देश के लिए केन्द्रीय भूजल बोर्ड ने जो भूगर्भीय जल के विषय में रिपोर्ट दी है, वह काफी खतरनाक है। जिसके अनुसार देश के 802 ब्लॉकों में भूजल के अति दोहन से जल संकट गहरा रहा है और यदि यही स्थिति रही तो अगले 15 वर्ष में देश की आधी आबादी जलसंकट से जूझ रही होगी। बोर्ड के अनुसार राजस्थान, पंजाब, हरियाणा में जलस्तर में चार मीटर से अधिक की गिरावट हुई है।255_01_50_08_handpump_H@@IGHT_167_W@@IDTH_223 जलस्तर हर साल दस से बीस सेंमी गिर रहा है। योजना आयोग की रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल देश में 1123 अरब घनमीटर जल हमारे उपयोग के लिए उपलब्ध है, जबकि मांग 710 अरब घनमीटर की है। पर योजना आयोग का मानना है कि यह मांग 2025 में लगभग 1100 अरब घनमीटर हो जाएगी। जबकि जलस्तर गिरने से जलीय उपलब्धता उस समय इतनी कम हो जाएगी कि 2030 तक देश की आधी आबादी पानी के लिए तरस रही होगी।

हमारे देश में प्राचीन काल में जिन भौतिक पदार्थों को भी देवता मानकर पूजित किया गया उनमें जलदेवता भी एक है। जो भी पदार्थ हमारे जीवन को गति व ऊर्जा प्रदान करता है या हमारे लिए जिसका होना अति आवश्यक है हमने उसे ही देवता कह दिया और उसकी पूजा की। पूजा का अभिप्राय गुणों के संकीर्तन से है। गुणों का सम्मान करने से है।

अंग्रेजों ने हमारे प्रकृति के साथ इस सम्मानपूर्ण सहचर्य भाव को उपेक्षा और उपहास की दृष्टिसे देखा। या तो वह हमारे और प्रकृति के इस सम्मानपूर्ण सहचर्यभाव को समझ नही पाए या फिर समझकर भी हमें केवल ‘ग्वाला’ सिद्घ करने के लिए ऐसा नाटक किया। हमने स्वतंत्रता के पश्चात कई बातों में पश्चिम की कथित भौतिक उन्नति की नकल की, और अपने सांस्कृतिक मूल्यों को भुलाने या उपेक्षित करने में शीघ्रता का प्रदर्शन किया। फलस्वरूप हमने देश की समस्याओं का ‘एलौपैथिक ट्रीटमेंट’ करना आरंभ कर दिया। ज्ञात रहे कि एलोपैथी में रोग को जल्दी और जबरन शांत किया जाता है, उसे जड़ से खत्म नही किया जाता। जबकि आयुर्वेद रोग को बढ़ाकर उसे जड़ से समाप्त करता है। इस ‘एलोपैथिक ट्रीटमेंट’ के अंतर्गत देश के कुंओं को भुलाकर यथाशीघ्र नलकूप क्रांति लाकर देश को खुशहाल कर देना सरकार का उद्देश्य था।

जब कुंआ थे तो लोग उतना ही पानी जमीन से निकालते थे जितना आवश्यक होता था। उस पानी को भी पीने, नहाने-धोने में खर्च करते थे तो अवशिष्टव्यर्थ पानी के लिए घरों में ही सोख्ता होता था। जो उसे पीता था और वापिस धरती को दे दिया करता था।  उससे जलस्तर ठीक रहता था। देश के अधिकांश हिस्सों में दो चार मीटर गहरा खोदते ही पानी का फव्वारा फूट पड़ता था। जबकि अब यह फव्वारा बहुत से क्षेत्रों में तो 200-400 फुट गहरे जाकर भी नही मिल पा रहा। नलकूपों ने पेयजल के सुरक्षित भूगर्भीय भण्डारों को मिटाने में अहम भूमिका निभाई और आज हम जब आजादी की 67वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं तो इन भण्डारों के सिमटते आधार को देखकर हमारे पसीने छूट रहे हैं। अब जल देवता का देवत्व हमारी समझ में आ रहा है।

देश के भीतर अब स्थिति ये है कि यहां दूध सस्ता और पानी महंगा है। आप किसी भी नल, टोंटी या किसी नदी आदि के बहते पानी को पी ही नही सकते। इसलिए बंद बोतल का पानी हमारी प्राथमिकता में आ गया है और उसे देने वाला अपनी शर्तों पर या अपने मनमाफिक मूल्य पर बेच रहा है। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और यूपी के लिए केन्द्रीय भूजल बोर्ड का मानना है कि यहां स्थिति अत्यंत भयावह है। बोर्ड का आंकलन है कि पंजाब के 80 प्रतिशत, हरियाणा के 59 प्रतिशत, राजस्थान के 69 प्रतिशत दिल्ली के 74 प्रतिशत और यू.पी. के नौ प्रतिशत ब्लॉकों का जल दोहन हुआ है। केन्द्र ने जल दोहन रोकने के लिए एक मॉडल विधेयक भी 1970 में राज्यों को भेजा था। बाद में यह विधेयक 1992, 1996 और 2005 में फिर राज्यों को भेजा गया, परंतु परिणाम कुछ नही निकला। क्योंकि भारत वो देश है जहां मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटाते हुए ही राजनीतिक दल सत्ता भोग करते रहते हैं। यदि कोई आपदा परसों आनी है तो हमारे कर्णधार आने वाले कल की रात भी आराम से फटकार कर ही सोएंगे। गलती नेताओं की ही नही है, देश की जनता का बड़ा भाग भी ऐसा है जो राष्ट्रीय आपदाओं के प्रति या राष्ट्रीय समस्याओं की भविष्य की भयावहता के प्रति ‘कबूतरी धर्म’ निभाते हुए आंखें मींचे खड़ा रहता है और वह आरक्षण, लैपटॉप, टी.वी. आदि राजनीतिक दलों से प्राप्त करके ही समझ लेता है कि शायद तूने सत्ता अपने इसी सौदे के लिए तो अमुक दल को दी थी, अब उसने हमें हमारी मनमाफिक चीज दे दी, तो उसे मौज करने दो।

बात अपने सांस्कृतिक मूल्यों के रखरखाव की तो है ही साथ ही देश में राष्ट्रीय चरित्र को बलवती करने की भी है। टोंटी को खुला छोडऩा हमारी आदत है उसे बंद करने पर हम ध्यान  ही नही देते। मारने वाली नलकूप क्रांति के घातक फल हम भोग रहे हैं और आने वाले 15 वर्ष बाद उन घातक फलों के शिकार बनने जा रहे हैं, क्या ही अच्छा हो कि समय रहते हम कुंओं का महत्व समझ लें। अब आने वाली प्रलय से कुंआ ही बचा सकता है। सचमुच कितने ज्ञानी थे हमारे पूर्वज जिन्होंने जल का महत्व समझा, उसे देवता माना और जल दोहन से बचाकर केवल कुंआ खोदना ही उचित माना। देश के लिए नौ लाख इकतालीस हजार पांच सौ इकतालीस वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वर्षा जल सहेज कर भूगर्भ में भरने की संभावनाएं तलाशी जा चुकी हैं। जिसमें पिचासी अरब घनमीटर जलसंरक्षण पर 79,178 करोड़ रूपये खर्च होने का अनुमान है, पर जब बात देश को बचाने की हो तो यह राशि कुछ भी नही है। बात नीयत की है।

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