Categories
भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास

मराठों के पतन के कारण (भाग 1)

भारत भारत के 1235 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास
हिंदवी स्वराज के संस्थापक शिवाजी और उनके उत्तराधिकारी पुस्तक से ..

जीत के उल्लास में पराजय विराजती है नहीं।
पराजय के शोक में जीत गीत गाती है नहीं॥
उत्थान और पतन का क्रम सदा से चल रहा।
जैसा जिसका कर्म है मिल वैसा ही फल रहा।।

उत्थान के पश्चात पतन प्रकृति का शाश्वत नियम है। यह क्रम सृष्टि प्रारंभ से ही चला आ रहा है। धर्म के आधार पर जो राज्य स्थापित किए जाते हैं, अर्थात न्याव और नीति पर जो राज्य चलते हैं, वह चिरस्थायी होते हैं। परंतु जब राज्य के शासक लोग स्वार्थ से प्रेरित राजनीति में लग जाते हैं और सत्तालोलुपता उन पर हावी प्रभावी हो जाती है तो अच्छे-अच्छे साम्राज्यों का विखंडन होता हुआ इतिहास ने देखा है। मराठा साम्राज्य भी अपने अंतिम दिनों में ऐसी ही व्याधियों का शिकार हो गया था। इसके शासक लोग सत्तालोलुप हो गए थे और उनके लिए राष्ट्रहित दूसरे स्थान पर हो गया था। इस प्रकार छत्रपति शिवाजी महाराज का वह भावं उनके उत्तराधिकारियों के विचारों से लुप्त हो गया जिसमें उन्होंने ‘राष्ट्र प्रथम’ के आधार पर हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की थी।

इतिहासकारों ने मराठा साम्राज्य के पतन को लेकर अपनी ओर से कुछ मनगढ़ंत निराधार बातें लिखी हैं और इस साम्राज्य के शासकों को यह मानने से ही इंकार कर दिया है कि वह प्रजाहितचिंतक शासक थे। हम यहाँ पर ऐसे इतिहासकारों से अलग कुछ नये तथ्यों पर विचार करेंगे। जहाँ तक वर्तमान इतिहासकारों की मराठा साम्राज्य के पतन संबंधी कुछ मान्यताएँ हैं, तो उन पर उचित सीमा तक अपनी सहमति भी देंगे।

मराठा राज्य का चारित्रिक दोष

शिवाजी महाराज ने जिस प्रकार गौहरबानू जैसी मुस्लिम महिला को उसके शिविर में पहुँचाकर आदर्श उपस्थित किया था, उनके चरित्र का यह प्रबल पक्ष मराठा साम्राज्य के दूसरे छत्रपतियों या पेशवाओं में स्थाई रूप से विकास नहीं कर सका। उनके भीतर मुगलों जैसे चारित्रिक दोष आ गए थे। मराठा क्षत्रपों ने या पेशवाओं ने मुगलों की अपेक्षा अपने शासनकाल में प्रजा की उन्नति के लिए भरपूर कार्य किए, परंतु चरित्र के दोषों के आने के कारण उनका नैतिक बल दुर्बल पड़ गया।

वर्तमान इतिहासकारों की दृष्टि में मराठा शासकों और उनके लोगों के मध्य बनी एकता क्षणिक थी। इतिहासकारों ने इस एकता को कृत्रिम और आकस्मिक माना है। जबकि यह बात नितांत अनुचित और पक्षपात प्रेरित है। मराठा साम्राज्य के भीतर लोगों ने कभी भी अपने शासकों के विरुद्ध विद्रोह नहीं किया, अपितु जहाँ तक मराठा साम्राज्य फैला, लोग उनके शासन से लगभग प्रसन्न ही रहे।

यंद्यपि भारत की जनता के बारे में यह भी एक सत्य है कि यह उन अतिमानवों का सम्मान करती आई है जो प्रजाहितचिंतक होकर सर्व समाज के कल्याण में आस्था और विश्वास रखते हुए शासन करते हों, जब शासक सत्ता प्रेरित होकर पदलोलुपता में फंस जाते हैं तो भारत की जनता प्राचीन काल से ही ऐसे ‘कंस और दुर्योधन’ का साथ छोड़ती आयी है। यदि ऐसा ही मराठा साम्राज्य के स्वार्थ प्रेरित पेशवाओं और छत्रपों के साथ हो गया हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

केंद्र की दुर्बलता

यज्ञ नाभि सृष्टि की केंद्र नाभि राज्य की।
यज्ञोमयी भावना ही नाभि लोकराज की।।
नाभि टहल जाए तो शरीर होता रुग्ण है।
केंद्र के हिलने से सच में होता सब अवरुद्ध है।।

