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भूमिसूक्त और पर्यावरण संरक्षण : अगले 100 वर्षों में हो जाएंगे आधे जीवधारी धरती से खत्म

 

डॉ. शीला टावरी

लेखिका पर्यावरणविद् एवं शिक्षाविद् हैं।

वेटिकन सिटी से प्राप्त एक खबर के अनुसार वर्तमान पोप फ्रांसिस ने सारी मानवजाति का एक साहसिक सांस्कृतिक क्रान्ति के लिए आवाहन किया है। पोप महोदय के मतानुसार ’’आज की अर्थव्यवस्था अत्यंत कुंठित है जिसमें अमीरों द्वारा गरीबों का न केवल शोषण हो रहा है, अपितु सारी पृथ्वी कूड़े के एक विशाल ढेर में बदलती जा रही है।’’ संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्मुख अपने विचार रखते हुए पोप महोदय ने जीवाश्म ईंधन यानी पेट्रोल-आधारित औद्योगिक प्रारूप को वर्तमान के वैश्विक ऊष्मीकरण के लिए प्रमुखतः उत्तरदायी ठहराया है। पुरातन ग्रंथों का एवं अपने पूर्ववर्ती पोप महोदयों के मतों का हवाला देते हुए उन्होंने ईश्वर की इस महान् कृति याने इस धरती को भविष्य के लिए बचाए रखने की अपील की है। पोप महाशय ने लिखा है कि ’’केवल संतुलन बनाए रखना पर्याप्त नहीं है। अब समय आ गया है कि हम प्रगति की अपनी परिकल्पना को फिर से परिभाषित करें।’’
सच मानिएगा। इस वक्तव्य से हमें गहरा सदमा पहुँचा है। हो सकता है, भारत की स्वतंत्राता के बाद ही इस धरती पर जन्म लेने के कारण हमें हर एक चीज़ को पश्चिमी मापदण्डों से परखने की आदत-सी पड़ गई है। इसलिए हम में एक बार फिर पश्चिमी आधार लेते हुए ऑक्सफोर्ड शब्दकोश का आधार लेकर देखा जिसके अनुसार प्रगति का अर्थ है याने किसी विशिष्ट गंतव्य की ओर आगे बढ़ना। अर्थात् प्रगति की संकल्पना में ’’विशिष्ट गंतव्य’’ की संकल्पना अंतर्निहित है। तो प्रश्न उठता है कि क्या हम अपने ’’विशिष्ट गंतव्य’’ की ओर नहीं बढ़ रहे हैं?
वैज्ञानिकों द्वारा प्राप्त हिदायतों पर गौर करें तो पोप महोदय की बात में बहुत दम है। निश्चित ही पृथ्वी या जीवसृष्टि का विनाश हमारा गंतव्य नहीं हो सकता। आज हमने इस पृथ्वी नामक ग्रह का तापमान बढ़ाने में और पर्यायतः जीवसृष्टि धारण करने की उसकी क्षमता को बिगाड़ने में अद्भुत योगदान दिया है। ईश्वर की बनाई इस धरती पर करोड़ों प्रकार के जीवों का वास है और इनके आपस के तानेबानेे और संतुलन से ही यह जीवसृष्टि अनादिकाल से चली आ रही है। लेकिन पिछली कुछ सदियों से मनुष्य जाति की संख्या जितनी निर्बाध गति से बढ़ी है, उतनी ही निर्बाध गति से कई प्राणियों की संख्या में न केवल कमी आई है अपितु कई जातियाँ या तो विलुप्त हो चुकी हैं या विलुप्तता की कगार पर खड़ी हैं। और विनाश की यह गति प्रतिदिन, प्रतिक्षण बढ़ ही रही है। यह पक्का बताना मुश्किल होगा, फिर भी एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में प्रतिवर्ष लगभग एक लाख प्रजातियाँ इस धरती पर से विलुप्त होती जा रही हैं। अगर ऐसा ही रहा तो अगले 15 से 30 वर्षों में हाथी, गैंडा, चिंपैंजी जैसे कई प्राणी भी इस धरती पर से विलुप्त हो चुके होंगे और इसी गति के चलते आगामी 100 वर्षांे में पृथ्वी पर से लगभग आधे जीव विलुप्त हो जायेंगे।


