यदि ऋषि दयानंद नहीं आते तो संसार में वेदों का प्रकाश नहीं होता

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ओ३म्

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महाभारत युद्ध के बाद न केवल देश में अपितु विश्व में अज्ञान छा गया था। महाभारत का युद्ध लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व हुआ। महाभारत के बाद यज्ञों में पशु हिंसा आरम्भ हुई थी। समय के साथ यज्ञों में विकृतियों में वृद्धि होती गई। वेदों के अध्ययन-अध्यापन की परम्परा भी धीरे-धीरे समाप्त होती गई। महाभारत के बाद वेदों के जो विद्वान व भाष्यकार हुए, उन्होंने वेदों के जो अर्थ किये हैं, वह वेदों के सत्य वेदार्थ न होकर व्याकरण की दृष्टि से अनेक दोषों से युक्त थे। वेदाध्ययन में अवरोध तथा वेदों के मिथ्यार्थों के प्रचार से देश व समाज में अन्धविश्वासों व मिथ्या परम्पराओं का प्रचलन हुआ। समाज में जन्मना जातिवाद का आरम्भ भी महाभारत युद्ध के बाद ही हुआ। अन्धविश्वासों में मुख्य बातें निराकार व सर्वव्यापक ईश्वर के स्थान पर साकार मूर्ति को बनाकर पूजा करना, मिथ्या फलित ज्योतिष, ईश्वर के अवतार की कल्पना, मृतक स्त्री-पुरुषों का श्राद्ध, स्त्री व शूद्रों को वेदाधिकार से वंचित करना और यदि वह सुन लें व वेदमन्त्र का उच्चारण करें तो उन्हें अमानवीय दण्ड देना, विधवाओं की दुर्दशा, आर्य शब्द का प्रयोग छोड़ कर हिन्दू शब्द को अपनाना, छुआछूत, ऊंच-नीच आदि भेदभाव, मांसाहार का प्रचलन, अनमेल व बाल विवाह, शिक्षा के महत्व को भुला देना आदि दोष देश व समाज में वृद्धि को प्राप्त होते गये जिससे समाज व देश कमजोर होकर विदेशी व विधर्मियों का दास बन गया। इन बुराईयों में एक बुराई यह भी थी कि समाज में नारियों को सम्मानजनक स्थान नहीं दिया जा रहा था। समाज में सामथ्र्यवान लोग अशिक्षित होने के साथ स्त्री व पुरुषों के प्रति शोषण एवं अन्याय का व्यवहार भी करते थे। इस स्थिति के जो हानिकारक भयंकर परिणाम हो सकते थे वह सब समाज में घट रहे थे। ऐसे समय में ऋषि दयानन्द (1825-1883) का प्रादुर्भाव हुआ जिन्होंने किसी भी धार्मिक एवं सामाजिक परम्परा को मानने से पूर्व उसे अपनी बुद्धि से समीक्षा कर सत्य होने पर ही स्वीकार किया। उन्हें जो मिथ्या विचार व मान्यतायें प्रतीत हुईं उसका उन्होंने त्याग किया व देश व समाज के लोगों से कराया भी।

ऋषि दयानन्द को बाल्यकाल में 14 वर्ष की आयु में मूर्तिपूजा करते हुए मूर्ति में किसी प्रकार की दैवीय शक्ति के होने व उसकी पूजा व उपासना से मनुष्य की किसी प्रार्थना व इच्छा के पूरे होने पर सन्देह हो गया था। इसका समुचित समाधान प्राप्त न होने पर उन्होंने मूर्तिपूजा को तत्काल छोड़ दिया था। इसके बाद उनकी अपनी बहिन तथा चाचा की मृत्यु हो जाने पर उन्हें मृत्यु के स्वरूप को जान कर उस पर विजय पाने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न हुई थी और इससे उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ था। इन कारणों से उन्होंने गृह त्याग कर और देश-देशान्तर में घूम कर विद्वानों व योगियों की संगति की और उनसे अध्ययन करने व ज्ञान प्राप्ति सहित योगाभ्यास सीख कर ईश्वर का प्रत्यक्ष किया था। यद्यपि उन्होंने अपने पितृ-गृह में रहते हुए ही संस्कृत भाषा व इसके व्याकरण के अध्ययन सहित यजुर्वेद को कण्ठ कर उसका अध्ययन किया था और गृह-त्याग के बाद लगभग 14 वर्षों तक विद्वानों व योगियों की संगति करते रहे थे, परन्तु उनकी विद्या व ज्ञान की पिपासा शान्त नहीं हुई थी। इसे पूर्ण करने के लिये वह सन् 1860 में प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य प्रज्ञाचक्षु गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती से विद्या वा वेदागों का अध्ययन करने मथुरा आये थे। गुरु के चरणो में तीन वर्ष रहकर स्वामी दयानन्द जी ने व्याकरण के ज्ञान सहित गुरु जी से अनेक विषयों का अध्ययन व मार्गदर्शन प्राप्त किया था। तीन वर्षों में अपना अध्ययन पूरा कर गुरु जी की प्रेरणा से उन्होंने देश व समाज से अविद्या अन्धकार दूर करने सहित वेदों के प्रचार से सर्वत्र विद्या का प्रकाश करने का संकल्प वा प्रतिज्ञा की थी।