भारत के दीर्घकालीन इतिहास का एक यह सर्वमान्य सत्य है कि जब-जब भारत की केंद्रीय सत्ता दुर्बल पड़ी है, तब-तब ही हम विदेशी सत्ताधारियों या आक्रामक लोगों के शिकार हुए हैं। ऐसा ही मराठा साम्राज्य के साथ भी हुआ। जब तक केंद्र शक्तिशाली रहा उनकी शासन-व्यवस्था कार्य करती रही और मराठा संगठित होते रहे। परंतु बाद में जब केंद्र शक्तिहीन हो गया तो विकेंद्रीकरण की प्रवृति बलवती होने लगी। राजा या छत्रपति धीरे-धीरे इस संघ का नाममात्र का प्रधान रह गया। सभी सरदार सामन्त स्वतंत्र राजाओं की भांति आचरण करने लगे।

बाजीराव के मरने के पश्चात मराठों में संगठन एवं एकता का अभाव हो गया। व्यक्तिगत स्वार्थ, कलह, षड्यंत्र आदि के कारण मराठों का नैतिक पतन प्रारंभ हो गया। मराठों ने शिवाजी के आदर्शों को भुला दिया। एकता एवं संगठन के अभाव में मराठा संघ का पतन अवश्यंभावी हो गया। राजनीति के लिए आवश्यक है कि एक केंद्रीय सत्ता का कठोर चाबुक सदा सामंतों और सरदारों के ऊपर रहना चाहिए। यदि केंद्रीय सत्ता में बैठे लोग दुर्बल हो जाएंगे और दो-दो महीने के या कुछ वर्षों के नाबालिग बच्चे राजगद्दी पर निरंतर बैठाये जाएंगे तो उसका परिणाम सत्ता के बिखर जाने के रूप में आना अवश्यंभावी है।

राष्ट्रीयता की भावना का अभाव

मराठों के उत्थान का एक कारण यह था कि उनके भीतर राष्ट्रवाद की भावना प्रबल थी। जनसमर्थन उन्हें इसी बात पर मिला था कि मुगलों के काल में लोग राष्ट्रवाद की भावना के लिए तरस रहे थे। वह अत्याचारी मुगल शासन से मुक्ति चाहते थे। मराठा शासन ने उन्हें मुगलिया अत्याचारों से मुक्ति दिलाई भी, परंतु धीरे-धीरे मराठा शासकों के भीतर भी राष्ट्रवाद की वह प्रबल भावना धूमिल होने लगी, जो शिवाजी और उनके एकदम बाद के उनके उत्तराधिकारियों के भीतर विद्यमान रही थी। फलस्वरूप इसका दुष्प्रभाव शासन पर पड़ा और मराठा शासन दुर्बलताओं का शिकार होकर बिखरने लगा।

मराठों में दिन-प्रतिदिन राष्ट्रीयता की भावना का लोप होता गया। उन्होंने शिवाजी के आदर्श मराठा साम्राज्य और ‘हिंदू पद पादशाही’ को भुला दिया। कुछ छद्म इतिहासकारों ने ऐसा भी लिखा है कि मराठों के विपरीत अंग्रेजों के भीतर राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरी थी, इसलिए अंग्रेज यहाँ पर सफल होते चले गए और मराठा असफल होते चले गए। हम इस बात से सहमत नहीं हैं। अंग्रेजों के भीतर राष्ट्रवाद की नहीं अपितु लूटवाद की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह यहाँ के सामान को लूटना चाहते थे और जितने क्षेत्र पर उनका अधिकार हो जाता था, उसकी मालगुजारी को वसूल कर अपने लिए मौज-मस्ती के साधन जुटाने में विश्वास रखते थे, इसलिए उनके भीतर राष्ट्रवाद की भावना को मानना गलत होगा। उनके बारे में यही कहना उचित होगा कि उनके भीतर लूटवाद की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। जिसने उन्हें यहाँ पर हमारे मराठा साम्राज्य के लोगों पर अत्याचार करने और उनका साम्राज्य लूटने के लिए के लिए प्रेरित किया। कतिपय मराठों ने देश से विश्वासघात किया और जमीन तथा पैसे के लालच में, अंग्रेजों की मुखबिरी की। परंतु इसका अभिप्राय यह नहीं कि सारे मराठे ही राष्ट्रप्रेम की भावना से हीन हो गए थे। उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना उनके साम्राज्य के छिन्न- भिन्न होने के उपरांत भी जीवित रही। तभी तो वह 1857 की क्रांति और उसके पश्चात के स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर भाग लेते रहे।