कई विद्वानों के मतानुसार कुछ प्रजातियों का पृथ्वी पर से विलुप्त होना यह कोई असामान्य घटना नहीं है। यह एक प्राकृतिक व्यवस्था रही है। ऐसा पहले भी होता आया है। परंतु चिंता की बात यह है कि वर्तमान की विलुप्तीकरण की यह गति सामान्य प्राकृतिक गति से लगभग दस हज़ार गुना ज्यादा है। जीवशास्त्रिायों में इस बात पर आमतौर पर सहमति है कि पृथ्वी पर से अनेक जीव-प्रजातियाँ लुप्त होने में अपने को ईश्वर का लाड़ला पुत्रा कहलाने वाला मानव ही प्रमुख रूप से कारणीभूत हैै। पोप महाशय का भी यही कहना है।
जीवसृष्टि के इस विनाश का मुख्य कारण है उनके निवासस्थानों का विनाश। मानव ने अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए हमेशा ही जंगल काटे। प्राणियों की अंधाधुंध हिंसा की। कभी हाथी को उसके दाँतों के लिए मारा तो कभी बाघ की उसकी सुंदर चमड़ी के लिए हत्या की। आवश्यकता और लोभ के बीच की संक्षिप्त सीमारेखा को वह कब लाँघ गया उसे भी खबर ना रही और प्रगति की यही गति चलती रही तो संभव है कि अगले सौ वर्षों के बाद हरे-भरे जंगल और आजतक की बची हुई वैविध्यपूर्ण जीवसृष्टि हमें केवल चित्रों में ही देखने को मिले।
बात यहाँ पर ही नहीं रुकती है। मानव भले ही अपने आप को (जिसे या जिसकी वह मानता ही नहीं उस) ईश्वर का लाड़ला पुत्रा कह ले, विनाश के इस महाप्रलय में वह भी ख्ंिाचता चला जा रहा है। बेतहाशा बढ़ी आबादी और तथाकथित संपन्न जीवनशैली की होड़ में पृथ्वी ही नहीं, अंतरिक्ष में भी हाहाकार मचा दिया है। आँकड़ों की माने तो प्रतिवर्ष केवल प्लास्टिक का ही कई हज़ार करोड़ किलोग्राम कचरा महासागरों में फेंक दिया जाता है जो कि सर्वविदित है अगले सैकड़ों वर्षों तक वैसा ही पड़ा रहने वाला है। अन्य कचरा अलग! यही धरती को कूड़े के ढेर में बदल रहा है। इनके रहते सागरतल की लगभग 27 प्रतिशत प्रवालसृष्टि हमेशा के लिए लोप हो चुकी है। कभी सुंदरता की मिसाल समझे जानेवाले लंदन और पेरिस शहर दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में शुमार हो चुकेे हैं और हमारा दिल्ली शहर तो इन सबसे बहुत आगे निकल चुका है। वैज्ञानिकों को अब समझ में आने लगा है कि प्रतिवर्ष करोड़ों मनुष्य जो कैंसर व हृदयाघात जैसी बीमारियाँ झेलते हुए काल के गाल में समा रहे हैं, उसका सबसे बड़ा कारण भूगर्भ से प्राप्त जीवाश्म इंधन पर चलने वाले वाहन एवं उद्योग और उसी के साथ वर्तमान प्रगति के लिए होनेवाला वृक्षों का संहार है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस गति से हम पृथ्वी पर मौजूद संसाधनों का उपभोग कर रहे हैं, उसकी पूर्ति के लिए वर्ष 2030 तक हमें दो पृथ्वी ग्रहों की जरूरत होगी और अगर हर कोई हमारे सपनों के आदर्श अमेरिका जैसा रहना चाहेगा तो हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें ऐसे 4.6 ग्रह चाहिए होंगे। पता नहीं यह करने के लिए कितने विश्वामित्रा लगेंगे !
