस्व अधिनियम की धारा 41 पर। यह धारा दो काश्तकारों के मध्य मेंड  संबंधी विवाद को सुलझवाने की बात कहती है। जबकि धारा 33/39 (एल. आर. एक्ट, वही) किसी लिपिकीय त्रुटि को ठीक कराने की बात कहती हंै। इन धाराओं में प्रार्थना पत्र देते समय ही वादकारियों की मानसिकता ऐसी होती है कि जैसे प्रार्थना पत्र देने के सप्ताह-दस दिन में ही प्रकरण सुलझकर उनके हाथ में आ जाएगा। परंतु व्यवहार में इन प्रकरणों को सुलझाने में दस-दस, पंद्रह-पंद्रह वर्ष लग जाते हैं। इस दौरान आख्याओं की ‘नूराकुश्ती’ चलती रहती है और फाइलें परस्पर विरोधाभाषी आख्याओं से भरते-भरते भारी होती जाती हैं। कई बार ऐसे प्रकरणों में वादकारियों के मध्य परस्पर फौजदारी होती है और हत्या तक हो जाती हंै।

हमारे उच्च न्यायालय का दृष्टिïकोण इस प्रकरण में कई बार बड़ा सख्त आया है कि अधीनस्थ अधिकारी या कर्मचारी की आख्या का कोई साक्षीय मूल्य नही है। परंतु फिर भी अधीनस्थ तम कर्मचारी लेखपाल की आख्या पर डी.एम. तक आदेश पारित कर देते हैं। जिससे स्पष्टï होता है कि डी.एम या एसडीएम अपने विवेक का प्रयोग नही करते हैं और इस प्रकार लेखपाल एक ‘सुपर बॉस’ बनकर सामने आता है और लेखपाल यही बात काश्तकारों से कहते भी हैं कि वो जो कुछ लिखेगा वही माना जाएगा। ऐसी परिस्थितियों में आख्या प्राप्ति की इस नूरा कुश्ती को समाप्त कर यथाशीघ्र न्याय देने के लिए न्यायालयों की न्याय प्रणाली को चुस्त दुरूस्त करने की आवश्यकता है। अन्यथा सच ये है कि वर्तमान न्यायप्रणाली इतनी बोझिल हो चुकी है कि लोगों में इसके खिलाफ आक्रोश केन्द्र की मोदी सरकार का इस दिशामें सोचना चाहिए।

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