मराठों में बड़ी अनुशासनहीनता

मराठों के विषय में इतिहासकारों की यह मान्यता सत्य है कि उनके भीतर समय के अंतराल पर अनुशासनहीनता का दुर्गुण अत्यधिक बढ़ गया था। फलस्वरूप एक नेता, एक योजना, एक आदर्श व एक लक्ष्य का आवश्यक राजनीतिक गुण उनके भीतर से समाप्त होने लगा था। परंतु यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि यह सारे दुर्गुण उन लोगों के भीतर ही अधिक आए थे जो मराठा साम्राज्य में उच्च पदों पर आसीन थे और राजनीति को सीधे प्रभावित कर रहे थे। उन्होंने सहयोग एवं संगठन की भावना को व्यक्तिगत स्वार्थ, अहंकार एवं सम्मान की बलिवेदी पर आहूत कर दिया। पेशवा, होल्कर, सिंधिया एवं भोंसले में इतना अधिक मतभेद था कि वे एक दूसरे की कोई बात सुनने के लिए तैयार न थे। वे नेतृत्व के लिए सदा परस्पर लड़कर अपनी शक्ति का अपव्यय करते रहे, तथा अपने अहं की तुष्टि के लिए राष्ट्रद्रोह करने के लिए भी तैयार रहते थे।

दोषपूर्ण सैन्य संगठन

कुछ इतिहासकारों ने ऐसा भी माना है कि मराठों के पास आधुनिकतम हथियार नहीं थे, इसलिए वह अंग्रेजों के समक्ष युद्ध में परास्त हो गए। इतिहासकारों की इस मान्यता में आंशिक सत्यांश है। हमारा मानना है कि युद्ध में मनोबल, आत्मबल और नेतृत्व के परस्पर समन्वय की वह भावना अधिक लड़ती है जो छोटी-सी सेना को बड़ी सेना के सामने खड़ा करने की रणनीति भली प्रकार जानती है। शिवाजी क्या कर रहे थे? वह भी तो इसी प्रकार की रणनीति को अपनाकर विशाल सैन्यबल वाले औरंगजेब और उससे पहले उसके पिता शाहजहाँ का सामना कर रहे थे।

शिवाजी ने अपने इन्हीं गुणों के आधार पर औरंगजेब जैसे अत्याचारी शासक के सामने खड़े होकर साम्राज्य स्थापित किया। जब इस देश में अंग्रेज आए तो उन्होंने मराठा साम्राज्य के अपने समकालीन शासकों की सेनाओं का सामना अपने बौद्धिक चातुर्य से किया। जबकि उस समय तक आते-आते शिवाजी के उत्तराधिकारी उस बौद्धिक चातुर्य को त्याग चुके थे, जो कभी शिवाजी शाहजहाँ और औरंगजेब के विरुद्ध अपनाया करते थे। शिवाजी के उत्तराधिकारियों के समक्ष अफ़जल खान आ गया होता तो निश्चय ही ये सारे मारे गए होते और यदि शिवाजी इस समय रहे होते तो चाहे उनके समक्ष कोई भी अंग्रेज अधिकारी या गवर्नर जनरल अफजल खान जैसी छल-बल की नीति को लेकर क्यों न आ गया होता तो भी वह उन्हें परास्त कर देते और जीवित नहीं छोड़ते।

नवीनतम हथियार भी जीतते हैं, परंतु हमारा मानना है कि नवीनतम हथियार भी उस समय रखे रह जाते हैं जिस समय बौद्धिक चातुर्य, रणनीति व कूटनीति में सफल राजनेता और सैन्य अधिकारी किसी सेना के पास नहीं होते। ऐसी चीजों का अभाव इस समय मराठा साम्राज्य के पास हो चुका था।

जहाँ तक अंग्रेजों के आधुनिकतम हथियार रखने की बात है तो अंग्रेजों के पास सचमुच एक आधुनिकतम हथियार था और वह था उनका छल, कपट और धोखे पर आधारित राजनीतिक और सैनिक व्यवहार। वह नीचता की किसी भी अवस्था तक गिर सकते थे। जबकि भारत के लोग ऐसी स्थिति की अपेक्षा भी नहीं कर सकते थे। उन्होंने सदा. युद्ध में भी नियम अर्थात ‘युद्ध में भी धर्म’ निभाने का सराहनीय कार्य किया है। इसलिए हम सद्‌गुणों का शिकार होकर भी युद्ध के मैदान में गये। जबकि दुष्ट विदेशी शासक हमारे समक्ष जब-जब आए तो उन्होंने ‘युद्ध में सब कुछ जायज’ कह कर पाशविकता की सारी सीमाओं को लांघने का अपराध किया। इसके उपरांत भी कुछ इतिहासकारों की दृष्टि में अंग्रेज सभ्य जाति के लोग रहे हैं। इन इतिहासकारों के द्वारा अंग्रेजों के साथ यह भी जोड़ दिया जाता है कि उन्होंने भारत को सभ्यता और संस्कृति सिखाई। जो लोग आज तक सभ्यता और संस्कृति नहीं सीख पाए हैं और जिनके यहाँ पर आज तक युद्ध में धर्म की अवधारणा पर चिंतन तक नहीं किया जा रहा है, वह हम भारतीयों को भला क्या सभ्यता सिखाएँगे?