मानव की चाहतों का कोई अंत नही है। सभी गात्रा शिथिल हो जाते हैं परंतु ’तृष्णैका तरुणायते।’ पोप महाशय की पीड़ा और आक्रोश समझ में आने वाला है। आज अच्छा है कि यह आवाज़ पश्चिम के एक महान् धर्मगुरु द्वारा उठाई गई है जो कि अभिनंदनीय है। उन्होंने समस्या के मर्मस्थल पर उंगली रखी है- प्रगति की परिभाषा जो कि पश्चिम के अनुसार प्रति व्यक्ति उपभोग रही है। यानी कि जो जितना अधिक उपभोग करे, वह उतना अधिक प्रगत ! महात्मा गाँधी जी भी कहते रहे कि भाइयो, इस धरती में सबकी जरुरतें पूरी करने की क्षमता है पर किसी की लालसा की पूर्ति वह नहीं कर सकती। और हम हैं कि तथाकथित प्रगति के लिए प्रतिदिन इस पृथ्वी नामक ग्रह पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं। हमारी सोच में पश्चिम प्रगत है और हमें उसके पीछे चलकर प्रगति को प्राप्त करना है।
काश! हम आत्मविस्मृत लोग प्रगति का अर्थ, हमारे गंतव्य का अर्थ अब भी समझ लें जो हमारे पूर्वजों ने समझा था और धरोहर के रूप में वे हमारे लिए छोड़ गये हैं। भारतीय सभ्यता में मानव का लक्ष्य ब्रह्म से एकरूपता रहा है। पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में, जल में, वनस्पतियों में, सर्वत्रा शान्ति की स्थापना, चराचर की प्रसन्नता यह हमारा गंतव्य रहा है। सर्वप्रथम तो हमारे संस्कारों में ’पृथ्वी नामक ग्रह, हमें उपभोग के लिए प्रदान किया हुआ है यह भूमि हमेशा हमारी माता रही है। अथर्ववेद में कहा गया है, ’’माता भूमिः पुत्रोेहं पृथिव्याः।’’ उसे भूदेवी, वसुधा, वसुमति, वसुंधरा, क्षमा और ऐसे ही अनेक सुंदर नामो से अलंकृत कर उसके स्तोत्रा गाए गए हैं। सृष्टिविनाश के भय से आतंकित मानवजाति के लिए अथर्ववेद का भूमिसूक्त एक भावपूर्ण मानवगीत है। इसकी शुरूआत ही इसके रचनाकार के प्रगल्भ मस्तिष्क एवं संवेदनशील कृतज्ञ हृदय से साक्षात्कार कराती है – सत्यं बृहद् ऋतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथ्वीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथ्वी नः कृणोतु।। अथर्व/12/1/01 अर्थात् सत्यनिष्ठा, विस्तृत यथार्थबोध, दक्षता, क्षात्रातेज, तपश्चर्या, ब्रह्मज्ञान और त्याग-बलिदान ये भाव, भूमि का पालन-पोषण और संरक्षण करते हैं। यह भूमि भूतकालीन और भविष्य में होनेवाले सभी जीवों का पालन करनेवाली है। वह हमें भी पर्याप्त विस्तृत स्थान प्रदान करें। चराचर में ईश्वर का रूप देखनेवाली यह सोच आज इक्कीसवी सदी में विशेष रूप से प्रासंगिक नज़र आती है। नदियों, पहाडों से मानवजीवन का घनिष्ठ नाता है। उनमें अगर विकृति आ जाय तो उसके परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। भूमिसूक्त के रचनाकारों की इस दूरदृष्टि के आगे नतमस्तक होने को जी चाहता है कि उन्होंने सहस्रों वर्ष पहले यह जान लिया था कि मानव स्वार्थलोलुप होकर क्षमा की