गुरु विरजानन्द जी के सान्निध्य से विदा लेने के बाद का उनका जीवन वेदों की सत्य मान्यताओं की प्रतिष्ठा करने सहित अविद्यायुक्त अवैदिक मतों, मान्यताओं एवं परम्पराओं के खण्डन में व्यतीत हुआ। उन्होंने अपने अध्ययन एवं योग बल से जाना था कि देश की अवनति व मनुष्यों की अधोगति में सबसे बड़ा कारण मूर्तिपूजा व फलित ज्योतिष आदि अवैदिक मान्यतायें वा परम्परायें हैं। अतः उन्होंने अविद्यायुक्त सभी अवैदिक मान्यताओं की समीक्षा व खण्डन करते हुए समाज सुधार का कार्य किया और मूर्तिपूजा से देश व समाज को मुक्त कराने के लिये अनेक जोखिम भरे कार्य किये जो बाद में उनके बलिदान व मृत्यु का कारण बने। ऋषि दयानन्द ने जोधपुर में वेद प्रचार के लिये जाते हुए अपने भक्तों, मित्रों वा सहयोगियों को अपना यह निश्चय भी बताया था कि यदि सत्य बोलने के कारण उनकी उंगलियों को लोग दीपक की बाती बना कर जला भी दें, तो भी सत्य बोलने व सत्य का प्रचार करने से वह किंचित भी विचलित नहीं होंगे। सत्य के प्रति ऐसी आस्था संसार में किसी ऋषि व महापुरुषों में देखने को नहीं मिली। उनके जैसा वेदों का विद्वान, वेद प्रचारक, समाज सुधारक तथा अनेक प्रकार से समाज को अन्ध विश्वासों से मुक्त कर उन्हें सत्य ज्ञान से युक्त करने वाला महापुरुष संसार में नहीं हुआ। हमें लगता है कि स्वामी दयानन्द जी पर ‘न भूतो न भविष्यति’ की उक्ति पूरी तरह से चरितार्थ होती है। स्वामी दयानन्द का भारत में जन्म लेना और वेदों का प्रचार करना देश व देशवासियों के लिये वरदान सिद्ध हुआ। यदि वह न आते तो न तो वैदिक धर्म की रक्षा होती, न समाज सुधार के कार्य होते और न ही देश स्वतन्त्र होता। यह बता दें कि ऋषि दयानन्द ने ही सर्वप्रथम स्पष्ट शब्दों में स्वदेशी राज्य के सर्वोपरि उत्तम होने की सबल शब्दों में सत्यार्थप्रकाश में घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि विदेशी राज्य कितना भी अच्छा क्यों न हो वह स्वदेशी राज्य से उत्तम नहीं हो सकता।

ऋषि दयानन्द ने सन्1863 में गुरु विरजानन्द जी से अध्ययन पूरा कर सामाजिक कार्यों में प्रवेश किया और वेद प्रचार को प्रमुख स्थान दिया। वह वेदविरुद्ध मान्यताओं व परम्पराओं का खण्डन करते थे और सत्य पर आधारित ईश्वर की आज्ञाओं व मान्यताओं का मण्डन करते थे। स्वामी दयानन्द जी ने वेदविरुद्ध मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, अवतारवाद, मृतक श्राद्ध, स्त्री व शूद्रों का वेदाध्ययन में अनधिकार, बाल विवाह, अनमेल विवाह, विधवाओं के प्रति समाज की अवैदिक भावनाओं सहित जन्मना जातिवाद, छुआछूत, ऊंच-नीच आदि का खण्डन किया और इनके विकल्प प्रस्तुत किये। उन्होंने ईश्वर की सच्ची पूजा करने की विधि अपनी ‘सन्ध्या’ नाम की पुस्तक में प्रदान की। मनुष्य के दैनिक व्यवहारों के कारण वायु व जल सहित पर्यावरण का प्रदुषण होता है। इसको दूर करने का साधन अग्निहोत्र यज्ञ है। इसकी विधि व प्रचार भी ऋषि दयानन्द ने किया। देश से अशिक्षा दूर करने के लिये उन्होंने प्राचीन गुरुकुलीय पद्धति को प्रचलित करने का प्रचार किया। स्वामी जी की प्रेरणा के अनुसार उनके अनुयायियों स्वामी श्रद्धानन्द तथा स्वामी दर्शनानन्द आदि ने अनेकानेक गुरुकुलों की स्थापना कर वेदों पर आधारित शिक्षा का प्रचार किया। ऋषि दयानन्द ने अवैदिक मिथ्या परम्पराओं व प्रथाओं को दूर करने के लिये विपक्षियों को शास्त्रार्थ एवं वार्तालाप की चुनौती दी। काशी में उनके द्वारा लगभग30 शीर्ष पण्डितों से मूर्तिपूजा पर शास्त्रार्थ किया गया जिसमें पण्डितों के वेदों से संबंधी अज्ञान वा अल्पज्ञान को उन्होंने प्रजाजनों के सम्मुख प्रकट किया। अपने अनुयायियों के अनुरोध पर उन्होंने ‘सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ’ लिखा व प्रकाशित किया जिसमें प्रायः समस्त वैदिक मान्यताओं को तर्क एवं युक्तियों सहित वेद एवं अन्य शास्त्रों के प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही इस ग्रन्थ में अवैदिक मतों का सप्रमाण खण्डन वा समीक्षा भी की गई है। स्वामी दयानन्द जी ने वेद प्रचारार्थ अनेकानेक ग्रन्थों का प्रणयन किया। उनके अनेक कार्यों में वेदों का संस्कृत व हिन्दी भाषा में भाष्य व अनुवाद सत्यार्थप्रकाश के समान व इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रमुख कार्य है। सृष्टि के आरम्भ से ऋषि दयानन्द के समय तक वेदों का प्रामाणिक व सत्य अर्थों से युक्त भाष्य उपलब्ध नहीं था। सायण व महीधर आदि भाष्यकारों के जो भाष्य थे उनमें अनेक न्यूनतायें एवं त्रुटियां थीं जिनका दिग्दर्शन ऋषि दयानन्द ने अपने वेदभाष्य सहित ऋग्वेदभाष्यभूमिका ग्रन्थ में किया है।