भौगोलिक ज्ञान का अभाव

इतिहासकारों का यह भी मानना है कि जब मराठों ने अपने साम्राज्य का विस्तार करना आरंभ किया तो उन्हें देश के कई अंचलों का भौगोलिक ज्ञान नहीं था। इतना ही नहीं उन्हें अपने आसपास के क्षेत्रों का भौगोलिक ज्ञान भी न के बराबर था। जिस कारण वह अपना सैन्य संचालन भली प्रकार नहीं कर पाए और समय आने पर उन्हें पराजय का मुँह देखना पड़ा।

ऐसा मानने वाले इतिहासकारों का कहना है कि इसके अभाव में मराठे युद्ध के समय गंभीर स्थिति में फंस जाते थे। इसके विपरीत अंग्रेजों को मराठा राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति का पूरा ज्ञान था। इसी ज्ञान के आधार पर वे अपनी रणनीति निर्धारित करते थे और मराठों को पराजित होना पड़ता था।

वास्तव में ऐसा आरोप लगाना अंग्रेजों की चापलूसी करने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। अपने देश की भौगोलिक परिस्थितियों का जितना ज्ञान मराठों को हो सकता था, उतना अंग्रेजों को नहीं हो सकता था। अंग्रेजों के छल-बल से मराठे अनभिज्ञ थे। अतः इतिहासकारों का यह आरोप इस बात पर लागू हो सकता है कि अंग्रेजों के छल बल और धोखे की राजनीति के ‘भौगोलिक ज्ञान’ को मराठे नहीं जानते थे।

जिसे भारत के छद्म इतिहासकारों ने अंग्रेजों की कूटनीति कहकर महिमामंडित किया है, वह वास्तव में उनकी कूटनीति न होकर छल-बल की नीति थी, जो कि नितांत धोखों पर आधारित थी। उसके द्वारा वह अपने शिकार को मारना ही अपना अंतिम उद्देश्य मानते थे। उसके लिए उन्हें चाहे जो उपाय अपनाने पड़ें, उन्हें अपनाने में वे कभी संकोच नहीं करते थे। इस विषय में वह कहीं मुगलों से भी गिरे हुए थे। मराठों के बारे में यह आरोप भी हम निराधार मानते हैं कि वह ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में बहुत पीछे थे। उनका ज्ञान-विज्ञान बहुत ही पवित्र था, जिसमें अनुचित साधनों को अपनाना पाप माना जाता था। साथ ही मानवीयता और पशु-पक्षियों तक के प्रति प्रेम का भाव रखना उन्हें उनका ज्ञान ही सिखाता था। जबकि अंग्रेजों • के लिए यह सब चीजें अपनी स्वार्थ सिद्धि के समक्ष नगण्य और गौण थीं। मराठों का यह मानवतावाद और पशु-पक्षियों तक के प्रति प्रेम का भाव उन्हें छलबल, धोखे व कपट की राजनीति में विश्वास रखने वाले अंग्रेजों के समक्ष धर्मभीरु बनाता था और उनकी यह धर्मभीरुता उनके लिए ‘सद्गुण विकृति’ बन गई। जिसने समय आने पर उन्हें इन कपटी अंग्रेजों के समक्ष टिकने नहीं दिया।

उनके लिए अपेक्षित यही था कि वह शिवाजी की नीति का अनुसरण करते हुए ‘दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार’ करते।

क्रमशः

– डॉ राकेश कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
kolaybet giriş
hellocasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti 2026
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
Kolaybet
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet
betpark giriş
betpark giriş
Kolaybet Giriş
matbet giriş
matbet giriş
matbet giriş
matbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
betgaranti giriş
Hititbet
Hititbet Giriş
Hititbet Güncel Giriş
hititbet
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
hititbet
bettilt
hititbet giriş
hititbet
vdcasino giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Kuponbet
onwin giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet güncel giriş
sahabet güncel giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
onwin giriş
holiganbet giriş
grandpashabet giriş
onwin giriş
onwin giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
Mariobet
Mariobet Güncel Giriş
onwin giriş
onwin giriş
mariobet giriş
mariobet güncel giriş
Betorder
betorder giriş
betorder güncel giriş
betorder mobil giriş
betpark giriş
betorder
mariobet giriş