क्षमाशीलता की परीक्षा न ले। इसीलिए पृथ्वी से उनका नाता बालक को दुग्धपान करानेवाली माता का था। आज की मानवजाति अगर भयग्रस्त है तो उसका कारण उसने पृथ्वी को केवल एक दोहन का साधन माना और अपनी स्वार्थपूर्ति के आगे और कोई विचार ही नहीं किया। ऐसे स्वार्थी एवं महत्त्वाकांक्षी लोगों ने आज जीवसृष्टि को विनाश की कगार पर लाकर खड़ा किया है। भूमिसूक्त के रचनाकार पृथ्वीमाता से शांतिपूर्ण, संपन्न जीवन के लिए प्रार्थना तो करते हैं लेकिन उसकी प्रतिपूर्ति के लिए उसेे हविर्भाग देने की भी बात करते हैं। इतना ही नहीं, भूमिसूक्त की एक ऋचा मानव द्वारा कंदमूल इत्यादि प्राप्त करने के लिए भूमाता को खोदने की क्रिया के लिए भी संवेदनशील एवं क्षमाप्रार्थी है। वे यह जानते थे कि यह धरतीमाता अनेक प्रकार की धार्मिक मान्यतावालों और विभिन्न भाषा-भाषी जनसमुदाय को एक परिवार के रूप में प्रश्रय देनेवाली है। आज जो वैश्विक गांव की संकल्पना प्रतिपादित की जाती है उसकी जड़ें अथर्ववेद की ऋचा में देखी जा सकती है।
जीवनदायिनी पृथ्वी में माता को देखना यह भारत की संस्कृति है। उसे केवल एक ग्रह, जो कि भोगपूर्ति का साधन है, ऐसा मानना हमारी दृष्टि में विकृति है। इसीलिए हमारे ऋषियों ने न केवल चर अपितु अचर सृष्टि में भी काव्यात्मता को देखा। उदाहरणार्थ भूमिसूक्त की ही इस ऋचा में कहा है – हे भूमे, आपकी जो सुगन्धि कमल में प्रविष्ट हुई है, जिस सुगन्धि से सूर्या ‘उषा’ के पाणिग्रहण के समय वायुदेव ने धारण किया, उसी सुगन्धि से आप हमें भी सुगन्धित करें। संसार में कोई भी पारस्परिक द्वेषभाव से न रहे।
दुर्भाग्य से हम अपनी ही इस संपन्न धरोहर को भूल गये और पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध में आत्मविस्मृत और न्यूनगंडग्रस्त हो गये। कतिपय पश्चिमी विद्वानों ने भारत की इस धरोहर को पढ़ने-परखने के बाद आश्चर्य व्यक्त किया। शोपेनहावर-जैसे विद्वान् के लिए हमारे वेद एवं उपनिषद् अतिमानवीय कृतियाँ थे। वे भारत को मानवजाति की ’पितृभूमि ’ कहते हैं, जिसने मानववंश को ’मूल धर्म’ का ज्ञान दिया और वे उपनिषद् दिये जो कि सर्वोच्च मानवी सोच की कृतियॉं हैं।
सुखद आश्चर्य की बात यह है कि ऐसा कहनेवाले शोपेनहावर अकेले नहीं हैं। अर्नाल्ड टॉयनबी, मैक्समूलर आदि ढेरों नाम हैं। आज मानव जाति केवल भौतिक ही नहीं, मानसिक रूप से भी संतुलन खो चुकी है ऐसा लगता है। नहीं तो दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी, अमेरिका का राष्ट्रपति, अपने ही देश में आये दिन होनेवाले वांशिक नरसंहार के प्रति इतना क्षुब्ध और हताश नजर नहीं आता। पोप महाशय के रूप में मानववंश को जगाने के लिए फिर से एक शोपेनहावर पैदा हुआ है। शायद उनकी आवाज़ हमें और मनु के समस्त वंशजों को जगाने का काम करेगी।

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