ऋषि दयानन्द जी का वेद भाष्य संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओं में है। सृष्टि के आरम्भ से ऋषि दयानन्द के समय तक ऐसा प्रामाणिक एवं मनुष्यों का हितकारी व कल्याणकारी वेदभाष्य का कार्य किसी विद्वान वा ऋषि का उपलब्ध नहीं होता। हिन्दी में भाष्य की सूझ उनकी अपनी थी जिसका लाभ साधारण मनुष्यों को मिला जो बोलचाल की हिन्दी भाषा को पढ़ने की साधारण सी योग्यता रखते हुए भी वेदों का गहन अध्ययन कर उसकी मान्यताओं, सिद्धान्तों व शिक्षाओं से सुपरिचित हुए। हम भी ऐसे ही व्यक्तियों में सम्मिलित हैं जिन्होंने हिन्दी भाषा के माध्यम से वेदों के गहन अर्थों व सिद्धान्तों को जाना व समझा है। वेदों के अध्ययन से मनुष्य ईश्वर व जीवात्मा के सत्य स्वरूप व कर्तव्यों को जानकर उनके अनुसार अपना जीवन बनाकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति में अग्रसर होता है। वह अविद्या दूर करने एवं विद्या की वृद्धि करने सहित समाज सुधार वा समाज उत्थान के कार्यों में भी प्रवृत्त होता है। वह एक दीपक बन जाता है जो अपने जीवन से अज्ञान व अविद्या को हटाकर दूसरे सहस्रों लोगों के जीवन का अज्ञान व अविद्या को भी हटा सकता है।

वेदों का हिन्दी भाषा में भाष्य तथा सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों की लोकभाषा हिन्दी में रचना ऋषि दयानन्द का मानव जाति पर बहुत बड़ा उपकार है जिससे कोई मनुष्य कृतज्ञ नहीं हो सकता। ऋषि दयानन्द जी का वेदभाष्य अपूर्व एवं अत्यन्त प्रशंसनीय है। उनके बाद उनके अनेक शिष्यों ने सरल हिन्दी भाषा में वेदों के भाष्य किये हैं। इससे ज्ञान की दृष्टि से सामान्य कोटि के व्यक्ति लाभान्वित होते हंै। ऋषि दयानन्द के शिक्षा विषयक विचारों से उनके अनुयायियों ने जो गुरुकुल व संस्कृत की पाठशालायें स्थापित की, उनमें संस्कृत के बड़ी संख्या में विद्वान तैयार हुए जिन्होंने देश-देशान्तर में वेद प्रचार कर संसार का उपकार व कल्याण किया है। ऋषि दयानन्द के संसार व इसके सभी मनुष्यों पर अनेकानेक उपकार हैं। हम कभी उनके ऋणों से उऋण नहीं हो सकते। यदि ऋषि दयानन्द न आते तो हम वेदों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने व ईश्वर की यथार्थ उपासना करने सहित जीवन में अन्धविश्वासों व अविद्या को दूर करने में सर्वथा असमर्थ रहते। संसार अज्ञान व अविद्या में डूबा रहता जैसा उनके समय में था। इन सब कार्यों के लिये हम ऋषि दयानन्द जी के उपकारों को स्मरण कर उनको सादर नमन करते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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